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एलटीसीजी घोटाला और सेबी का रुख

देवाशिष बसु /  June 28, 2017

लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ घोटाले के बाद सेबी को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ा है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु 

 
गत 19 जून को मुंबई में प्रतिभूति अपील पंचाट (एसएटी) में सजी एक अदालत में तमाम वरिष्ठï अधिवक्ता नजर आ रहे थे। वहां इकबाल चागला और जनक द्वारकादास थे जिन्हें मुंबई का सर्वश्रेष्ठï अधिवक्ता माना जाता है। वहीं एक अन्य शीर्ष अधिवक्ता रफीक दादा और उनके साथी वरिष्ठï वकील विक्रम ननकानी और मुस्तफा डॉक्टर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की ओर से सुनवाई के लिए मौजूद थे। लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) के 60 से अधिक मामले उस दिन के लिए सूचीबद्घ थे। सुनवाई छह घंटे से अधिक चली। वे दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ कर के लिए कीमत में छेड़छाड़ के मामले की सुनवाई कर रहे थे। सरकार इस घोटाले का खात्मा करना चाहती है लेकिन सेबी इस मामले पर एकदम विचित्र रुख अपनाए हुए है। 
 
दोनों पक्षों को सुनने के बाद एसएटी के पीठ ने सेबी से कहा कि वह एलटीसीजी घोटाले से संबंधित सभी दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे। यह पहला अवसर है जब एसएटी ने इस मसले पर गंभीरता दिखाई है। सेबी को अब अपनी बात स्पष्टï करने में मेहनत करनी होगी। इसे समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि यह घोटाला होता कैसे है और अब तक सेबी ने इसे लेकर क्या कदम उठाए हैं? काला धन रखने वाले लोग जो अपनी नकदी को दीर्घावधि के करमुक्त पूंजीगत लाभ में बदलना चाहते हैं, वे बाजार संचालकों के साथ काम करके ऐसी सूचीबद्ध कंपनियों की पहचान करते हैं जो सुसुप्तावस्था में हैं। एक बार जब लाभार्थी ऐसी कंपनियों के शेयर खरीद लेता है तो उनकी कीमतों को फर्जी तरीके से बढ़ाना शुरू कर दिया जाता है। एक वर्ष बाद परिचालक लाभार्थियों से कहता है कि वे धनशोधन के लिए नकदी का बंदोबस्त करें। कई छोटे मोटे कारोबारी इस नकदी को चेक में तब्दील करते हैं और फिर उसे बढ़ेचढ़े शेयरों के एक छद्म खरीदार के खाते में डाल दिया जाता है। अब लाभार्थी इन शेयरों को बेच देता है और ब्रोकर से चेक ले लेता है। पूंजीगत लाभ उस तक करमुक्त होकर आता है क्योंकि वह लंबी अवधि के निवेश में बदल चुका है।
 
केंद्र सरकार इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए कई कदम उठाती रही है। आयकर विभाग के कोलकाता स्थित जांच महानिदेशालय ने विस्तृत जांच की। इस दौरान कई प्रतिभागियों की लिखित स्वीकारोक्तियां ली गईं। उसने आगे की कार्रवाई के लिए यह रिपोर्ट सेबी को अग्रसरित कर दी। परंतु बाजार नियामक ऐसा नहीं कर सका। नोटबंदी और काले धन के खिलाफ अभियान के दौरान सेबी ने गत वर्ष 29 दिसंबर को एक सूचना ज्ञापन तैयार किया। इस ज्ञापन में मोटे तौर पर जांच महानिदेशालय के काम को खारिज करने का प्रयास किया गया था। उसने कहा कि कोई दस्तावेजी या स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिला है जो परिचालकों के कथन का समर्थन करता हो। उसने यह भी कहा कि जांच दल द्वारा दी गई रिपोर्ट कुछ भी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इतना ही नहीं यह भी कहा गया कि परिचालकों, शेयर दलालों और परिचालक संस्थाओं के वक्तव्यों के आधार पर जो आरोप लगाए गए हैं वे भी वैधानिक जांच प्रक्रिया में खरे नहीं उतरेंगे।
 
सेबी ने अपनी दलील में कहा कि उसकी प्रमुख चिंता प्रतिभूति कानूनों के उल्लंघन से जुड़ी हुई है। ये मामले प्रमुख तौर पर कर वंचना के रूप में सामने आ रहे हैं। बहरहाल, अगर कीमतों में कहीं कोई छेड़छाड़ हुई है तो सेबी कार्रवाई करेगा। इस ज्ञापन पर दो पूर्णकालिक सदस्यों, विधिक, निगरानी और जांच विभागों के शीर्ष और मध्यम स्तर के अधिकारियों और सेबी के तत्कालीन चेयरमैन यू के सिन्हा के हस्ताक्षर थे। नोट में यह बात भी दर्ज की गई कि कुल 145 मामलों की जांच की जा रही थी जिनमें से 55 मामलों में जांच का काम पूरा हो चुका था। सेबी ने 43 मामलों में जांच पूरी हो जाने के बावजूद लाभार्थियों के खिलाफ कोई आदेश पारित नहीं किया। बहरहाल, सेबी ने ऐसे ही तथ्यों वाले 12 अन्य मामलों में अंतरिम आदेश पारित किया। क्या सेबी इस प्रकार चुनिंदा मामलों में कार्रवाई कर सकता है? एसएसटी में बहस इसी बात पर केंद्रित थी। 
 
अब जबकि एसएटी ने तमाम दस्तावेज पेश करने को कहा है तो क्या होगा? क्योंकि सेबी ने एलटीसीजी घोटाले पर जो भी निर्णय दिए वे इन्हीं दस्तावेजों पर आधारित थे। सेबी के लिए अब यह समझाना आसान नहीं होगा कि आखिर क्यों उसने 12 फर्म के खिलाफ तो कार्रवाई की जबकि 43 को यूं ही जाने दिया। ऐसा प्रतीत होता हैकि अब उसने 143 में से 100 से अधिक मामलों की जांच पूरी कर ली है। अगर एसएटी सही मायनों में इस मामले की पड़ताल करता है तो उसे पता चल जाएगा कि सेबी ने मार्च के आरंभ में इस मामले में अजीब रुख अपना लिया था जब कीमत छेड़छाड़ के 12 मामले और एलटीसीजी वंचना के तमाम मामले एसएटी के समक्ष सुनवाई के लिए आए थे। उसके पश्चात सेबी ने एक हलफनामा देकर कहा था कि वह सूचना ज्ञापन की सामग्री और उसके इरादों को स्पष्ट करने को लेकर सक्षम प्राधिकार की मंजूरी हासिल करेगा। विशेषज्ञों ने इस बात पर अचरज भी जताया कि सूचना ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले सेबी चेयरमैन से बड़ा सक्षम प्राधिकारी भला और कौन होगा? सेबी के अधिवक्ता ने दलील दी कि चेयरमैन और दो पूर्णकालिक सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन बोर्ड के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करता। साफ जाहिर होता है कि एसएटी को कई सवाल करने होंगे और सेबी को उतने ही जवाब देने होंगे।
 
एक अन्य बड़ा मुद्दा यह है कि आखिर क्यों सेबी इस पूरी शृंखला की कमजोर कड़ी को लेकर इस कदर नरम बना रहा। यह कड़ी हैं खरीदार की ओर के शेयर दलाल जो नकदी को चेक में बदलने का काम करते रहे। यही चेक कर मुक्त पूंजीगत लाभ के रूप में लाभार्थियों तक जाते। दलालों को अपने ग्राहक को ठीक तरह से जानना चाहिए। सेबी कम से कम इतना तो कर ही सकता है कि आईटी विभाग के साथ काम करके उन दलालों का पता लगाए जो धन शोधन में मदद कर रहे। पिछले चेयरमैन के उलट हो सकता है नए चेयरमैन और राजस्व सचिव दोनों इस पूरे मामले के बारे में कम से कम उतनी जानकारी चाहेंगे जितनी कि एसएटी चाहता है। 
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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