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निजी क्षेत्र के पुराने बैंकों में निवेशकों की बढ़ रही रुचि

हंसिनी कार्तिक / मुंबई July 02, 2017

एक साल पहले क्षेत्रीय निजी बैंकों के शेयर (जिन्हें पुरानी पीढ़ी का निजी बैंक कहा जाता है) प्राथमिकता के क्रम में दूसरे पायदान पर थे। इस मामले में दक्षिण भारत के बैंकों सिटी यूनियन बैंक, फेडरल बैंक, करूर वैश्य बैंक, लक्ष्मी विलास बैंक और साउथ इंडियन बैंक का नाम लिया जा सकता है। पर अब काफी कुछ बदलता दिख रहा है। देसी व विदेशी संस्थागत निवेशकों के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि इन्होंने हालिया तिमाहियों में इन बैंकों में से ज्यादातर में हिस्सेदारी बढ़ाई है। इनके फंडामेंटल ने भी इसमें भूमिका निभाई है। 
 
विश्लेषकों ने कहा कि इन बैंकों का परिदृश्य बेहतर बने रहने के चलते निवेशक इनके शेयरों को गिरावट के दौर में खरीदने पर विचार कर सकते हैं। विभिन्न निवेशक आखिर इनमें क्यों निवेश करना चाह रहे हैं, इसकी निम्न वजहें सामने रखी जा सकती हैं :
 
देसी बाजार में मजबूती
 
कई दशक में तमिलनाडु व केरल में सिटी यूनियन बैंक, लक्ष्मी विलास बैंक, करूर वैश्य बैंक, फेडरल बैंक और साउथ इंडियन बैंक ने अपना कारोबार स्थापित किया है और इन्हें काफी ग्राहक भी मिले हैं। एंटिक स्टॉक ब्रोकिंग के विश्लेषण से पता चलता है कि पुरानी पीढ़ी के बैंक समेत निजी क्षेत्र के बैंक लगातार इन दो राज्यों में अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं और वह भी सरकारी बैंकों की कीमत पर। रिपोर्ट में कहा गया है, वित्त वर्ष 2012-15 के दौरान जब सरकारी बैंक संपत्ति की गुणवत्ता में गिरावट व बढ़त को लेकर संघर्ष कर रहे थे तब क्षेत्रीय बैंक मजबूत कारोबारी मॉडल बना रहे थे ताकि बढ़त के अगले दौर में आक्रामकता के साथ भागीदारी कर सके। वास्तव में पुरानी पीढ़ी के इन बैंकों ने रणनीतिक तौर पर एकीकरण के चरण में कुछ बढ़त जाने दिया था, जिससे उनके परिचालन में मदद मिली थी। केरल में 11 फीसदी बाजार हिस्सेदारी वाले फेडरल बैंक को उधारी के कारोबार में दूसरा स्थान हासिल है जबकि सिटी यूनियन बैंक, करूर वैश्य बैंक और लक्ष्मी विलास बैंकों ने अपनी बाजार हिस्सेदारी दो से चार फीसदी पर बनाए रखा है। एचडीएफसी बैंक व ऐक्सिस बैंक की तरफ से मजबूत प्रतिस्पर्धा के बावजूद वे ऐसा करने में सफल रहे हैं।
 
अच्छी योजनाएं
 
इनकी कामयाबी की प्रमुख वजह एसएमई को लगातार सेवाएं मुहैया कराने की इनकी क्षमता है। एसएमई उधारी पर हमेशा से ही इन बैंकों का ध्यान र हा है और इस कारोबार ने लाभ व कम उधारी लागत के तौर पर इन्हें पुरस्कृत भी किया है। साथ ही क्षेत्रीय बैंक ग्राहक की जरूरत के हिसाब से उधारी देने में सक्षम रहे हैं। ऐसे एसएमई उधारी का औसत आकार 10-30 लाख रुपये रहा है, जो निजी क्षेत्र के कई बड़े बैंकों के 50-90 लाख रुपये से काफी कम है। एसएमई कर्ज की बाबत इन क्षेत्रों में सरकारी बैंकों ने अपेक्षाकृत काफी कम कोशिश की है। एंटिक स्टॉक ब्रोकिंग ने तमिलनाडु व केरल में एसएमई से विस्तृत बातचीत के बाद कहा है कि ये एनबीएफसी व माइक्रो फाइनैंस संस्थानों समेत दूसरे वित्तीय संस्थानों के मुकाबले क्षेत्रीय बैंकों को प्राथमिकता देते हैं। क्षेत्रीय बैंक व्यक्तिगत तौर पर सेवाएं देता है और वे बैंक के प्रबंधन तक पहुंच सकते हैं। दिलचस्प रूप से इसने यह भी कहा है कि क्षेत्रीय बैंकों के साथ कायापलट की अवधि बड़े बैंकों के मुकाबले काफी कम रही है।
 
अंडरराइटिंग
 
पिछले तीन से चार साल इन बैंकों के लिए भी साफ-सफाई वाली अवधि रही है। हालांकि ज्यादातर दबाव वाली परिसंपत्तियां लोहा-इस्पात व बुनियादी ढांचा क्षेत्र से जुड़ी हैं, जो वित्त वर्ष 2010-11 में दिए गए और उच्च गैर-निष्पादित आस्तियां वित्त वर्ष 2017 में नजर आईं।
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