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जी 20 शिखर बैठक के पिटारे में क्या?

रथिन रॉय /  July 06, 2017

जी20 देशों की बैठक जर्मनी के हैम्बर्ग में आरंभ हो रही है। कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत के पास अवसर है कि वह यहां नए सहयोगी तलाश करे। बता रहे हैं रथिन रॉय

 
जी20 देशों की शिखर बैठक आज अपेक्षाकृत विषादग्रस्त परिदृश्य में शुरू होने जा रही है। दुनिया भर में आय में बढ़ोतरी रुकी हुई है और आर्थिक भविष्य को लेकर चिंता की लकीरें सभी नेताओं के माथे पर हैं। ऐसे माहौल में दुनिया भर के तमाम पारंपरिक राजनीतिक प्रतिष्ठïान से इतर नेता हैम्बर्ग में जुटेंगे। ये वे नेता हैं जो बाजार सिद्घांत और खुली अर्थव्यवस्था पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मान्यता नहीं देते। ब्राजील ने तो अपना नेता तक भेजने से इनकार कर दिया है। भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव चल रहा है। रूस को संदेह की दृष्टिï से देखा जा रहा है क्योंकि वह विकसित देशों के राजनीतिक घटनाक्रम में हस्तक्षेप कर रहा है। तुर्की, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया और कोरिया घरेलू और क्षेत्रीय चुनौतियों से दोचार हैं। अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते को नकार चुका है। ब्रिटेन ब्रेक्सिट के बाद की अव्यवस्था और असहमति से जूझ रहा है। 
 
यह आयोजन इस बार जर्मनी में हो रहा है और उसने एक एजेंडा प्रस्तुत किया है, 'वैश्वीकरण से जुड़े डर और चुनौतियां।' लेकिन इस एजेंडे में कुछ भी नया नहीं है जो वैश्विक आर्थिक समुदाय को प्रेरित करे और आगे ले जा सके। वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने, कर प्रतिस्पर्धा कम करने और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से लडऩे के लिए उनकी फंडिंग रोकने जैसी पुरानी बातें दोहराई जाती रही हैं। हालांकि कुछ मोर्चों पर प्रगति हुई है लेकिन पूरे एजेंडे में कुछ भी नया या प्रेरक नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), ओईसीडी और विश्व बैंक लगातार उन नीतियों को लेकर पायलट रिपोर्ट तैयार करने के काम में लगे हैं जो मजबूत और स्थायित्व भरी वृद्घि प्रदान कर सकें। विभिन्न विषयों को लेकर प्रतिष्ठिïत लोगों के समूह और अध्ययन समूह लगातार बन रहे हैं जबकि नतीजा सिफर ही निकल रहा है। इससे इन प्रमुख वैश्विक चिंताओं को हल करने में कोई मदद नहीं मिल रही। ऐसे समय में जबकि वैश्विक अनिश्चितताओं, राजनीतिक आशंकाओं और अन्य देशों के इरादों को लेकर संदेह के बादल लगातार छाए हुए हैं, यह सब अस्वीकार्य है। हमें नए सोच की तत्काल आवश्यकता है। ऐसे में मेरे सुझाव कुछ इस प्रकार हैं:
 
प्रमुख वैश्विक मुद्दों के वित्तीय रिकॉर्ड पर नजर रखना:
 
जी20 को नेताओं के स्तर पर बढ़ाने का तात्पर्य था यह संकेत देना कि वह वैश्विक वित्तीय और वृहद आर्थिक व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करेगा। परंतु वित्तीय ट्रैक केवल बातचीत तक सीमित होकर रह गया है। जैसा कि समीर सरन और संजय जोशी ने (काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस में) कहा कि सूक्ष्म मसलों को इस मंच पर नहीं रखा जाना चाहिए, इनको जी20 देशों की बैठक के एजेंडे पर रखने से उसके मूल्य उद्देश्यों को नुकसान ही पहुंचता है और कुछ नहीं होता। खासतौर पर वित्तीय रिकॉर्ड पर नजर रखने के क्रम में यह भी देखना होगा वित्तीय तंत्र कैसे विकासशील देशों में बुनियादी निवेश को दीर्घावधिक वित्तीय सहायता मुहैया करा सकता है। मौजूदा समय में केवल यही एक तरीका है जिसकी मदद से वैश्विक वृद्घि को गति प्रदान की जा सकती है। लेकिन फिलहाल ऐसा कतई नहीं हो रहा है। अगर इस मोर्चे पर कोई ठोस परिणाम नहीं निकलता है तो इस सालाना वैश्विक जमावड़े का कोई मतलब नहीं है।
 
स्थायी विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को वित्तीय मदद मुहैया कराने का संबंध दीर्घावधि के निवेश से है। ऐसे में यह बात अहम है कि जी20 का वित्तीय रुख यह सुनिश्चित करे कि एसडीजी के क्रियान्वयन के माध्यम अपने उद्देश्यों की पूर्ति करें। अगर यह काम निष्क्रिय विकास के रुख से जुड़ा रहा और अध्ययन समूह इसमें शामिल रहे तो इस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकेगी। संयुक्त राष्ट्र को अपनी भूमिका निभानी होगी और एसडीजी के कामों के लिए स्थायी वित्त का प्रबंध करना होगा। परंतु जी20 एक ऐसा मंच है जहां दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश इन चुनौतियों का विश्वसनीय हल तलाश कर सकते हैं। खासतौर पर अदिस अबाबा में हुई बैठक की विफलता के बाद यह अहमियत बढ़ गई है। 
 
धीमी गति से लक्ष्य में बदलाव का खात्मा:  जी20 की काम करने की गति अत्यंत धीमी है। इस बीच उसकी प्राथमिकताएं भी बदलती जाती हैं। अध्यक्षता करने वाले देश अपनी पसंद के मुद्दे चुनते हैं। तमाम बातें दोहराई जाती हैं और फिर अगली बैठक तक उनको भुला दिया जाता है। इस वर्ष जी20 की अध्यक्षता में  अफ्रीका पर ध्यान देने की बात कही गई है। लेकिन इस बात को लेकर तमाम चिंताएं हैं कि क्या यह अफ्रीका की अपनी पहलों के साथ प्रतिस्पर्धा होगी और क्या ऐसा करने से गरीब अफ्रीकी देशों के विकास को आधिकारिक मदद के प्रति आधिकारिक प्रतिबद्घताओं का मामला कमजोर होगा। जी20 देशों को मध्यम अवधि के एजेंडे पर सहमति जतानी चाहिए जो किसी देश के एजेंडों को किसी भी तरह प्रभावित न करे और जहां जी20 के सदस्य देशों के समन्वित कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकें। 
 
विश्लेषण की जिम्मेदारी: जी20 के विश्लेषण का काम हमेशा बाहर होता आया है। यह काम ज्यादातर विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और ओईसीडी करते हैं। इन संस्थानों के सीमित एजेंडा हैं। यह बात तो सोच से भी परे है कि दुनिया के 20 सबसे बड़े देश अपने स्तर पर शोध कार्य करके मूल निष्कर्ष तक नहीं निकाल सकते। इन देशों में यह काम आसानी से हो सकता है। मैं ऐसे काम का हिस्सा रहा हूं और मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि टी20 (जी20 को शोध आधारित सलाह देने वाली संस्था) संस्थानों का सहयोगात्मक शोध ऐसे हल निकाल सकता है जिनमें राजनीतिक गतिरोध खत्म करने की संभावना मौजूद रहती है। ऑस्टे्रेलिया की अध्यक्षता में भी मुझे ऐसा महसूस हुआ था। हालांकि टी20 में भी वही खामियां हैं जो जी20 में हैं। मिसाल के तौर पर मध्यम अवधि के शोध एजेंडे का अभाव और प्राथमिकताओं का बोझ। अगर बहुपक्षीय एजेंसियों को मध्यम अवधि के काम सौंपे जा सकते हैं तो टी20 समूह को भी। इससे निरंतरता आएगी और जी20 और अधिक विचारों पर काम कर सकेगा। 
 
भारत की बात करें तो ब्राजील की गैर मौजूदगी और विभिन्न देशों के नेताओं के तनाव से यह संकेत निकलना चाहिए कि जी20 देशों का उभरते और विकसित अर्थव्यवस्थाओं का बंटवारा ही एकमात्र ऐसी बात नहीं है जहां तक भारत को सीमित रहना चाहिए। ऐसे में उसके पास अवसर है कि वह साझा हित के मुद्दों पर नए सहयोग तलाश करे जो उसके लिए लाभदायक साबित हों। हमारे प्रतिनिधिमंडल को अगर आर्थिक वार्तालाप का सिद्घांत याद रहे तो ही बेहतर। यह सिद्घांत है साझा हितों से लाभ हासिल होता है न कि साझा परिस्थितियों से।
Keyword: G20, india, bank,,
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