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काले धन की अनसुनी कहानी

एन सुंदरेश सुब्रमण्यन /  07 04, 2017

अपनी-अपनी 'टकसाल'

नोटबंदी के दौरान काला धन ठिकाने लगाने के लिए रिश्तेदारों के खातों, अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर और मुखौटा कंपनियों का जमकर किया गया था इस्तेमाल, एजेंसियां कर रही हैं इन मामलों की जांच

बेंगलूरु के दो बड़े ठेकेदारों पर अचल संपत्ति की खरीद में अघोषित आय का निवेश करने और बड़े पैमाने पर खर्च करने के आरोप लगे थे। ये ठेकेदार अमूमन राज्य सरकार के सिंचाई और अन्य विभागों के ठेके लिया करते थे। लेकिन आयकर विभाग की गोपनीय पड़ताल से पता चला कि वे नोटबंदी का ऐलान होने के बाद दूसरे लोगों के पास रखे 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को नए नोटों से बदलने में मदद कर रहे हैं।

पड़ताल से पता चला कि वे बैंकिंग प्रणाली का इस्तेमाल करते हुए संबंधित कंपनियों के खातों में उस रकम को हस्तांतरित कर रहे थे। बाद में वही रकम नए नोटों की शक्ल में वापस मिल जाती थी। एक ही ठिकाने से 34 लोगों के बैंक पासबुक पाए गए थे। इस गिरोह ने नोटबंदी के ऐलान के दिन ही अपने कर्मचारियों के बीच करीब 1.3 करोड़ रुपये मूल्य के पुराने नोट बांटे थे और बाद में उसे मजदूरों पर खर्च बता दिया था। जांच के दौरान आयकर विभाग ने करीब 4 करोड़ रुपये की नकदी जब्त की और करीब 167 करोड़ रुपये मूल्य की अघोषित आय और कीमती सामानों का भी पता चला। बेंगलूरु केस अपने-आप में इकलौता मामला नहीं था। आयकर विभाग ने दर्जन भर से भी अधिक केस दर्ज किए हैं जो नोटबंदी के दौरान अघोषित रकम को ठिकाने लगाने के लिए अपनाई गी तिकड़मों से संबंधित हैं। बाद में इन मामलों की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट भी क्लीनमनी डॉट इन पोर्टल पर डाली गई। 

विभाग ने रिपोर्ट में बताया था कि करीब 900 समूहों की पड़ताल की गई जिसके दौरान 16,398 करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता चला। रिपोर्ट के अनुसार, 'छापेमारी के दौरान 636 करोड़ रुपये नकदी समेत करीब 900 करोड़ रुपये जब्त किए गए। साथ ही 400 से भी अधिक मामले प्रवर्तन निदेशालय या केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपे गए और 56 लोग गिरफ्तार किए गए।'

अब उन तरीकों पर नजर डालते हैं जिनका इस्तेमाल अघोषित आय को ठिकाने लगाने और सफेद करने के लिए किया गया। इन कारनामों से जुड़े कुछ उदाहरणों पर गौर करेंगे: 

1. सराफा कारोबारियों ने जमा की अघोषित नकदी

नकदी के रूप में छिपाकर रखा गया काला धन बुलियन और सराफा बाजार में नजर आया। ज्वैलरों और सराफा कारोबारियों ने बड़े पैमाने पर अघोषित नकदी को बदलने का काम किया। इसके लिए गहनों और रत्नों की पिछली तारीख में बिक्री दिखाने, निश्चित सीमा से अधिक रकम वाली खरीद पर पैन की जानकारी की अनिवार्यता से बचने के लिए रकम को अलग-अलग रसीदों के रूप में बांट देने, फर्जी बिक्री दिखाकर विवरण दर्ज करने जैसे तरीके अपनाए गए। पहचान छिपाने के लिए लेनदेन को कई परतों के भीतर अंजाम देने और भविष्य में की जाने वाली खरीद के लिए पहले ही रकम लेने का भी तरीका अपनाया गया। 

2. कारोबारियों की तरफ से अघोषित नकद जमा

सरकार की तरफ से नोटबंदी का ऐलान होने के बाद से ही कारोबारियों पर कई तरह की सख्ती बरती गई। इस दौरान पता चला कि कारोबारियों के पास मिली अघोषित रकम का बड़ा हिस्सा उनकी अघोषित आय का ही हिस्सा था। इस रकम को मजबूरी में उन्हें बैंक खातों में जमा करना पड़ा या फिर विभिन्न एजेंसियों के छापे में वे जब्त कर लिए गए। दरअसल कारोबारी अपने पास रखी इस अघोषित रकम को आगे चलकर नकद बिक्री के तौर पर दर्ज करने वाले थे।

दिल्ली के सराफा कारोबारी का किस्सा

दिल्ली में बिटुमन और ज्वैलरी का कारोबार करने वाले इस व्यक्ति ने 8 नवंबर को नोटबंदी होने के बाद अपने बैंक खातों में 150 करोड़ रुपये की नकदी जमा की थी। टैली सॉफ्टवेयर के जरिये बिलों में गड़बड़ी कर इस रकम को पिछली बिक्री के दौरान इक_ïा हुई नकद बिक्री के तौर पर पेश करने की तैयारी थी। कारोबारी ने बिक्री की हरेक रसीद ठीक 1,99,500 रुपये की बनवाई थी। उसने चलन से बाहर हो चुके नोटों में भी भुगतान स्वीकार किया और लोगों को सोना खरीदने में मदद की। सोने के दो बड़े खरीदार जयपुर के बताए गए थे लेकिन जब अधिकारी उस जगह पर पहुंचे तो पता चला कि वहां उस नाम का कोई शख्स ही नहीं था। इन दोनों खरीदारों के नाम पर कारोबारी ने करीब 135 करोड़ रुपये का विवरण दर्ज किया था। 

जब जांच अधिकारियों ने उससे कड़ाई से पूछताछ की तो उसने अपना बयान बदलते हुए कहा कि उसने कई लोगों से पुराने नोटों में भुगतान लिया था और उस रकम को अपने खातों में जमा कर दिया था। इसके एवज में उन लोगों को सोने की सिल्लियां दी गई थीं। उसने सोने की सिल्लियां खरीदने वाले लोगों के नाम-पते और मोबाइल नंबर भी बताए। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह लोगों से ली गई नकदी और उन्हें बेची गई सिल्लियों के बारे में कच्ची रसीद बनाकर रखता था और उसी दिन काम खत्म होने के बाद उन्हें नष्ट कर देता था। उस कारोबारी के मोबाइल फोन में खरीदारों के नाम और फोन नंबर भी मिले जिनकी जांच के दौरान पुष्टि भी हो गई। कारोबारी ने पूछताछ के दौरान यह भी कबूला था कि उसके पास करीब 18 करोड़ रुपये की अघोषित आय है। 

3. मुखौटा कंपनियों के जरिये नकद जमा

मुखौटा कंपनियों और उनसे जुड़े एंट्री ऑपरेटरों की भूमिका भी नोटबंदी के दौरान अघोषित रकम को सफेद करने की प्रक्रिया में सवालों के घेरे में आई है। 

कोलकाता का एंट्री ऑपरेटर 

एंट्री ऑपरेटरों से मिले आंकड़ों के आधार पर इस मामले में तलाशी अभियान चलाने का फैसला लिया गया। जांच के दौरान पता चला था कि 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा होने के बाद एंट्री ऑपरेटर ने 120 से भी अधिक इकाइयों को 103 करोड़ रुपये के लेनदेन संबंधी आंकड़े दर्ज किए हैं। इनमें से अधिकांश कंपनियां दिल्ली की थीं। यह लेनदेन मुखौटा कंपनियों से जुड़े 198 बैंक खातों में आरटीजीएस और चेकों के माध्यम से किए गए थे। आयकर विभाग ने मुखौटा कंपनियों के जरिये खपाई गई 103 करोड़ रुपये की रकम की पड़ताल शुरू कर दी है। 

दिल्ली की मुखौटा कंपनी

एक गाड़ी से चेकिंग के दौरान 3.7 करोड़ रुपये मूल्य के पुराने नोट मिलने के बाद इसकी पड़ताल शुरू हुई। इन नोटों के साथ पकड़े गए शख्स ने यह कबूल किया कि वह 11 नवंबर से गिरफ्तार होने के पहले तक करीब 35 करोड़ रुपये मूल्य के पुराने नोट बैंकों में जमा करा चुका था। सभी बैंक खाते कागज पर बनाई गई कंपनियों के नाम पर खोले गए थे। विभिन्न लोगों से जुटाई गई नकदी को इसी तरह की एक फर्जी कंपनी के बैंक खाते में जमा किया गया और फिर उस रकम को आरटीजीएस के माध्यम से एक से दूसरी कंपनी के खातों में भेजा जाता रहा। इस तरह तीन-चार बार ट्रांसफर करने के बाद आखिर में असली मालिक के खाते में वह रकम भेज दी गई। इन सभी खातों का संचालन एक ही व्यक्ति कर रहा था। खास बात यह रही कि यह पूरी धांधली बैंक के शाखा प्रबंधक और परिचालन प्रबंधक की जानकारी में ही हुई। इसके एवज में उन्हें कुल जमा राशि का 1 फीसदी कमीशन के तौर पर दिया गया। मिली जानकारी के आधार पर इस केस की जांच जारी है।

4. पूर्वोत्तर राज्यों को मिली छूट का दुरुपयोग

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 (26) के तहत देश के पूर्वोत्तर इलाके के पांच राज्यों- त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले आदिवासी समुदायों को कर से छूट देने का प्रावधान है। नोटबंदी के दौरान अघोषित नकदी को ठिकाने लगाने के लिए इस छूट का भी दुरुपयोग किए जाने के कई मामले सामने आए। 

दीमापुर केस 

आयकर विभाग को सूचना मिली थी कि दीमापुर एयरपोर्ट पर एक निजी विमान में भारी मात्रा में पुराने नोट रखकर ले जाए जा रहे हैं। नोटों से भरे थैलों को दीमापुर एयरपोर्ट पर उतारने के बाद उसमें सवार लोग उसी विमान से वापस दिल्ली लौट गए। लेकिन दिल्ली एयरपोर्ट पर हवाई खुफिया इकाई ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया। कई दौर की पूछताछ के दौरान नगालैंड से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति ने बताया कि नोटबंदी का फैसला होने के बाद उसने अपने दोस्त के साथ नकदी को दिल्ली से दीमापुर लाने की तरकीब लगाई। दोनों के बीच इस पर सहमति बनी थी कि वह नकद राशि को दीमापुर के अपने बैंक खाते में जमा कर देगा और फिर कुछ दिनों बाद आरटीजीएस के जरिये उसे वापस भेज देगा। इस मामले में हिसार से करीब 8.5 करोड़ रुपये दीमापुर ले जाए गए थे।

5. कर्मचारियों के नाम नकद जमा

नोटबंदी के दौरान कई ऐसी घटनाएं भी देखने को मिलीं जब कंपनी मालिकों ने अपने कर्मचारियों के खातों में बड़े पैमाने पर नकदी जमा कर दी। नोटबंदी के दौरान धरपकड़ और गिरफ्तारियों से बचने के लिए कंपनी संचालकों ने अपने कर्मचारियों के खातों का इस्तेमाल अघोषित रकम को जमा करने के लिए किया। 

अमृतसर केस

सर्वे के दौरान यह पता चला कि इस कंपनी ने अपने कर्मचारियों के करीब 700 बैंक खातों में 2.5 करोड़ रुपये की नकदी जमा कराई है। उस कंपनी के सहायक महाप्रबंधक (वित्त) ने यह कबूल किया कि कर्मचारियों की जानकारी या सहमति के बगैर ही 780 बैंक खातों में यह रकम जमा कराई गई। कंपनी के एचआर विभाग ने उन कर्मचारियों से बैंक निकासी फॉर्म पर हस्ताक्षर करवा लिए और कुछ दिनों बाद उस रकम को नए नोटों की शक्ल में निकाल लिया गया। यह केस प्रवर्तन निदेशालय और बेनामी संपत्ति अधिनियम के तहत प्रवर्तित अधिकारी के सुपुर्द कर दिया गया है।

6. तिकड़म में शामिल पेशेवर

नोटबंदी के दौरान अघोषित आय को वैध बनाने के खेल में पेशेवर भी शामिल हुए। अचानक पुराने नोटों के चलन से बाहर होने के बाद इन पेशेवरों ने अपने पास रखी अघोषित आय को बैंक खातों में जमा करने के तरीके निकाले।

हैदराबाद का डॉक्टर 

इस डॉक्टर ने अपने तीन बैंक खातों में 8 नवंबर के बाद 11 करोड़ रुपये से भी अधिक रकम जमा करवाई थी। पूछताछ के दौरान वह इस रकम के स्रोत के बारे में कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर पाया। बाद में उस डॉक्टर ने यह कबूल कर लिया कि वह रकम उसी की अघोषित आय है। शुरू में उसके सभी बैंक खातों को सीज कर दिया गया था लेकिन बाद में उन खातों में पड़े 7.50 करोड़ रुपये जब्त कर लिए गए। 

7. सहकारी बैंकों की धांधली

सहकारी बैंकों को कुछ मायनों में नियमित बैंकों की तुलना में थोड़ी छूट मिली होती है। मूलत: ग्रामीण इलाकों के जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए चलाए जाने वाले सहकारी बैंकों में भी नोटबंदी के दौरान अघोषित आय को जमा करने के मामले सामने आए। 

अलवर सहकारी बैंक

राजस्थान के अलवर में पुलिस ने जब वाहनों की चेकिंग के दौरान एक गाड़ी को रोका तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उसमें 1.3 करोड़ रुपये से भी अधिक नकदी रखी हुई है। उस गाड़ी में मौजूद तीन लोग खुद को एक सहकारी बैंक का निदेशक भी बता रहे थे। जानकारी मिलते ही आयकर विभाग हरकत में आया। पड़ताल में पता चला कि उस बैंक का इस्तेमाल उसके चेयरमैन और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के पास रखी 2 करोड़ रुपये की अघोषित आय को खपाने के लिए किया जा रहा है। 
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