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भारतीय जनता पार्टी के लिए क्या हैं वस्तु एवं सेवा कर के मायने?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  July 06, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के भारतीय अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले परिवर्तनकारी बदलाव के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। तमाम मौजूदा कमियों के बावजूद जीएसटी कई लाभ लाएगा क्योंकि अब एक व्यापक कर व्यवस्था अस्तित्व में है जहां अप्रत्यक्ष करों से जुड़ा नकारात्मक प्रभाव नजर नहीं आएगा। कई करों की व्यवस्था अब समाप्त हो गई है और एक कर पर लगने वाले उपकर एवं इंसपेक्टर राज का अंत हो गया है। नई कर प्रणाली के आगमन के बाद वस्तुओं के अंतरराज्यीय आवागमन पर भौतिक नियंत्रण भी समाप्त हो गया है।

 
आशा करनी चाहिए कि जीएसटी परिषद जल्दी ही मौजूदा जीएसटी व्यवस्था की अपूर्णताओं को दूर करेगी। इन कमियों में कर दरों की बहुलता, विभिन्न रियायतें और प्रक्रियात्मक जटिलता शामिल हैं। इसके लिए काफी हद तक कर नौकरशाही जवाबदेह है जो राज्य और केंद्र दोनों जगहों पर नियंत्रण को नकार रही है। लेकिन जीएसटी के लागू होने को केवल आर्थिक नीति सुधार के रूप में देखना नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि को कमतर आंकने जैसा है। इसमें निहित राजनीतिक संदेश भी उतना ही अहम है। जीएसटी पर बनाई गई आम राजनीतिक सहमति भी काफी कुछ कहती है। भाजपा की राजनीति के लिए भी जीएसटी उतना ही अहम है जितना कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए। इस संदर्भ में देखा जाए तो तीन अहम राजनीतिक संदेशों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
 
पहला, जीएसटी की शुरुआत का इस्तेमाल सत्ताधारी दल बेहद सावधानी से अपनी सहकारी संघवाद की राजनीति के प्रचार के रूप में कर रहा है। वह ऐसा करके देश को याद दिला रहा है कि उनके लिए सहकारी संघवाद आस्था का विषय है और नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था उस विचार को लेकर प्रतिबद्धता का उदाहरण है। यह बात अहम है क्योंकि सत्ता में आने के पहले भाजपा नेताओं ने जिनमें मोदी भी शामिल थे, सहकारी संघवाद का जिक्र एक ऐसे विचार के रूप में किया था जिसे वह केंद्र में सत्तासीन होने के बाद आगे बढ़ाने वाली थी।
 
लेकिन बीते तीन सालों में कई अवसरों पर भाजपा सरकार नीतिगत सुधारों में इस सिद्धांत का पालन करने में नाकाम रही। माना तो यही जा रहा था कि नीति आयोग राज्यों की मदद से देश भर में नीतिगत सुधारों को इसी विचार के अधीन आगे ले जाएगा परंतु ऐसा हुआ नहीं। याद कीजिए कैसे भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने में विफल रहने के बाद मोदी सरकार ने संकेत दिया था कि वह राज्यों में ऐसे ही सुधार लाएगी। मूल विचार था भाजपा शासित राज्यों को ऐसे प्रावधान करने का मशविरा देना जो भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रतिबंधात्मक प्रावधानों से राहत दिला सकें। इसी प्रकार श्रम कानूनों की जटिलताओं मे राहत देने के लिए राज्यों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने यहां के श्रम कानूनों में बदलाव करें। हालांकि बाद में इस बात पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया कि राज्यों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए? राज्यों द्वारा कृषि उपज विपणन और अचल संपत्ति संबंधी सुधारों के क्रियान्वयन में भी ऐसी ही ढिलाई बरती गई। जबकि केंद्र में इन कानूनों में उचित बदलाव कर दिए गए थे।
 
इस दृष्टि से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि जीएसटी का लागू होना शायद पहला बड़ा सुधार है जहां केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को साथ लेकर कदम उठाया है, बगैर उनकी राजनीतिक मान्यताओं पर ध्यान दिए। निश्चित तौर पर सहकारी संघवाद का प्रदर्शन करते हुए राज्यों को इस बात के लिए आश्वस्त किया गया कि उनके किसी भी राजस्व नुकसान की भरपाई की जाएगी। इसी प्रकार राज्य सरकारों की बात भी सुनी गई और जीएसटी परिषद की निर्णय प्रक्रिया में केंद्र सरकार को किसी तरह का वीटो अधिकार नहीं दिया गया। जीएसटी परिषद की अब तक हुई 18 बैठकों में सभी फैसले बिना किसी मतदान के सबकी सहमति से लिए गए।
 
यही वजह है कि गत सप्ताह संसद के केंद्रीय कक्ष में जब जीएसटी की शुरुआत की गई तो तमाम राज्यों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता वहां मौजूद थे। कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने समारोह का बहिष्कार किया लेकिन उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि केंद्र सरकार ने जीएसटी को बाकायदा सहकारी संघवाद के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठिïत करने मे कामयाबी पाई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि तमाम राजनीतिक दलों और सरकारों तथा केंद्र के बीच सहयोग से ही जीएसटी का स्वप्न हकीकत में बदल सका।
 
दूसरा बड़ा संदेश यह है कि अब जीएसटी की शुरुआत को सरकार की कालेधन से लड़ाई के अंग के रूप में पेश किया जा रहा है। यह सच है कि जीएसटी बड़े पैमाने पर लेनदेन को कर दायरे में लाएगा जो अन्यथा इससे बाहर रहते। सरकार ने चुनाव में भी कालेधन से निपटने का वादा किया था। लेकिन नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को केवल कर सुधार के बजाय काले धन के खिलाफ कदम बताना यह साबित करता है कि भाजपा नेतृत्व इसका इस्तेमाल राजनीतिक समझ के साथ कर रहा है। यह विडंबना ही है कि जीएसटी कालेधन के खिलाफ अधिक सशक्त उपाय साबित होगा बजाय कि नोटबंदी के।
 
मौजूदा सरकार का कारोबारियों और दुकानदारों से करीबी जुड़ाव है। पार्टी ने एक ऐसा कदम उठाया है जो इस समूह को ही सबसे अधिक प्रभावित करने वाला है। यह उसका राजनीतिक वर्ग है और जीएसटी का सीधा संबंध इसी वर्ग से है। भाजपा नेता भी यह स्वीकार करने में नहीं हिचकते कि कारोबारी जगत के नाराज साथियों को जीएसटी अनुशासित करेगा। इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा ने कारोबारी वर्ग के साथ रिश्ते को नए रूप में ढाला है। जीएसटी का लागू होना इस बदलाव की पुष्टिï करता है। भाजपा नेताओं ने जिस तरह इस बात को प्रचारित किया कि जीएसटी के आगमन के बाद दुकानदारों और कारोबारियों द्वारा संदिग्ध खाते रखने का चलन समाप्त हो जाएगा, उससे तो यही लगता है। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी, black money, narendra modi, अघोषित आय income tax,,
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