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आर्थिक गतिविधियों पर नोटबंदी का वज्रपात

राहुल खुल्लर /  July 03, 2017

अब समय आ गया है कि हम नोटबंदी के असर और उसके लक्ष्यों का विश्लेषण करें। इसके दूरगामी प्रभावों के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं राहुल खुल्लर 

 
नोटबंदी एक बार फिर खबरों में है लेकिन खबर अच्छी नहीं है। बिज़नेस स्टैंडर्ड के लिए दिसंबर में लिखे अपने लेखों में मैंने कहा था कि नोटबंदी की वजह से लेनदेन में गिरावट आएगी, आर्थिक गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित होंगी, इसके विलंबकारी प्रभाव होंगे और वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही तक (और उसके बाद भी) यह गतिरोध जारी रहेगा। अब समय आ गया है कि हम नोटबंदी से हासिल नहीं किए जा सके लक्ष्यों, इसके नतीजों और इसके सतत प्रभावों का आकलन करें। 
 
पहली बात, नोटबंदी ने न तो काली कमाई के प्रवाह को रोका  और न ही इसने काले धन के सृजन पर रोक लगाई। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाने की वजह से इसका कोई असर भी नहीं पड़ा। नतीजा यह हुआ कि 1 जनवरी, 2017 से चीजें फिर से पुराने ढर्रे पर आ गईं। दूसरा, नोटबंदी जालसाजी पर भी रोक नहीं लगा पाया। भारतीय रिजर्व बैंक नोटबंदी के दौरान बैंकों में जमा की गई रकम की गणना करने में अभी तक लगा हुआ है और जाली नोटों के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है। लेकिन अनुमान है कि जमा नकदी में जाली नोटों का अनुपात काफी कम ही रहा होगा। इसका मतलब यह है कि जाली नोटों के धंधे को खत्म करने का मकसद भी नोटबंदी से पूरा नहीं हो पाया। 
 
तीसरा, नोटबंदी का सबसे अहम मकसद नकदी के रूप में जमा करके रखे गए काले धन को निरर्थक कर देना था। अपने पास काली कमाई रखने वाले लोग इसकी घोषणा नहीं कर सकते थे और इस वजह से वह कागज के टुकड़े भर रह जाने वाला था।  सरकार ने यही उम्मीद लगाई थी कि बड़े पैमाने पर काली नकदी बैंकिंग प्रणाली में लौटकर नहीं आएगी। लेकिन वह मकसद भी पूरा नहीं हो सका। रिजर्व बैंक की तरफ से 9 जून को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 8 नवंबर 2016 को 17.9 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट चलन में थे लेकिन 2 जून, 2017 को उनकी संख्या घटकर 14.7 लाख करोड़ रुपये रह गई थी। इस अवधि में रिजर्व बैंक के पास बैंकों का कुल जमा 2.31 लाख करोड़ रुपये और बाजार स्थिरीकरण योजना के तहत 0.947 लाख करोड़ रुपये बढ़ा। इस तरह कुल 3.25 लाख करोड़ रुपये पुराने नोटों की शक्ल में जमा किए गए हैं। अब इसका गणित समझते हैं। 2 जून, 2017 को चलन में मौजूद 14.7 लाख करोड़ रुपये के नोटों के साथ इस  3.25 लाख करोड़ रुपये को मिलाएं तो कुल 17.95 लाख करोड़ रुपये हो जाते हैं। ध्यान रखें कि 8 नवंबर, 2016 को कुल 17.9 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट चलन में थे। इसका मतलब है कि लगभग सारे विमुद्रीकृत नोट बैंकिंग प्रणाली में लौट चुके हैं। इस तरह नोटबंदी अपने सबसे अहम लक्ष्य को भी हासिल कर पाने में नाकाम रही।
 
नोटबंदी से फिर हासिल क्या हुआ? अधिकतर अर्थशास्त्रियों के अनुमानों के मुताबिक नोटबंदी से लेनदेन की मात्रा कम हुई, आर्थिक गतिविधियों पर बुरा असर पड़ा और नकदी लेनदेन पर निर्भर कुछ क्षेत्रों को अधिक तनाव झेलना पड़ा। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों से साफ दिखता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की सालाना विकास दर में सुस्ती आई और सकल मूल्य संवद्र्धन के मामले में तो विकास की रफ्तार पर काफी प्रतिकूल असर पड़ा। अगर 2015-16 की चौथी तिमाही से तुलना करें तो पिछली तिमाही की विकास दर में 3 फीसदी तक की गिरावट आई है। साफ है कि नोटबंदी का आर्थिक गतिविधि पर विपरीत असर पड़ा। सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़े कुछ 'अटकलोंं' की भी पुष्टि करते हैं। निर्माण क्षेत्र तो एक तरह से धराशायी हो गया वहीं विनिर्माण क्षेत्र में सुस्ती आ गई। लोक प्रशासन को छोड़कर समूचे सेवा क्षेत्र में मंदी देखने को मिली। यह स्थिति तब है जब मंत्रालय के इन आंकड़ों में अनौपचारिक क्षेत्र (खासकर विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र) को शामिल नहीं किया गया है। पिछली तिमाही में जीडीपी के हिस्से के तौर पर निजी अंतिम उपभोग व्यय में भी गिरावट देखने को मिली। सकल स्थायी पूंजी निर्माण के मामले में भी यही सच है। नोटबंदी ने उपभोग और निवेश की मांग को भी कम कर दिया। 
 
अब यह साफ हो चुका है कि बड़े पैमाने पर नकद लेनदेन पर निर्भर कृषि क्षेत्र को नोटबंदी की गहरी मार झेलनी पड़ी है। हरीश दामोदरन ने इंडियन एक्सप्रेस में 12 जून को प्रकाशित अपने लेख 'द क्रॉप्स ऑफ रैथ' में कहा है कि कई फसलों का उपज मूल्य तेजी से गिरा है और उसी के साथ कुछ उत्पादों की कीमतें भी गिरी हैं। यह विपदा नोटबंदी का ही परिणाम है क्योंकि नकदी के अभाव में नकद लेनदेन या करार नहीं हो पाए। इसका मतलब है कि दो साल के सूखे के बाद किसानों को अच्छी फसल होने का भी कोई फायदा नहीं हो सका। इस तरह किसानों को लगातार तीन वर्षों तक आय के मोर्चे पर मुश्किलों को सामना करना पड़ा है। कृषि क्षेत्र के इस तनाव ने कई राज्य सरकारों को किसानों का कर्ज माफ करने के लिए बाध्य किया है और कई दूसरे राज्य भी इस राह पर चल सकते हैं। यह साफ नहीं है कि राज्य इस फैसले से पडऩे वाले आर्थिक बोझ को झेलने की स्थिति में हैं या नहीं। निश्चित रूप से नोटबंदी के दौरान नकदी-रहित लेनदेन में तेजी आई लेकिन इसका इस्तेमाल डिजिटल प्रणाली तक पहुंच रखने वाले लोगों तक ही सीमित रहा। नोटबंदी की अवधि बीतने के बाद फिर से लोग लेनदेन में नकदी का इस्तेमाल करने लगे हैं। हमें डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए नोटबंदी की जरूरत ही नहीं थी।
 
सवाल यह है कि आगे क्या होगा? ग्रामीण आय में तीव्र गिरावट होने से वित्त वर्ष 2017-18 की कम-से-कम दो तिमाहियों में ग्रामीण मांग में बढ़ोतरी नहीं होगी। और अगर निर्माण एवं अन्य अनौपचारिक क्षेत्रों में सुधार नहीं होता है (जिसकी संभावना अधिक है) तो उपभोग-आधारित मांग में वृद्धि की संभावनाएं भी धूमिल हैं। इस तरह अधिशेष क्षमता की समस्या बनी रहेगी। निवेश व्यय का हिस्सा बढ़ाना होगा। लेकिन उपभोग-आधारित मांग में विस्तार की धीमी गति निवेश में तेजी लाने के लिहाज से अच्छा संकेत नहीं है। इस मोर्चे पर भी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में कोई अच्छी खबर नहीं है। 
 
कृषि क्षेत्र कुछ अन्य जोखिमों का भी सामना कर रहा है। अगर फसल उत्पादों की कीमतों में गिरावट के चलते खरीफ फसलों की बुआई में कमी आती है तो तीसरी तिमाही में कृषि उत्पादों की कीमतों में तीव्र बढ़ोतरी के लिए तैयार रहिए। उस स्थिति में खाद्य महंगाई दोबारा रफ्तार पकड़ सकती है। किसान कर्ज माफी के चलते राज्य सरकारें सार्वजनिक निवेश में कटौती के लिए मजबूर होंगी। इसके अलावा कर्ज माफी के फैसले का जमीनी असर दिखने में साल भर से भी अधिक समय लग सकता है। ऐसे में कर्ज माफ होने के बाद ग्रामीण मांग के अचानक बहाल हो जाने की उम्मीद मत पालिए। हालांकि कर्ज माफी के फैसले का राजकोषीय उत्तरदायित्व तो तत्काल ही दिखने लगा है। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की पहले से ही गंभीर समस्या इस फैसले से और भी अधिक गंभीर हो जाएगी। मौद्रिक नीति संबंधी रिजर्व बैंक के नजरिये पर निश्चित तौर पर इसका असर पड़ेगा। 
 
कुल मिलाकर नोटबंदी का फैसला हमें बहुत भारी पड़ा है। अगर वह काफी नहीं था तो अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से पैदा होने वाले जोखिम भी हैं। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बही-खातों को दुरुस्त करने की भी कोशिश चल रही है। लिहाजा आने वाले दिनों का इंतजार कीजिए। दिसंबर 2016 के अपने लेख में मैंने कहा था, 'अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने में कितना वक्त लगने जा रहा है? इसके विलंबकारी प्रभाव भी होंगे। तर्कसंगत अपेक्षाओं को पलटना पड़ेगा। निवेश की बहाली 2018 में भी लडख़ड़ाती रहेगी। वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने डिजिटल इंडिया से कहीं अधिक गंभीर मुद्दे होंगे।' आज उनके सामने कुछ अधिक गंभीर मुद्दे आ खड़े हुए हैं।
 
(लेखक भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अध्यक्ष रह चुके हैं)
Keyword: नोटबंदी भारतीय रिजर्व बैंक,
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