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'अघोषित आपातकाल' के आरोप की तेज होती जा रही आवाज

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  July 02, 2017

हर साल जून का अंतिम सप्ताह वह वक्त होता है जब पूरा देश आपातकाल को याद करता है, तमाम टिप्पणीकार संविधान की हत्या की कोशिश पर शोक व्यक्त करते हैं और आपातकाल के बाद व्यवस्था की जोरदार वापसी का जश्न मनाते हैं। यह सप्ताह अब धीरे-धीरे 'अघोषित आपातकाल' की स्थिति पर चर्चा के लिए मुकर्रर होता जा रहा है। देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति होने के पक्ष और विपक्ष में उठने वाली आवाज हरेक साल और तीखी होती जा रही है।

 
कुछ कड़वे सच ऐसे हैं जिनकी समीक्षा की जरूरत है। पहला, कोई भी सत्ताधारी दल अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति पैदा करने वाले कारकों को लेकर निर्दोष नहीं है। भले ही वह कांग्रेस की अगुआई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) हो या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग)। हरेक सरकार ने बेरहम कानून बनाए हैं, संसद की गरिमा को कम किया है, संवैधानिक सिद्धांतों का खुलेआम उल्लंघन किया है और उनके कानूनी प्रतिनिधि उन्हें सही ठहराने के लिए अदालतों में चालाकी से भरे तर्क भी देते हैं। विपक्ष में बैठा हरेक दल सरकार पर अघोषित आपातकाल के आरोप लगाता है और जब वही दल अगले चुनाव में जीत जाता है तो फिर उसी सिलसिले को जारी रखता है।
 
संप्रग सरकार ने सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय विदेशी संस्थानों का नियमन करने वाले कानून में बड़े बदलाव किए थे। इसका नतीजा यह हुआ कि विदेशी मदद पाने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने से पूरी तरह रोक दिया गया। हालांकि विदेशी मदद पाने वाले कारोबारी समूहों पर इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। राजग सरकार ने भी संप्रग के समय बने इस कानून का भरपूर इस्तेमाल किया और एनजीओ पर कड़े प्रहार किए हैं।
 
कुछ ऐसा ही हाल मीडिया व्यवसाय में सरकारी दखल या पूंजीवादी याराना का है। 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के प्रकाशक बेनेट कोलमन ऐंड कंपनी को एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की अगुआई वाली संयुक्त मोर्चा सरकार और फिर राजग सरकार के समय भी प्रवर्तन निदेशालय ने काफी परेशान किया था। तहलका और एनडीटीवी तो इस पर एक पूरी किताब लिख सकते हैं कि सरकारी मशीनरी के विरोध में खड़ा होने पर आपके साथ क्या गलत हो सकता है? संप्रग शासन के दौरान वेदांत ग्रुप के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हुई थी। केयर्न इंडिया को स्वामित्व परिवर्तन की मंजूरी हासिल करने के लिए आवेदन करने को बाध्य किया गया और उसकी इजाजत तभी दी गई जब सरकार के खिलाफ दाखिल कई याचिकाओं को वापस लेने के लिए उसने हामी भर दी।
 
दूसरा, सत्ता में बैठी वह सरकार वाकई में काफी बेवकूफ होगी जो आपातकाल शब्द का विधिवत इस्तेमाल करेगी। आज के समय वही सरकार ऐसा कर सकती है जिसे इस बात का भरोसा हो कि वह लोकतांत्रिक अवरोधों से पार पा लेगी। इंदिरा गांधी ने कुछ यही सोचकर आपातकाल का ऐलान किया था। लेकिन बाद में उन्हें यह लगा कि उनके करीबी लोगों ने सारी सीमाएं लांघनी शुरू कर दी हैं तो उन्होंने आपातकाल हटा लिया। आपातकाल हटाने का फैसला यह दर्शाता है कि खुद उनका भी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से भरोसा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। आज के दौर में सशस्त्र बलों के प्रति काफी सम्मान और गौरव देखा जा रहा है जो कहीं न कहीं एक समाज के तौर पर लोकतांत्रिक राजनीति के प्रति हमारे भरोसे में आ रही कमी को भी दर्शाता है। लेकिन कोई भी अनुभवी राजनेता खुलेआम आपातकाल की उद्घोषणा की हैसियत में नहीं है।
 
हालात काफी हद तक इजरायल में जारी विमर्श की तरह बन गए हैं। इजरायल में फलस्तीनियों के खिलाफ अघोषित नस्लभेदी नीतियों को लेकर होने वाली हरेक चर्चा में हिटलर के समय ढाले गए जुल्मो-सितम को जोरशोर से उभारा जाता है। इजरायल के लिए नस्लभेद के इस विश्लेेषण को आत्मसात करना काफी बेवकूफाना होगा। इसीलिए वह हमेशा यह जताने की कोशिश करेगा कि इजरायल में हो रहा भेदभाव दक्षिण अफ्रीका के नस्लभेद से काफी अलग था। अघोषित आपातकाल पर हमारा सामाजिक विमर्श भी काफी कुछ ऐसा ही है। कोई यह कह सकता है कि खबरों की समीक्षा के लिए कोई आधिकारिक सेंसरशिप नहीं है लेकिन दूसरे लोग यह कह सकते हैं कि जब आधिकारिक सेंसरशिप के बगैर ही काम चल रहा है तो फिर उसका गठन ही क्यों किया जाए?
 
आखिरकार, एक समाज के तौर पर भारतीयों में हमेशा एक ऐसे तानाशाह के प्रति ललक देखी गई है जिसे वे खुद चुन सकें। भारतीय समाज में हमेशा ही निष्ठुरता को प्रशंसा से देखा जाता रहा है। इंदिरा गांधी अपने दौर में काफी लोकप्रिय थीं। उसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री भी लोकप्रिय हैं। इन नेताओं की निर्णयपरकता और दिशाबोध आमलोगों के लिए गर्व का विषय है लेकिन दूसरे नेताओं को इससे ईष्र्या हो सकती है। लिहाजा आपातकाल के औपचारिक ऐलान की वास्तव में कोई जरूरत ही नहीं है। आप इंदिरा गांधी के अविवेक के लिए उनके करीबी लोगों को दोष दे सकते हैं जिनके चलते इंदिरा जमीनी हकीकत देख नहीं पा रही थीं। आपातकाल के बाद इंदिरा के पतन की वजह संवैधानिक संस्थाओं को चोट पहुंचाना नहीं थी। 
 
जनसंख्या नियंत्रण की मुहिम चलाने वाले कुछ लोगों ने जिस तरह से जबरदस्ती लोगों की नसबंदी करवाई, उससे जनता का एक बड़ा तबका इंदिरा से नाराज हो गया था। उनके बाद सत्ता में आने वाली सरकार भी उतनी ही निष्ठुर थी। एक पूर्व प्रधानमंत्री होते हुए भी इंदिरा को बिना वारंट के गिरफ्तार करा दिया गया था। मोरारजी देसाई ने बंबई प्रेसीडेंसी में अलग महाराष्ट्र के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने तक का निर्देश दे दिया था। संभवत: इस पूरी चर्चा से निपटने का ईमानदार तरीका तो यही है कि हम यह मान लें कि हम तो ऐसे ही हैं। 
 
(लेखक एक अधिवक्ता और स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: narendra modi, BJP, congress,,
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