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मेट्रो का करार, कोई तो है जिम्मेदार!

गजेंद्र हल्दिया /  July 04, 2017

दिल्ली मेट्रो की गड़बडिय़ों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इन पर सवाल उठाया जाना जरूरी है। इस संबंध में विस्तार से अपनी बात रख रहे हैं गजेंद्र हल्दिया

 
हाल के मध्यस्थता संबंधी एक निर्णय के मुताबिक दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) को रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर को 5,000 करोड़ रुपये की राशि चुकानी पड़ सकती है। यह राशि उसे वह समझौता खत्म करने के लिए देनी पड़ सकती है जो दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस से संबंधित था। चूंकि डीएमआरसी के पास धनराशि नहीं है इसलिए यह राशि सरकार को चुकानी होगी। 
 
करदाताओं को लगने वाली इस भारी चपत के लिए कौन जिम्मेदार होगा? क्या मुजरिम का निर्धारण उन्हीं मानकों के आधार होगा जो सीबीआई (सही या गलत) इन दिनों कई लोगों पर आजमा रही है। इनमें वे तीन नौकरशाह भी शामिल हैं जिनको हाल ही में कोयला खनन मामले में दोषी ठहराया गया है। या फिर क्या उनके साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार होगा। जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास एनिमाल फार्म की प्रसिद्घ उक्ति का सहारा लें तो जैसे 'कुछ मनुष्य औरों की तुलना में अधिक समान होते हैं।'
 
उचित प्रक्रिया का ध्यान न रखना, जवाबदेही की कमी, अनदेखी और गड़बड़ी आदि जैसे मामलों को निपटाने के लिए प्रासंगिक तथ्यों, मुद्दों आदि का निष्पक्ष आकलन करना आवश्यक है। बतौर संस्थान डीएमआरसी अत्यंत सम्मानित ई श्रीधरन के आदेशों का पालन करता रहा था। आम जनमानस के लिए ये दोनों ही लंबे समय से एक दूसरे के पूरक बने हुए थे। उनमें न केवल विनिर्माण अनुबंधों को ठोस तरीके से क्रियान्वित करने की क्षमता थी बल्कि उन्होंने राजनेताओं और आम जन के साथ संपर्क के मामले में भी मिसाल साबित की। ऐसे में उनके कदमों पर सवाल उठाना एक पवित्र गाय पर सवाल उठाने जैसा होगा। इस पर सार्वजनिक गुस्सा झेलना पड़ सकता है। लेकिन सच को तो सामने लाना ही होगा। 
 
डीएमआरसी में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की आधी-आधी हिस्सेदारी है। यही वजह है कि यह न तो केंद्र सरकार का उद्यम है, न ही दिल्ली सरकार का। डीएमआरसी ऐसे किसी भी नियंत्रण या जवाबदेही से मुक्त है। कई वर्षों तक तो वह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के अनिवार्य अंकेक्षण से भी बचती रही। परिणामस्वरूप उस पर सार्वजनिक फंड से जुड़ी सतर्कताएं लागू ही नहीं हुईं।
 
वर्ष 2007 में डीएमआरसी ने अनुशंसा की कि एयरपोर्ट लाइन परियोजना का काम डीएमआरसी करेगी जबकि शेष काम एक निजी कंपनी को 30 वर्ष के लिए दिया गया। चूंकि डीएमआरसी की सलाह पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता था इसलिए इस प्रस्ताव को मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह ने भी सहमति प्रदान कर दी। अपनी स्थिति का फायदा उठाते हुए डीएमआरसी ने वित्त मंत्रालय और योजना आयोग की अनिवार्य मंजूरी को दरकिनार करते हुए पीपीपी किया। उसने खुद का अनुबंध ढांचा बनाया जबकि उसे इसकी जटिलताओं से निपटने का कोई अनुभव नहीं था। हालांकि उसने दावा किया कि वह योजना आयोग के मानक रियायती अनुबंध (एमसीए) का पालन करता है लेकिन उसने जानबूझकर कई विसंगतियां उसमें शामिल कर दीं जिनकी वजह से निजी उद्यमों को भारी फायदा मिला। इतना ही नहीं हैदराबाद मेट्रो परियोजना के सलाहकार के रूप में डीएमआरसी इस बात से पूरी तरह अवगत था कि आंध्र प्रदेश सरकार ने परियोजना आवंटित करने में एमसीए का भलीभांति पालन किया। ऐसे में डीएमआरसी की ओर से किसी बदलाव की वजह नहीं थी। 
 
एमसीए पूरी परियोजना किसी अन्य संस्थान को सौंपते हुए किसी एजेंसी द्वारा किए जाने वाले निर्माण कार्य का ध्यान नहीं रखती। ऐसी व्यवस्था में अंतहीन विवादों की गुंजाइश पैदा होती है। ऐसा ही हुआ भी। किसी ढांचे का निर्माण करके उसे किसी लाभार्थी को सौंप देना सही रुख नहीं है। लेकिन अगर ऐसा करना जरूरी ही हो तो कम से कम जनहित के बचाव का कोई उपाय तो करना चाहिए था। डीएमआरसी की अक्षमता और उसकी लापरवाही इस व्यवस्था में साफ उजागर होती हैं। 
 
मध्यस्थता पंचाट ने अपने फैसले में डीएमआरसी को अनुबंध भंग करने का जिम्मेदार ठहराया। उसने कहा कि काफी लापरवाही बरती गई थी क्योंकि 510 गर्डर में से 367 में 1,551 दरारें पाई गईं। 149 में ऐसे मोड़ थे जिनकी इजाजत नहीं थी। गर्डरों के बीच में अपर्याप्त या बहुत ज्यादा अंतर देखने को मिला। ऐसे में डीएमआरसी को भारी-भरकम भुगतान करने को कहा गया। इसके अलावा रेलवे सुरक्षा आयुक्त ने ट्रेनों की गति में भारी कमी करने का आदेश दिया है। जाहिर सी बात है डीएमआरसी न केवल कम गुणवत्ता वाले असुरक्षित ढांचे बनाने की जिम्मेदार है बल्कि उसकी वजह से करदाताओं को करोड़ों का नुकसान हुआ।
 
इसके अलावा योजना आयोग द्वारा प्रकाशित तमाम एमसीए में सरकार की जवाबदेही को सीमित करने के लिए एक पूर्वनिर्धारित पंूजीगत लागत की सीमा तय की जाती है जो अनुबंध भंग की स्थिति में चुकानी होती है। डीएमआरसी ने जानबूझकर इस सीमा को समाप्त कर दिया। इससे लाभार्थियों को कई सौ करोड़ रुपये का अतिरिक्त दावा करने का अवसर मिल गया। 
 
ऐसे माहौल में जहां परियोजना लागत को निजी कंपनियां, बैंकों से सांठगांठ कर बार-बार बढ़ाती रही हैं, वहां इस बात की कम ही आश्वस्ति है कि इस मामले में ऐसा नहीं हुआ होगा। डीएमआरसी ने एक निजी कंपनी को अप्रत्याशित लाभ कमाने का अवसर दिया। डीएमआरसी ने एमसीए के मध्यस्थता प्रावधान भी बदले और कहा कि केवल उसके द्वारा पैनल में शामिल किए गए इंजीनियर ही मध्यस्थ हो सकेंगे। ऐेसे में तीन इंजीनियर मध्यस्थों ने एक अद्र्घन्यायिक निर्णय में 5,000 करोड़ रुपये की राशि चुकाने का निर्देश दे दिया। जहां तक मेरी जानकारी है इंजीनियरों द्वारा ऐसा न्यायिक निर्णय अप्रत्याशित है। 
 
रियायतग्राहियों की बैलेंस शीट दिखाती है कि उनके पास महज एक लाख रुपये की शेयर पूंजी है। इस बात पर सीएजी ने भी कड़ा एतराज जताया था। इसके बावजूद उस रियायतग्राही को 371 करोड़ रुपये बतौर हर्जाना देने को कहा गया। एमसीए के प्रावधानों में कई तरह के बदलाव किए गए। इसी तरह डीएमआरसी द्वारा तय की गई ब्याज की दर को भी संशोधन कर बढ़ाया गया। इसकी वजह से कई सौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। 
 
अब जबकि सरकार के समक्ष 5,000 करोड़ रुपये के भारी भरकम भुगतान का प्रश्न है तो उसे कम से कम कुछ जवाबदेही तय करने की दिशा में काम करना चाहिए। ताकि उपरोक्त गड़बडिय़ों की तादाद सीमित की जा सके और नियम प्रक्रिया से छेड़छाड़ बंद की जा सके। ऐसी परियोजनाओं ने ही बैंकिग व्यवस्था को चपत लगाई है और आर्थिक मंदी को जन्म दिया है। 
 
इसके अतिरिक्त जो लोग कमजोर और असुरक्षित ढांचा बनाने के लिए मध्यस्थों द्वारा जिम्मेदार ठहराए गए हैं उनसे भी कड़ाई से पेश आना चाहिए। कोई कितना भी प्रभावशाली हो लेकिन वह कानून से ऊपर नहीं है। सरकार अलग-अलग लोगों पर अलग मानदंड लगाकर अपनी विश्वसनीयता से यूं समझौते नहीं कर सकती।
 
(लेखक ने अर्बन रेल के लिए एमसीए तैयार की और हैदराबाद मेट्रो परियोजना भी तैयार की। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: DMRC, metro,,
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