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पैदल मार्गों के निर्माण से ही दुरुस्त होगा जन परिवहन

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  July 03, 2017

पिछले कुछ दिनों से मेरा सड़कों से काफी वास्ता रहा है। इस दौरान सड़कों और शहरों के बीच के अंतर को देखकर काफी ताज्जुब हुआ। स्टॉकहोम में मैंने देखा कि वहां सड़कों को मूलत: आम लोगों के लिए डिजाइन किया गया है, न कि कारों के लिए। दिल्ली का निवासी होने के नाते मुझे वहां जेब्रा क्रॉसिंग पर सड़क पार करते समय काफी संकोच हो रहा था। मुझे डर लग रहा था कि कारें क्रॉसिंग पर रुकेंगी ही नहीं और मुझे टक्कर मारकर चली जाएंगी। उस समय मुझे महसूस हुआ कि हमारे मन में असुरक्षा का भाव किस गहराई तक भरा हुआ है। स्टॉकहोम की सड़कों के किनारे बने फुटपाथ की ऊंचाई कम है, वहीं हमारे शहर में फुटपाथ की ऊंचाई अधिक है और उस पर चढऩे के लिए थोड़ा जोर लगाना पड़ता है। यह न केवल बुजुर्गों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों बल्कि सभी के लिए मुश्किल होता है। तर्क दिया जाता है कि अगर फुटपाथ की ऊंचाई कम रखी गई तो लोग उस पर गाडिय़ां खड़ी करने लगेंगे। लेकिन ऐसा होने की वजह यह है कि हम अवैध पार्किंग के लिए बने कानून को सही ढंग से लागू नहीं कर पाते हैं।

 
फिर प्राथमिकता का मुद्दा भी खड़ा होता है। आखिर सड़क इस्तेमाल करने का अधिकार किसका है, कारों का या पैदल चलने वालों का? जब मैं स्टॉकहोम से वाशिंगटन डीसी पहुंची तो मुझे इस अंतर का अहसास हुआ। दिल्ली की तुलना में वाशिंगटन में तो पैदल चलने वाला शख्स खुद को जन्नत में ही पाएगा। ट्रेन या बस से उतरते ही आपको फुटपाथ मिलेंगे। अधिकांश फुटपाथ पर चढऩा-उतरना काफी आसान है और आप उन पर चलते हुए घर से दफ्तर तक जा सकते हैं। 
 
वाशिंगटन पैदल चलने के मामले में स्टॉकहोम से अलग है। वाशिंगटन में सड़क पार करने के लिए ट्रैफिक सिग्नल बदलने का देर तक इंतजार करना पड़ता है। लेकिन अगर कोई ट्रैफिक सिग्नल नहीं लगा है और केवल जेब्रा क्रॉसिंग ही बनी है तो कारें पैदल चलने वालों का सम्मान नहीं करतीं। वैसे चालक थोड़ा मुंह बनातेे हुए सड़क पार करने का मौका दे देते हैं। दिल्ली की सड़कें जब महज गलियां ही थीं तो हम उन्हें आसानी से पार कर सकते थे। उन गलियों में भीड़भाड़ होती थी, मिला-जुला ट्रैफिक होता था, सड़क किनारे काफी लोग होते थे लेकिन उसी भीड़ के चलते महिलाओं को सुरक्षा का अहसास भी होता था। गलियां पैदल चलने के साथ बतकही के भी काम आती थीं। फिर हम गलियों से सड़कों की तरफ बढ़ चले। लेकिन ये सड़कें असल में केवल कारों के हिसाब से ही डिजाइन की गई थीं। कारों की संख्या बढऩे से अधिक स्थान की जरूरत पडऩे लगी। फुटपाथ को तोड़कर सड़कों के लिए इस अतिरिक्त स्थान का इंतजाम किया गया। दिल्ली ने पैदल चलने वाली जगह कुर्बान कर दी। जब मैं दूसरे शहरों में जाती हूं तो वहां पर भी यही नजारा दिखता है। 
 
स्टॉकहोम और वाशिंगटन के बीच एक और अंतर सड़कों की चौड़ाई का है। स्टॉकहोम की सड़कें राजमार्ग नहीं हैं। वह शहर सुविधाजनक आवाजाही के लिए बना है। वहीं वाशिंगटन में सड़कें काफी चौड़ी हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि राजमार्ग शहर के बीच से होकर गुजर रहे हैं। इसका मतलब है कि पैदल चलने वाले लोगों के लिए जब सफेद सिग्नल होता है तो भी उन्हें चौड़ी सड़क पार करने के लिए दौड़ लगानी पड़ती है। दिल्ली को भी हम इसी अंदाज में बना रहे हैं कि राजमार्ग शहर को अलग-अलग हिस्सों में काटते हुए नजर आते हैं। कितनी बेतुकी बात है।
 
अगर हम सड़कों के किनारे चल नहीं सकते हैं तो हम एक आकर्षक सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क नहीं बना सकते हैं। आज के समय में दिल्ली मेट्रो मेरी पसंदीदा परिवहन प्रणाली होगी। मेरे घर और दफ्तर के आसपास दो मेट्रो स्टेशन हैं लेकिन वहां से निकलने के बाद मैं पैदल नहीं चल सकती हूं। और न ही सड़क को पार कर सकती हूं। जब मैं पैदल चलती हूं तो एक महिला होने के नाते असुरक्षित भी महसूस करती हूं। इसके अलावा सड़क पर चलते हुए मुझे उनके किनारे चल रही तमाम कारोबारी गतिविधियों का भी सामना करना पड़ता है।
दिल्ली के केवल केंद्रीय हिस्से लुटियन जोन में ही फुटपाथ बने हुए हैं लेकिन वहां कोई उनका इस्तेमाल करने वाला नहीं है। सरकार में बैठे शक्तिशाली लोगों की रिहाइश वाले इस क्षेत्र के फुटपाथ चमकते रहते हैं। लेकिन ग्रेनाइट के पत्थरों से बने होने और पॉलिश होने के चलते इन फुटपाथ पर चलना आसान नहीं है। शायद ताकतवर लोगों को अपनी बुलेटप्रूफ कार के शीशे उतारकर इन चमकते फुटपाथ को देखना अच्छा लगता होगा। 
 
सवाल है कि किसी सड़क के बारे में आपकी सोच क्या है? एक तरफ अमेरिका या चीन और भारत के बड़े शहरों की कुछ तस्वीरें हैं जिनमें कारों की भरमार दिख रही है। कुछ मोटरसाइकिल और बसें तो दिखती हैं लेकिन साइकिल या पैदल चलने वालों की संख्या नगण्य है। दूसरी तरफ अफ्रीकी देशों या छोटे भारतीय शहरों की तस्वीर है जिनमें हर चीज अगल-बगल चल रही है। यहां लोग सड़कों पर पैदल चलते दिखते हैं, साइकिल चालक भी हैं और ऑटोरिक्शा भी नजर आ जाता है। हर कोई साथ-साथ मौजूद है। जैसे ही हम धनवान, कामयाब और आधुनिक होते हैं, इन सबसे छुटकारा पाना चाहते हैं। लेकिन एक अस्त-व्यस्त सड़क कहीं अधिक लोगों को अपनी मंजिल तक पहुंचाती है जिससे यह कारों से भरी सड़क की तुलना में परिवहन का अधिक किफायती साधन है। मुश्किल यह है कि हम इन दुनियाओं के बीच कहीं खो गए हैं। यह दुनिया गरीब होने के नाते चहलकदमी सही होने और धनवान होने के नाते पैदल चलना मुफीद होने के तर्क बनाती है। हमें यह सड़क पार करने की जरूरत है और उसके लिए हमें सड़क के बारे में अपनी सोच पर भी नए सिरे से गौर करना होगा।
Keyword: road, construction, company,,
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