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जीएसटी विवाद बढ़ाएंगे वाद!

सायन घोषाल /  July 02, 2017

अगर भारत के अप्रत्यक्ष कर ढांचे में हुए आमूलचूल बदलाव को लेकर बनी मौजूदा अनिश्चितता से कोई संकेत मिलता है तो वह यही है कि आने वाले समय में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली को लेकर बहुत सारे कानूनी मामले दाखिल हो सकते हैं।  विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई कर प्रणाली को लागू करने के पहले दी गई कम समयसीमा और उसकी जटिलताओं के चलते आने वाले महीनों में कई तरह के कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं। ऐसा होने पर पहले से ही 2.4 करोड़ लंबित मुकदमों के भारी बोझ तले दबी भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर दबाव और भी बढ़ जाएगा। 

 
निशीथ देसाई एसोसिएट्स के प्रमुख (अप्रत्यक्ष कर) एन मयप्पन का कहना है कि भारत में जीएसटी का कोई पुराना दृष्टांत नहीं होने से इस कर प्रणाली के बारे में कई व्याख्याएं की जा सकती हैं। वह कहते हैं, 'नई प्रणाली को लेकर अलग अलग राय होने से अप्रत्यक्ष कर से संबंधित कानूनी मुकदमे बढऩे के आसार हैं। यहां तक कि कर कानूनों को लेकर पहले जो धारणाएं सुनिश्चित हो चुकी थीं, अब उन पर नए सिरे से विचार किया जाएगा। इस पर कर न्यायाधिकरणों और शीर्ष अदालतों की तरफ से सक्रियता भी देखी जा सकती है।'
 
मयप्पन का यह आकलन सरकार के उन दावों के ठीक उलट है जिनमें कहा जा रहा है कि जीएसटी विभिन्न करों को समाहित करेगा और उससे अप्रत्यक्ष कर से जुड़े विवादों में कमी आएगी। मार्च 2015 के अंत में अप्रत्यक्ष कर से संबंधित करीब एक लाख मामले अदालतों में थे जिनकी वजह से करीब 23 अरब डॉलर का राजस्व संग्रह लटका हुआ था। हालांकि वर्गीकरण, मूल्य-निर्धारण, इनपुट टैक्स क्रेडिट की उपलब्धता, केंद्र-राज्य में राजस्व के विभाजन, क्रियान्वयन और मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधानों से संबंधित मुद्दों के चलते असल में इन आंकड़ों के बढऩे की आशंका है। लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन फर्म के कार्यकारी साझेदार (अप्रत्यक्ष कर) वी शिवसुब्रमण्यन कहते हैं, 'इतनी महत्ता वाले किसी भी कर सुधार के मामले में कानूनी विवाद बढऩे की संभावना काफी अधिक है।'
 
जीएसटी प्रणाली में शून्य से लेकर 28 फीसदी तक की विविधिकृत कर दरें हैं। इसमें वस्तुओं और सेवाओं को अलग-अलग कर दायरे में रखा गया है लेकिन इस तरह का वर्गीकरण भी कई विवादों को जन्म दे सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी परिषद का एक ही तरह के लेनदेन को विभिन्न कर दरों में रखने का निर्णय और भावी कारोबारी गतिविधियों के बारे में पूर्व-चिंतन की गुंजाइश नहीं रखने से भी कानूनी विवादों का पैदा होना अवश्यंभावी लग रहा है। 
 
अद्वैत लीगल के साझेदार एवं राष्ट्रीय प्रमुख सुजीत घोष का मानना है कि मिश्रित आपूर्ति वाली कारोबारी गतिविधियों में भी इस तरह की कानूनी अड़चनें पैदा होने की आशंका है। मिश्रित आपूर्ति का मतलब उस लेनदेन से है जिसमें वस्तुओं के साथ ही सेवाओं की भी संलिप्तता होती है। इस तरह के मामलों में कर अधिकारी यह तय करेंगे कि इनमें से कौन प्रभावी माना जाएगा और फिर उसी के हिसाब से उस पर कर लगेगा। 
 
अदा किए जाने वाले कर की गणना के लिए कारोबारी गतिविधि का मूल्य-निर्धारण करना होगा और उससे भी काफी जटिलता पैदा होने की आशंका है। हालांकि सरकार ने मूल्य-निर्धारण संबंधी नियमों की अधिसूचना जारी कर दी है लेकिन उससे भी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हो पाएगी। आयातित सामान पर कर का आकलन जीएसटी और कस्टम दोनों विभागों के अधिकारी करेंगे, ऐसे में कर-योग्य राशि के निर्धारण को लेकर विसंगति देखी जा सकती है। घोष कहते हैं कि संबंधित-पक्ष आपूर्ति में बाजार मूल्य का निर्धारण भी होता है लिहाजा इससे भी मूल्य-निर्धारण संबंधी विवाद खड़े हो सकते हैं। 
 
जीएसटी प्रणाली में चर्चा का विषय बने इनपुट टैक्स क्रेडिट की उपलब्धता या अस्वीकृति को लेकर भी कानूनी उलझनें पैदा हो सकती हैं। जीएसटी के गंतव्य-आधारित कर होने से यह काफी कुछ इस पर भी निर्भर करेगा कि कोई कारोबारी गतिविधि एक राज्य के भीतर ही हुई है या फिर उसमें एक से अधिक राज्य शामिल हैं। ऐसे में सेवाओं के कारोबार में लगी कंपनियां करारोपण के स्थान संबंधी कर अधिकारी की व्याख्या को लेकर चुनौती दे सकती हैं। इसकी वजह यह है कि राज्यों के राजस्व अधिकारियों ने इससे पहले कभी भी सेवाओं पर कर संबंधी मामलों को नहीं देखा है जिसकी वजह से हालात मुश्किल हो सकते हैं। 
 
अंतर-राज्य कारोबार पर केंद्र सरकार द्वारा संकलित एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) में राज्यों को दिए जाने वाले हिस्से को लेकर भी विवाद खड़ा हो सकता है और राज्य इस मामले को संवैधानिक अदालतों में भी लेकर जा सकती हैं। शिवसुब्रमण्यन के मुताबिक इन नियमों को अंतिम रूप देने और आईजीएसटी क्रेडिट के राज्यों के बीच आवंटन का तरीका तय करने में हुई देरी ने अदालती विवाद बढऩे की आशंका बढ़ा दी है। 
 
इसके अलावा इस नए कानून के कई ऐसे पहलू हैं जिनके बारे में विसंगति का अंदाजा उनके क्रियान्वयन के बाद ही हो पाएगा। खासकर राज्यों के राजस्व अधिकारी अपने हितों के अनुकूल लगने वाली व्याख्याएं कर सकते हैं जिससे क्रियान्वयन संबंधी अड़चनें बढऩे का अंदेशा है। अगर अधिकारी बदलते हुए परिवेश में कारोबार के अनुकूल रवैया नहीं अपनाते हैं तो उनके कदमों को कानूनी रूप से चुनौती भी दी जा सकती है। 
 
मयप्पन कहते हैं, 'अप्रत्यक्ष कर ढांचे को सरलीकृत करने के पीछे यही मंशा रही है कि इससे न केवल कारोबार करना सुगम हो जाएगा बल्कि कानूनी विवाद भी कम होंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि यह अपने रास्ते से भटक गया है। जीएसटी प्रणाली के पूरी तरह कारगर होने लायक हालात बनने में कई साल लग जाएंगे।' शिवसुब्रमण्यन कहते हैं कि जीएसटी को अधिक कारगर कर प्रणाली बनाने के लिए समुचित प्रशासनिक एवं न्यायिक ढांचा भी तैयार करने की जरूरत है। अगर कर प्रणाली को उम्मीदों एवं आकांक्षाओं के अनुरूप रहना है तो शिकायतों के समयबद्ध समाधान की भी व्यवस्था करनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो जीएसटी से पैदा होने वाले कानूनी विवादों की बाढ़ नए कर ढांचे की कामयाबी को मुश्किल बना देगी।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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