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क्या चाहा, क्या पाया...

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 07, 2017

सन 1980 और 1990 के दशक के भारत के कई ख्वाब थे: सरकारी प्रचार करने वाले पुराने दूरदर्शन की जगह उपग्रह या केबल की मदद से चलने वाला निजी टेलीविजन, अमेरिका की तर्ज पर निजी अस्पताल जो देखने में होटलों की तरह नजर आएं, लोक निर्माण विभाग के बजाय निजी निर्माण कंपनियों द्वारा बनाए गए विश्वस्तरीय राजमार्ग और किफायती निजी बिजली घर जो राज्य बिजली बोर्डों को बिजली दें। हमारी आकांक्षा यह भी थी कि निजी टेलीफोन सेवाएं हों और इंडियन एयरलाइंस की तुलना में बेहतर विमान सेवाएं हों। हमें अचरज होता था कि पासपोर्ट मिलने में इतने महीने और सप्ताह क्यों लगते हैं? हम निजी बीमा कंपनियां भी चाहते थे क्योंकि सरकारी क्षेत्र की कंपनी जीवन बीमा निगम की नौकरशाही हमें तंग करती थी। यकीनन आप भी इस सूची में कुछ जोडऩा चाहते होंगे। मसलन सरकारी फर्म दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) या महाराष्टï्र हाउसिंग ऐंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (म्हाडा) के बजाय निजी डेवलपर के बनाए मकान।

 
हमने जो भी चाहा, उसमें से काफी कुछ तो हम पाने में कामयाब रहे। लेकिन क्या वास्तव में हम पुराने दूरदर्शन पर नए माध्यमों को प्राथमिकता देते हैं? कम से कम दूरदर्शन पहले की तरह सधा हुआ तो है, वह उतना आक्रामक और चीख चिल्लाहट से भरा तो नहीं है जैसा कि आजकल हमारे ड्रॉइंग रूम में देखने को मिलता है। हमने निजी-सार्वजनिक भागीदारी की राह तलाश की लेकिन निजी बुनियादी ढांचा कंपनियां इन दिनों गहरे कर्ज में डूबी हैं। ये तमाम कंपनियां राजमार्ग और बिजली संयंत्रों के निर्माण आदि से जुड़ी हैं। उनमें से कुछ तो दिवालिया तक हो चुकी हैं। उनकी बदौलत बैंक खस्ताहाल हो चुके हैं। ऋण विकास की दर बुरी तरह प्रभावित हुई है और आर्थिक सुधार की उम्मीद धूमिल हो चुकी है। निजी क्षेत्र को प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल की छूट ने तो परिसंपत्तियों की लूट ही मचा दी। 
 
इस बीच निजी बीमा कंपनियों ने गलत ढंग से पॉलिसी बेचनी शुरू कर दी। कई भोले-भाले लोग उनके शिकार बन गए। निजी बिल्डरों ने भी बड़ी तादाद में लोगों को धोखा दिया। घर सौंपने की तय मियाद तो दूर की कौड़ी हो गई। गुणवत्ता के वादे पूरे नहीं हुए और भवन निर्माण मानकों का खुला उल्लंघन किया गया। हम बड़ी तादाद में निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। हालांकि हमें पता होता है कि वहां हमसे अधिक राशि वसूल की जाती है और अनावश्यक प्रक्रियाएं आजमाई जाती हैं क्योंकि बिल में चिकित्सकों का हिस्सा होता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि चिकित्सक अपना पवित्र दर्जा खो चुके हैं। अब मरीजों द्वारा चिकित्सकों पर हमला करने की घटनाएं सामने आ रही हैं। बहरहाल इसका उजला पक्ष भी है और कई चीजें ठीक वैसी निकलकर आई हैं जैसा कि हमने सोचा था। अब फोन के लिए लाइन नहीं लगानी पड़ती, और फोन सेवाएं खासी किफायती हो चुकी हैं। विमानन सेवाएं सुलभ हैं, हवाई अड्डों की स्थिति बेहतर हुई और किराया कम हुआ है। विभिन्न शहरों में मेट्रो सेवाएं आरंभ हो रही हैं और यह मध्य वर्ग के सपने सच होने जैसा है। इसलिए क्योंकि उच्च वर्ग इनका इस्तेमाल नहीं करता और गरीब इस्तेमाल कर नहीं पाते। 
 
सवाल यह है कि कुछ मामलों में हमें सफलता मिली जबकि अन्य में नहीं, ऐसा क्यों हुआ? दो शब्दों में इसका उत्तर है: समुचित निगरानी। बाजार को नियमन की जरूरत होती है। कारोबारियों को परिचालन की आजादी चाहिए लेकिन उनको निगरानी की जरूरत भी होती है। उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का प्रभावी होना आवश्यक है। बीमा नियामक को भी इस क्षेत्र की गड़बडिय़ां कम करने में काफी पसीना बहाना पड़ेगा। मीडिया की बात करें तो इस क्षेत्र में नियामक गहरी नींद सो रहा है। जबकि इस समय उसकी खास जरूरत है क्योंकि जमकर घृणा और दुष्प्रचार किया जा रहा है, युद्घोन्माद भड़काया जा रहा है। बिजली क्षेत्र सुधार की बात करें तो उपभोक्ता आधारित घटकों को निजी कारोबारियों ने नुकसान पहुंचाया है। अस्पतालों की गड़बडिय़ों के बारे में तो हर कोई जानता है। सरकार ने इस क्षेत्र में स्टेंट की कीमत नियंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं किया। यह कहना पर्याप्त नहीं है कि सरकारी क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकता, इसलिए इसे निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाए। इसलिए क्योंकि निजी क्षेत्र को नियमन की आवश्यकता है और समुचित नियमन के लिए राज्य का क्षमता संपन्न होना आवश्यक है। अगर इसकी अनदेखी की गई तो वांछित परिणाम मिलने की चाह छोडऩी होगी।
Keyword: aviation, विमानन,
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