बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी में जरूरी सुधार के लिए तैयार रहे सरकार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, November 25, 2017 01:19 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

जीएसटी में जरूरी सुधार के लिए तैयार रहे सरकार

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  July 05, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) आधा-अधूरा सुधार है लेकिन उम्मीद यही है कि यह देश को एक बाजार में तब्दील कर देगा। हमें इसका स्वागत करना चाहिए लेकिन इसमें सुधार के प्रयास जारी रखने चाहिए। यह तो तय है कि जीएसटी में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। हमें आदर्श जीएसटी से इसकी तुलना करनी होगी। यानी जीएसटी का वह स्वरूप जिसे लागू करने का वादा हमसे पहले-पहल किया गया था। वह जीएसटी एकदम सहज-सामान्य था और अपेक्षाकृत मजबूत भी। इसमें एकल कर दर की हिमायत की गई थी। या दरों के अत्यंत संकीर्ण दायरे की। कागजी कार्रवाई को कम से कम करने की वकालत की गई थी और कुल कर राजस्व में इजाफा करने की नीयत से कर दर कम करने की बात भी इसमें शामिल थी। इनमें से कोई शर्त पूरी तरह अमल में नहीं लाई गई। राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद के चलते हमें कई तरह की कर दरोंं के साथ छोड़ दिया गया। उदाहरण के लिए किसी रेस्तरां में खाना खाने पर 5 फीसदी से लेकर 28 फीसदी तक चार में से कोई भी दर लग सकती है। इसका निर्धारण कई चीजों के आधार पर होगा जिनमें वातानुकूलक से लेकर स्टार रेटिंग तक कई बातें हैं। इसकी निगरानी करना आसान नहीं है। दूसरी बात, करदाताओं में करवंचना की प्रवृत्ति आ सकती है क्योंकि वे कम कर दर के दायरे में जाने का प्रयास करेंगे। तीसरी बात, कई उद्योगों और क्षेत्रों में अपनी सेवा या उत्पाद के लिए कर देने की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक ऐसा होना शुरू भी हो चुका है। 

 
कागजी कार्रवाई की बात करें तो आदर्श स्थिति में मासिक रिटर्न दाखिल करने का दबाव नहीं होना चाहिए। कुछ प्रमुख अप्रत्यक्ष कर फिलहाल तिमाही वसूल किए जा रहे हैं और जीएसटी में भी यही होना चाहिए था। ऑस्ट्रेलिया में बड़ी कंपनियों को मासिक जीएसटी चुकाना होता है। छोटी कंपनियां इसका तिमाही भुगतान कर सकती हैं। भारत में ऐसा केवल उस योजना के तहत संभव है जिसे कंपोजीशन स्कीम का नाम दिया गया है। इसके तहत छोटी कंपनियां इनपुट क्रेडिट का लाभ नहीं ले सकतीं। मौजूदा जीएसटी में एक करदाता को एक महीने में तीन बार रिटर्न डालना होगा। इस पर भी कोई गलती होने पर आपको जिम्मेदारी लेनी होगी। होना यह चाहिए था कि बड़ा करदाता राष्टï्रीय स्तर पर चार या पांच रिटर्न दाखिल करे। ऐसे में छोटे उद्यमों के लिए एक राज्य से परे विस्तार का कोई प्रोत्साहन मौजूद नहीं है। यह भी एक अहम वजह है जिसके चलते जीएसटी का मूल विचार खो सा गया है। 
 
अंत में, समेकित कर दर की बात करें तो क्या यह संभव है कि कई चीजों पर पहले के मुकाबले ऊंची दर पर कर नहीं लगेगा? वस्तुओं पर लगने वाले कर का नियंत्रण या उसे कम करना एक प्राथमिक उद्देश्य प्रतीत होता है। एक बात यह भी है कि ऐसा करके सरकार सुधार की बात को मतदाताओं को बेहतर तरीके से समझा जा सकती है। वह उनसे कह सकती है कि देखिए कैसे जीएसटी लागू होने के बाद भी मुद्रास्फीति में उस कदर बढ़ोतरी नहीं हुई जैसी कि हो सकती थी। लेकिन अगर अन्य वस्तुओं की कीमतों में इजाफा होता है मतदाताओं को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। अगर मूल जीएसटी लागू होता तो ईमानदार लोगों पर कर का बोझ कम होता और सरकार के राजस्व में भी इजाफा होता। जीएसटी के मौजूदा स्वरूप की बात करें तो कुल सरकारी राजस्व पर इसका असर पूरी तरह अनिश्चित है। जबकि निजी खपत, निवेश और उत्पादन पर इसका असर वह तात्कालिक गति प्रदान नहीं करेगा जो एक स्थिर, कम दर देती। 
 
उम्मीद है कि जीएसटी परिषद इन समस्याओं से अवगत होगी। केंद्र सरकार भी खासतौर पर यह समझ रही होगी कि उसकी जवाबदेही केवल आधा-अधूरा जीएसटी लागू करने के साथ ही पूरी नहीं हो जाती है। बल्कि उसे लगातार जीएसटी में सुधार की राजनीतिक सहमति तैयार करते रहनी होगी। इस दौरान उसे आदर्श जीएसटी को हमेशा ध्यान में रखना होगा। जैसे-जैसे इसे लेकर व्यापक राजनीतिक वर्ग में सहमति तैयार होती जाएगी, वैसे-वैसे इन सुधारों को जीएसटी में शामिल करते जाना होगा। इसके लिए जीएसटी परिषद में उल्लिखित प्रावधानों का इस्तेमाल करना होगा। सरकार को अभी अपनी पीठ थपथपाने से परहेज करना चाहिए। सरकार को क्रियान्वयन से जुड़ी उन समस्याओं का भी ध्यान रखना चाहिए जो अनिवार्य तौर पर सर उठाएंगी। जीएसटी के मौजूदा स्वरूप के साथ ऐसा होना कमोबेश तय है। 
 
छोटे और मझोले उद्यमों का सावधानीपूर्वक आकलन किया जाना चाहिए। ऐसे उद्यम एक साल पहले तक वृद्घि में सुधार के वाहक रहे हैं। लेकिन निवेश की कमी ने उनमें भी मंदी ला दी है। इसके बाद नोटबंदी ने उनको और अधिक नुकसान पहुंचाया। अब उनके अनुपालन और कार्यशील पूंजी की लागत में इजाफा हुआ है। जाहिर है मूल जीएसटी का इरादा ऐसा करना नहीं रहा होगा। ऐसे में उनकी मांगों पर समुचित ध्यान देना ही होगा। 
 
कुछ राज्यों ने यह चिंता भी जताई है कि उनके कर राजस्व पर सावधानीपूर्वक निगाह रखी जानी चाहिए। मौजूदा कर व्यवस्था में एक अहम लाभ यह है कि यह राज्यों को अप्रत्यक्ष कर को बढ़ाने या कम करने का अधिकार देती रही है। इस तरह उनको अपने व्यय और कराधान पर नियंत्रण रखने में मदद मिली है। राज्य सरकारों की यह स्वायत्तता काफी कम कर दी गई है। अगर उनको स्थानीय राजनीतिक मांगों के अनुरूप समायोजन करने की गुंजाइश नहीं बख्शी गई तो इसकी आगे चलकर काफी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। सरकार के सामने जैसे-जैसे मौजूदा जीएसटी ढांचे की कमियां, इससे जुड़ी दिक्कतें आती जाएं, सरकार को उनसे निपटने की पूरी तैयारी करके रखनी चाहिए। उसे इनको एक सिरे से खारिज करने की गलती नहीं करनी चाहिए। इस व्यापक सुधार को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार इससे जुड़ी बातों को ध्यान से सुने और उचित कदम उठाए। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या अस्पतालों के शुल्क पर लगना चाहिए अंकुश?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.