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ठोस उपाय जरूरी

संपादकीय /  June 29, 2017

ऐसे वक्त में जबकि देश के किसान लगातार अपनी उपज की बिक्री से होने वाली प्राप्तियों से असंतुष्टï होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं, सरकार ने वर्ष 2017 की खरीफ फसल के लिए जो मूल्य नीति तय की है वह उनकी दिक्कतों को और बढ़ा सकती है। प्रमुख खरीफ फसलों के लिए जो नया न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया गया है उसकी केंद्र सरकार द्वारा औपचारिक घोषणा करने के बजाय उसके बारे में राज्यों को सूचित कर दिया गया है। यह पिछले सत्र से मामूली ही ज्यादा है। ज्यादा बुरी बात यह है कि मोटे तौर पर कपास, मूंग और सूरजमुखी बीज आदि के लिए घोषित एमएसपी खेती में होने वाले वास्तविक व्यय से भी कम है। यह अनुमान कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के आकलन पर आधारित है। जाहिर सी बात है कि किसानों को आने वाले मौसम में विशुद्घ घाटे का सामना करना होगा। हां, तुअर और उड़द की दाल अवश्य अपवाद हैं लेकिन अन्य तमाम फसलों में मुनाफे का प्रतिशत बहुत कम होगा। यह बमुश्किल 2 से 4 फीसदी होगा। एमएसपी में इतनी मामूली बढ़ोतरी से किसानों का गुस्सा शांत होगा या और बढ़ेगा? 

 
ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कृषि उपज का सकल मूल्य भी बीते कई वर्षों से लगातार गिर रहा है। राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी के 2017 के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011-12 और 2015-16 के बीच अनाज और दालों का मूल्य 3 प्रतिशत गिरा। जबकि तिलहन में 13 फीसदी और चीनी में 1 फीसदी की गिरावट आई। फलों, सब्जियों और मसलों की बात करें तो वे ही ऐसी फसलें है जिनका मूल्य बढ़ा। हालांकि इन समूहों में भी कुछ मसलन प्याज, आलू और टमाटर के दाम गिरे। इसके चलते कई बार उन्होंने अपनी फसल यूंही फेंक दी। स्पष्टï है कि किसानों की बीज, उर्वरक, कीटनाशक और श्रम की लागत में कीमतों की तुलना में कहीं तेज इजाफा हुआ है। गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने नकद सब्सिडी की शुरुआत की लेकिन नुकसान की समुचित भरपाई नहीं हो सकी। 
 
इसलिए आश्चर्य नहीं कि देश के अलग-अलग राज्यों के किसान सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से यह मांग कर रहे हैं कि वह अपने चुनाव पूर्व वादे को निभाए और न्यूनतम समर्थन मूल्य को वास्तविक लागत से कम से कम 50 फीसदी ज्यादा तय करे। एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने भी यही अनुशंसा की थी। उसने कहा कि कृषि में होने वाली प्रगति का आकलन किसानों की आय में होने वाले इजाफे के आधार पर किया जाना चाहिए न कि उपज में होने वाली बढ़ोतरी के आधार पर। धान और गेहूं को छोड़ दिया जाए तो न्यूनतम समर्थन मूल्य अब तक किसानों के हित में अप्रभावी ही रहा है। बाजार में हस्तक्षेप करने वाले मूल्य समर्थन को अन्य फसलों पर भी लागू करके देखा जाना चाहिए। हालांकि उसके पहले यह सुनिश्चित करने वाले कदम उठाने होंगे कि यह प्रभावी और सफल साबित हो। नीति निर्माताओं को खेती किसानी के काम को लाभप्रद बनाए रखने के लिए अन्य तरीके भी तलाश करने होंगे। ऐसा ही एक तरीका हो सकता है मूल्य अंतर भुगतान व्यवस्था। यह विचार नीति आयोग के कार्य बल का है। इसमें उपज का आधार मूल्य तय करते हुए कहा गया है कि बाजार में अगर उपज इससे कम मूल्य पर बिकती है तो दोनों के बीच के अंतर की भरपाई की जानी चाहिए। चूंकि इस व्यवस्था में सरकारी खरीद का विकल्प नहीं है इसलिए इसे सभी फसलों पर आजमाया जा सकता है और बिना कोई अतिरिक्त भंडारण किए तमाम इलाकों में परखा जा सकता है। शुरुआत में इसे कुछ हिस्सों में प्रायोगिक तौर पर आजमाना चाहिए। 
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण, MSP,,
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