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नवाचार में भारत ने की तरक्की मगर विरोधाभास भी कम नहीं

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  June 28, 2017

नवाचार के संदर्भ में हाल ही में कुछ अच्छी खबरें आईं। भारत वर्ष 2017 के वैश्विक नवाचार सूचकांक में 60वें स्थान पर आ गया है जो एक साल पहले की तुलना में छह पायदान का सुधार दिखाता है। वर्ष 2015 में मिली 81वीं रैंकिंग से तुलना करें तो भारत ने नवाचार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो, बोस्निया हर्जेगोविना और मोरक्को जैसे देश भी उस समय 140 से अधिक देशों की रैंकिंग में भारत से ऊपर मौजूद थे। भारत में नवाचार के प्रयासों का अंदाजा अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के लिए दाखिल आवेदनों से भी लगाया जा सकता है। जिनेवा स्थित विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के आंकड़ों के मुताबिक भारत की तरफ से दायर पेटेंट आवेदनों की संख्या 8.3 फीसदी बढ़कर 1,529 हो गई जबकि एक साल पहले यह 1,423 रही थी।

 
इन घटनाओं ने कुछ लोगों को इस कदर उत्साहित कर दिया है कि वे भारत में बड़ी कंपनियों के साथ ही सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी नवाचार के बड़े पैमाने पर घटित होने का दावा करने लगे हैं। दुर्भाग्य से हाल ही में घोषित उच्च शिक्षण संस्थानों की टाइम्स रैंकिंग के अनुसार दुनिया के शीर्ष 100 शिक्षण संस्थानों की सूची में भारत का कोई भी विश्वविद्यालय जगह नहीं बना पाया है। पिछले ही साल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) को एशिया के सर्वाधिक नवोन्मेषी विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में निचला पायदान मिला था। रॉयटर्स की एशिया के सर्वाधिक नवोन्मेषी विश्वविद्यालयों की सूची में आईआईटी 71वें स्थान पर रहा था। यह सूची विज्ञान को आगे बढ़ाने, नई तकनीकों की खोज और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए मददगार तकनीकें ईजाद करने में पहल के आधार पर तैयार की गई थी। आईआईटी के अलावा भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलूरु इस सूची में शामिल एक अन्य भारतीय संस्थान था जिसे 72वां स्थान मिला था। 
 
सवाल यह है कि अपने उच्च शिक्षण संस्थानों के वैश्विक रैंकिंग में लगातार निराशाजनक प्रदर्शन करने वाले देश में नियमित तौर पर किस तरह का नवाचार चल रहा होगा? ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत में 70 फीसदी से भी अधिक पेटेंट आवेदन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ही तरफ से दाखिल किए गए हैं। इसमें भारतीय कंपनियों और विद्वानों की हिस्सेदारी केवल 30 फीसदी ही है। अधिकांश भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है जिसके चलते वे अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में महज शिक्षा की दुकानें बनकर रह जाती हैं। यही वजह है कि भारत में शोध के मामले में केवल दो संगठन- आईआईटी और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ही प्रतिष्ठा हासिल कर पाए हैं। इसकी वजह यह है कि भारत में प्रति लाख आबादी पर शोधकर्ताओं की संख्या महज 15 है। इस अनुपात के साथ भारत सबसे नीचे के पांच देशों में पहुंच जाता है। 
 
ऐसा लगता है कि भारत में विरोधाभासों की कोई कमी नहीं है। जैसे, स्टार्टअप को प्रोत्साहन देने के मामले में भारत दुनिया का तीसरा बड़ा देश बन चुका है लेकिन यहां कामयाब नवाचार का अभाव है। भारतीय उद्यमियों के बड़ी संख्या में नाकाम होने की बेहद चिंताजनक स्थिति नवाचार की अहमियत को नकारने के ही कारण है। यही वजह है कि कामकाज शुरू होने के पहले पांच वर्षों में ही करीब 90 फीसदी स्टार्टअप असफल हो जाते हैं।
 
भारत दवाओं के भरोसेमंद एवं किफायती विनिर्माता के तौर पर स्थापित हो गया है और दुनिया भर में 20 फीसदी जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति कर रहा है लेकिन स्वास्थ्य संबंधी सतत विकास लक्ष्य पर वह 188 देशों में 143वें स्थान के साथ निराशाजनक स्थिति में है। यहां एक और विरोधाभास सामने आता है। शोध एवं विकास कार्यों पर कर रियायतें देने के मामले में भारत शीर्ष पर है। इसके बावजूद भारत की गिनती शोध के मामले में पिछलग्गू के ही तौर पर होती है। इसकी वजह यह है कि भारत सहयोगपूर्ण शोध एवं विकास टैक्स क्रेडिट (शोध संकायों, विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में शोध के लिए मदद के नाम पर खर्च के लिए रकम) और नवाचार के वाणिज्यिक इस्तेमाल को प्रोत्साहन देने के मामले में पिछड़ा हुआ है। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ऐंड इनोवेशन फाउंडेशन के एक अध्ययन में यह दावा किया गया है।
 
सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि भारतीय शोध एवं शैक्षणिक संस्थानों की खराब स्थिति के चलते न केवल सरकार बल्कि हरेक क्षेत्र में प्रतिभाओं का अकाल पड़ गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले 60 वर्षों में भारत कोई भी यादगार आर्थिक प्रभाव डालने लायक अनूठा नवाचारी विचार पेश नहीं कर पाया है। आजादी के बाद से कोई भी भारतीय नागरिक तकनीकी क्षेत्र में नोबेल नहीं जीत पाया है। वर्ष 1930 में सी वी रामन ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का नोबेल जीता था। कई लोग कहते हैं कि असली भारतीय नवाचार पिरामिड के निचले स्तर से संबंधित गतिविधियों या भारतीयों के पसंदीदा विषय 'जुगाड़' से ही जुड़ा रहता है। जहां प्रबंध की कई पुस्तकों में इसकी तारीफ की गई है, वहीं इसी वजह से छोटे व्यवसाय नई तकनीक में निवेश से परहेज करते हैं। 'कम के लिए अधिक' के प्रति इस सामूहिक झुकाव से शायद ही वास्तविक नवाचार के लिए माहौल बनाने में मदद मिल सकती है। भारतीय कॉर्पोरेट जगत का शोध एवं विकास गतिविधियों पर नाममात्र का खर्च (बिक्री के 1 फीसदी से भी कम) इसका सबूत है। 
 
पांच भारतीय विनिर्माता कंपनियों में से केवल एक ही काम के दौरान प्रशिक्षण देती हैं जबकि चीन में 92 फीसदी और दक्षिण कोरिया में 42 फीसदी कंपनियां ऐसा करती हैं। भारतीय पेटेंट कार्यालय के आंकड़े भी निराशाजनक तस्वीर दिखाते हैं। वर्ष 2015-16 के दौरान दिए गए कुल 6326 पेटेंट में से केवल 918 ही भारतीय आवेदकों को मिले हैं। इस दौरान भारतीय कंपनियों की तरफ से पेटेंट के 13,066 आवेदन दाखिल किए गए थे जो कुल आवेदन का महज 28 फीसदी था। इस तरह वैश्विक नवाचार सूचकांक से मिली अच्छी खबर भारत के लिए खुशी मनाने की शायद ही एक वजह है। 
Keyword: india, rating, नवाचार,
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