बिजनेस स्टैंडर्ड - सभ्यता के पराभव का चल रहा दौर
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सभ्यता के पराभव का चल रहा दौर

दीपक लाल /  July 02, 2017

सोशल मीडिया पर दूसरों का अपमान करने वाले लोगों की बढ़ती तादाद और राजनेताओं द्वारा उनका इस्तेमाल संसदीय लोकतंत्र की सभ्य प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा रहा है। विस्तार से बता रहे हैं दीपक लाल 

 
गत 5 जून को लंदन लौटने के पश्चात एक के बाद एक स्तब्ध करने वाली घटनाएं हुईं। एक आत्मघाती हमलावर ने मैनचेस्टर में एक कंसर्ट हॉल के प्रवेश द्वार पर खुद को विस्फोट से उड़ा लिया। वह पूरा हॉल युवाओं से भरा था। तीन जिहादियों ने एक ट्रक से लंदन ब्रिज पर पैदल जा रहे लोगों को कुचला और उसके बाद चाकुओं से आसपास के पब और रेस्तरां में लोगों पर हमला किया। इसके बाद 10 जून को टरीजा मे का चुनावी दांव उस समय विफल रहा जब निर्वाचकों ने त्रिशंकु संसद चुन ली। बे्रक्सिट के चलते पहले ही राजनीतिक उथलपुथल का दौर था। इस बीच लंदन में 24 मंजिला ग्रेनफेल टावर में आग लग जाने की घटना ने दहला दिया। समूचे लंदन में नाउम्मीदी सी छा गई। 
 
इस बीच विभिन्न दलों के राजनीतिक विरोधियों में बढ़ता मतभेद भी दर्ज किया गया। सार्वजनिक बहस में चौतरफा नफरत देखी जा रही है। बीबीसी के कार्यक्रम क्वेशचन टाइम में एक  प्रश्नकर्ता को बदतमीज होने के चलते निकाल दिया गया। वह दूसरों की बातचीत में दखलंदाजी कर रहा था। भारत में भी टेलीविजन की बहसों में यह दृश्य आम है। इस पूरी प्रक्रिया में हम सभ्य होने के क्रम से पीछे हट रहे हैं। नॉर्बट एलियास अपनी पुस्तक द सिविलाइजिंग प्रोसेस में यह कह चुके हैं कि पश्चिम में सभ्यता के मानक अधिनायकवादी और बुर्जुआ व्यवहार के एकीकरण से बने, वह भी पुनर्जागरण के बाद के यूरोप में। 
 
श्रम का विभाजन, मुद्रीकरण और समाज में विभिन्न वर्गों और समूहों का एकीकरण तथा उनके बीच का अंतर, इन सभी के लिए विभिन्न स्तर पर आंतरिक प्रतिरोधों की आवश्यकता होती है। इनके कमजोर पड़ जाने पर ही अधिक प्राथमिक भावनाएं जोर मारना शुरू कर देती हैं। एलियास कनेट्टïी की क्राउड्स ऐंड पावर भी यह समझने में अहम है कि कैसे सार्वजनिक बहस और सामाजिक बहस का पराभव हो रहा है। उनकी शुरुआती चिंता संपर्क से जुड़ी है। 
 
वह कहते हैं, 'मनुष्य हमेशा किसी भी अजनबी चीज के स्पर्श से बचना चाहता है। इसमें अन्य मनुष्य भी शामिल हैं। केवल भीड़ में ही मनुष्य इस भय से निजात पाता है और दूसरों का स्पर्श बरदाश्त करता है। बल्कि उस स्थिति में हालात उलटे हो जाते हैं।' यही भीड़ की प्रवृत्ति होती है। इसके बाद कनेट्टïी ने विभिन्न प्रकार की भीड़ का ब्योरा दिया। इनमें से मेरे काम की बात है पैक। कनेट्टïी ने जिन चार प्रकार के भेद बताए उनमें से सबसे प्रासंगिक है वार पैक। यह भीड़ के अन्य प्रकारों से अलग है।
 
संसदीय लोकतंत्र का उद्भव सभ्य होने की प्रक्रिया का हिस्सा है जिसने उक्त 'वार पैक' की मूल भावना को दबाया। उसकी मूल भावना दूसरे समूहों को खत्म करने की थी। परंतु इस दौरान प्रतिपक्षी सेनाओं के विरोध का मनोवैज्ञानिक दबाव बरकरार रहा। अंतिम तौर पर संसदीय मत ही निर्णायक होता है। यह दो तिहाई के बचाव से सुनिश्चित होता है। यह सरकार और उसके एजेंटों तथा अन्य सदस्यों सभी के साथ काम करता है। 
 
संसद के सभी सदस्यों को एक साझा बचाव उपलब्ध रहता है। समानता का यही अधिकार उनको एक भीड़ में तब्दील करता है और किसी दल के सदस्यों में कोई भेद नहीं रह जाता। अन्य वार पैक्स के उलट इस भीड़ में मित्रवत संबंधी देखे जा सकते हैं। यह सभ्य राजनीतिक प्रक्रिया वर्ष 2016 के यूके ब्रेक्सिट संबंधी जनमत संग्रह और अमेरिकी राष्टï्रपति चुनाव के दौरान विषाक्त हो गई। आखिर क्यों? 
 
इसमें एक अहम कारक है सोशल मीडिया का व्यापक इस्तेमाल। कनेट्टïी ने भीड़ के अपने वर्गीकरण में ऐसे समूहों को भी वर्गीकृत किया है जो परेशान लोगों को उकसाने की कार्रवाई करते हैं। रोमन कॉलिजियम में ईसाइयों को सिंहों के समक्ष फेंकने से लेकर फ्रांसीसी क्रांति में गिलोटिन के जरिये मृत्युदंड देने तक ऐसी प्राथमिक भावना की मौजूदगी पर कतई संदेह नहीं किया जा सकता है। 
 
कनेट्टïी कहते हैं कि पश्चिम में सामूहिक हत्याओं का विरोध नया है लेकिन फिर भी आज हर कोई समाचार पत्रों के माध्यम से ऐसे कांड में भागीदार बन रहा है। इसे अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी के उत्कृष्टï उदाहरण के रूप में चिह्निïत किया जाता है। मिल्स का आजादी का सिद्घांत अब भी बरकरार है जहां पीडि़त को कानूनी सुविधाएं हासिल हैं। लेकिन बेनामी ढंग से सोशल मीडिया पर लोगों को परेशान करने वालों से बचाव के लिए ऐसा कोई उपाय नहीं है। ब्रिटेन के स्कूली बच्चों में यह बहुत प्रबल है और इसके चलते इंटरनेट पर परेशान करने वालों के बेनामी समूह बन चुके हैं। 
 
खबरों के मुताबिक युवा लड़कियां सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स को लेकर परेशान हैं। कनेट्टïी अगर समाचार पत्रों को इस दर्जे में रखते हैं तो वह गलत नहीं हैं। क्योंकि समाचार पत्र भी घटनास्थल से तो दूर ही रहते हैं और इस तरह अधिक गैर जिम्मेदारी का परिचय भी देते हैं। वे ऐसी भीड़ तैयार करते हैं जिसे एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। आज इंटरनेट पर जो हो रहा है वह इससे भी बुरा है क्योंकि इन बेनामी लोगों के खिलाफ आप कानूनी मदद तक नहीं ले पाते। इन सब बातों से अधिक बुरा है राजनेताओं द्वारा सोशल मीडिया पर पनपे ऐसे लोगों और समूहों का अपने हित में इस्तेमाल। इसके चलते संसदीय लोकतंत्र की सभ्य प्रक्रिया को जबरदस्त क्षति पहुंची है। 
 
अब सोशल मीडिया के प्रतिद्वंद्वी वार पैक के चलते उनके प्रतिनिधियोंं को सार्वजनिक बहस के किसी मुद्दे पर सहमति बनाने तक में जूझना पड़ता है। इसकी वजह से आपसी घृणा बढ़ती ही जा रही है। हमने अमेरिका और ब्रिटेन  दोनों जगहों पर ऐसा होते हुए देखा है। समाचार पत्रों का विज्ञापन राजस्व अब सोशल साइटों के हाथों में जा रहा है। इससे हालात और बिगड़ रहे हैं। पूर्वग्रह से ग्रस्त होने के बावजूद समाचार पत्र खुद को निष्पक्ष बताते आए हैं। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स खुद को सीधी सपाट खबर देने वाला निष्पक्ष अखबार बताता है लेकिन उसके ही पूर्व रिपोर्टर माइकल गुडविन कहते हैं कि 2016 के चुनावों में पत्रकारिता के मानक ढह गए। 
 
इस पूरे प्रकरण पर मैं अपनी राय संक्षेप में प्रकट कर सकता हूं। हमें उस सभ्यता को बहाल करना होगा जिसने हमारी स्वाभाविक वृत्तियों को नियंत्रित किया है। इसके लिए मानवीय सभ्यता की प्रक्रिया को दोबारा उजागर करना होगा। यह वह प्रक्रिया है जो यूरोप में पुनर्जागरण के बाद सामने आई। हमें सोशल मीडिया के ऐसे बेनामी समूहों से दो-दो हाथ करना होगा। क्योंकि वे हमारी उदार सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रहे हैं। 
Keyword: social media, twiter, facebook,,
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