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भारतीय समाज में अहमियत रखती हैं हामिद अंसारी जैसी शख्सियत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 30, 2017

हामिद अंसारी ने 10 वर्ष तक अपना काम एकदम खामोशी से किया। हमेशा अपने दिमाग की सुनी लेकिन कभी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे विवाद उत्पन्न हो। पूरी संभावना है कि अगस्त में अंसारी देश के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति का पद छोड़ देंगे। देश को उनकी कमी खलेगी। जाति तथा अन्य कारकों के चलते अंसारी देश के शीर्षस्थ पद पर नहीं पहुंच पाए। ऐसा नहीं है कि उनके जीतने की संभावना नहीं थी। आंकड़े पूरी तरह मौजूदा सरकार के पक्ष में हैं। इतना ही नहीं गुजरात दंगों के समय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में अंसारी ने गुजरात की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार के कामकाज को लेकर अपनी राय रखी थी। जाहिर है उनके नाम पर आम सहमति बनने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हालांकि जब पहली बार कांग्रेस ने उनको राज्यसभा के सभापति पद के लिए नामित किया था तो लोगों के मन में यह संदेह उपजा था कि पता नहीं वह संसद के उच्च सदन की कार्यवाही का संचालन कर पाएंगे या नहीं। लेकिन उन्होंने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया। वह पूरी साफगोई से अपनी बात रखते और जरूरत पडऩे पर कूटनीतिक तौर-तरीके भी अपनाते। यह उन्होंने भारतीय विदेश सेवा के अपने कार्यकाल में बखूबी सीखा था। आगे चलकर वह संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि बने और उन्होंने सऊदी अरब, ईरान और अफगानिस्तान में भारत के राजदूत के रूप में काम किया। ये सभी जगहें कूटनीतिक दृष्टिï से भारत के लिए बहुत अहमियत रखती हैं। 

 
सन 1990 के दशक के आखिरी वर्ष देश में चिंता लेकर आए थे। यह वह दौर था जब इस्लामिक देशों के संगठन की गतिविधियां भारत के लिए समस्या बन रही थीं। पाकिस्तान और सऊदी अरब उस मंच पर अक्सर कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना किया करते। अंसारी ने उस वक्त एक अलोकप्रिय लेकिन उचित रुख अपनाया और वह सोच की प्रक्रिया में बदलाव लाने में सहायक बने। उन्होंने दलील दी कि कश्मीर सऊदी अरब और ईरान के बीच इस्लामिक देशों के नेतृत्व की लड़ाई में एक छद्म मुद्दा बना हुआ है। उन्होंने नई दिल्ली से कहा कि वह इस्लामिक देशों के संगठन और सऊदी अरब द्वारा कश्मीर को लेकर की जा रही बातों की अनदेखी करे। उन्होंने सामरिक अंदाज में सऊदी अरब के साथ स्वतंत्र संबंध विकसित करने की भी वकालत की। उनकी इस सलाह के पीछे दो मुद्दे थे। एक तो मुस्लिमों के दो सबसे पवित्र धर्मस्थलों वाले देश से भारतीयों द्वारा स्वदेश भेजा जाने वाला धन और दूसरा यह कि सऊदी अरब केवल अमेरिका का एक विश्वस्त सहयोगी नहीं था बल्कि वह आने वाले कई वर्षों तक दुनिया का सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक देश भी बना रहने वाला था। भारत के लिए उससे सीखने को काफी कुछ था जहां तेल की आय से बने स्वतंत्र वेल्थ फंड कई तरह की सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चला रहे थे। खाड़ी देशों में से कई अब अमेरिका के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रह गए थे। ऐसे में भारत और चीन के लिए अवसर था। 
 
अंसारी ने यह भी कहा कि अगर सुन्नी इस्लामिक देश सोचते हैं कि सऊदी अरब को उनका इकलौता और निर्विवाद नेतृत्वकर्ता होना चाहिए तो उनको भारत की ओर देखना चाहिए। सन 2016 में मोरक्को के रबात में मोहम्मद वी विश्वविद्यालय में वैश्वीकृत विश्व में विविधता का समायोजन: भारत का अनुभव, विषय पर अपनी बात कहते हुए उन्होंने कुछ भुलावों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि अरब और इस्लाम, इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक साथ या एक दूसरे के लिए किया जाता है लेकिन क्या वास्तव में दोनों समानार्थी हैं? क्या समस्त अरब विश्व इस्लामिक है अथवा क्या इसका उलट एकदम सच है? सबसे बढ़कर क्या सभी तरह के इस्लामिक सोच का श्रेय अरबों को दिया जा सकता है? उन्होंने इससे इनकार करते हुए कहा कि भारत विविधता का सुंदर उदाहरण है जहां विविधता की स्वीकार्यता है और यह दुनिया में कहीं भी इतनी अधिक नहीं है। पाकिस्तान, मिस्र तथा अन्य देशों में शियाओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे पंथीय हमलों के बीच यह एक शक्तिशाली और सुविचारित वक्तव्य था। 
 
तथाकथित मुस्लिम मसलों पर उन्होंने समुदाय से खुलकर कहा कि वे सरकार द्वारा दी जाने वाली राहतों पर निर्भर रहना बंद करें। उन्होंने पटना में खुदाबख्श स्मृति व्याख्यान में कहा था कि पीडि़त दिखने की भावना काम नहीं आती है और मुस्लिमों को अन्य अल्पसंख्यकों के अनुभवों से सबक लेना चाहिए। वर्ष 2015 में ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरात की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित एक समारोह में उन्होंने कुछ ऐसे सच बोले जिनके चलते मुस्लिम समुदाय की ओर से उनकी आलोचना भी हुई। उन्होंने कहा था, 'यह स्पष्टï है कि समुदाय का एक अहम धड़ा एक दुष्चक्र में फंसा है और वह सांस्कृतिक रूप से बचाव की मुद्रा में उलझा हुआ है जहां वह खुद की प्रगति को नुकसान पहुंचा रहा है। परंपराओं को पवित्र बनाया जा रहा है लेकिन परंपराओं के पीछे के तर्कों को भुला दिया गया है। आधुनिकता की भावना को तवज्जो नहीं दी जा रही। ऐसी मानसिकता उस आलोचनात्मक सोच को प्रभावित करती है हो समुदाय की बेहतरी के लिए आवश्यक है। बदलाव को अंगीकृत नहीं किया जा रहा है।' ऐसे में उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि हामिद अंसारी जैसी तार्किक और बुद्घिमान शख्सियत को यूं ही गुम नहीं हो जाने दिया जाएगा। 
Keyword: vice president, election, BJP, NDA, हामिद अंसारी,
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