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जनरल मोटर्स : सिमटता कारोबार, परेशान डीलर और कामगार

सोहिनी दास /  06 27, 2017

प्रतिस्‍पर्धी दौर की दौड़ में पिछड़ती जीएम

जनरल मोटर्स के तलेगांव संयंत्र में इन दिनों तनाव पसरा हुआ है। बिक्री, विपणन, वित्त और प्रशासन विभागों में काम कर रहे करीब 250 कर्मचारियों को पिछले महीने जाने को कह दिया गया था। अब संयंत्र के परिचालन विभाग से जुड़े लोगों में अपनी नौकरी को लेकर आशंका देखी जा रही है। हालांकि विनिर्माण गतिविधियों से जुड़े लोगों को अभी जाने को नहीं कहा गया है लेकिन पिछले दिनों के अनुभव उन्हें चिंता में डाले हुए हैं। एक कर्मचारी ने अपना नाम सामने न आने की शर्त पर कहा, 'हालांकि इस संयंत्र में निर्यात के लिए वाहनों का उत्पादन जारी रहेगा लेकिन हाल की गतिविधियों से काफी अनिश्चितता पैदा हुई है और लोग बड़ी शिद्दत से नौकरी तलाशने लगे हैं।'

जनरल मोटर्स के इस संयंत्र में करीब 2,500 कर्मचारी काम कर रहे हैं। इसी तरह वैश्विक परिचालन के लिए काम करने वाले बेंगलूरु स्थित तकनीकी केंद्र में भी करीब इतने ही लोग तैनात हैं। लेकिन जनरल मोटर्स ने यह घोषणा कर सनसनी मचा दी है कि वह दिसंबर से भारत में अपने शेव्रले ब्रांड की गाडिय़ों की बिक्री नहीं करेगा। इस फैसले से बिक्री एवं विपणन विभाग में तैनात करीब 400 लोगों की नौकरी खतरे में पड़ गई है। जीएम की इन गाडि़यों की बिक्री करने वाले डीलरों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े करीब 8,500 लोगों की नौकरी पर भी इसका असर पडऩे की आशंका है। डीलर कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने के बारे में विचार कर रहे हैं। वे कंपनी की तरफ से दिए जाने वाले मुआवजा पैकेज से संतुष्ट नहीं हैं। जीएम के लिए भारत में कारोबार का दशक भर लंबा सफर काफी मुश्किल रहा है। ऐसा लगता है कि भारत से अपना कारोबार समेटना भी उसके लिए आसान नहीं रहने वाला है।

कभी दुनिया की सबसे बड़ी ऑटो कंपनी रही जनरल मोटर्स अब तीसरे स्थान पर खिसक चुकी है। टोयोटा और फोक्सवैगन ने जीएम को बिक्री के मामले में पीछे धकेल दिया है। लेकिन जीएम अब संख्या के पीछे दौड़ भी नहीं रही है। बिक्री बढ़ाने के बजाय जीएम ने अपना ध्यान मुनाफा कमाने पर देना शुरू कर दिया है। इस तरह यह ऑटो कंपनी अपने लिए फायदेमंद साबित नहीं हो रहे बाजारों से अपना काम समेटने की कवायद में लगी हुई है।

जीएम ने मई में न केवल भारत में अपनी कारों की बिक्री रोकने का ऐलान किया बल्कि दक्षिण अफ्रीका से भी 90 साल पुराना अपना नाता खत्म कर दिया। जीएम दक्षिण अफ्रीका स्थित अपने उत्पादन संयंत्र को जापान की इसुजू को बेचने जा रही है। इस साल की शुरुआत में उसने अपने ओपल ब्रांड को भी प्रतिद्वद्वी कंपनी प्यूजो के हाथों बेच दिया। इसकी वजह यह थी कि ओपल वर्ष 1999 से ही लगातार सालाना 1 अरब डॉलर का नुकसान उठा रहा था। जीएम वर्ष 2015 में ही रूस से बाहर हो चुकी है और ऑस्ट्रेलिया में भी उसने वाहन उत्पादन बंद कर दिया था।

जीएम के कारोबारी रवैये में बदलाव की शुरुआत 2014 में ही हो गई थी। मेरी बारा के चेयरपर्सन एवं मुख्य कार्याधिकारी बनने के बाद से जनरल मोटर्स ने दुनिया भर में फैले अपने 13 संयंत्रों को या तो बंद कर दिया है या फिर बेच दिया है। कंपनी के शीर्ष प्रबंधन ने बिक्री में बढ़ोतरी के बजाय लाभ बढ़ाने का निर्णय काफी सोच-समझकर किया है। उसी राह पर चलते हुए बारा ने जीएम की 1 अरब डॉलर वाली भारतीय योजना पर पूर्ण विराम लगाने की घोषणा कर दी। अनुमान है कि जीएम को भारत में करीब 8,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि कंपनी की तरफ से इसकी पुष्टि नहीं की गई है।

जीएम इंडिया के एक प्रवक्ता कहते हैं, 'जीएम अपने अंशधारकों की पूंजी को लगाने के पहले हालात का आकलन करती है। इस दौरान बाजार के अगुआ की हैसियत हासिल करने की तरफ बढऩे वाले रास्ते और दीर्घावधि लाभार्जन पर नजरें टिकी होती हैं।' विश्लेषकों के मुताबिक, भारत प्राथमिक रूप से छोटी कारों का बाजार है जहां कारों की कुल बिक्री में इनकी हिस्सेदारी 70 फीसदी से भी अधिक होती है। इन छोटी कारों को बनाने के लिए अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत होती है लेकिन इनसे होने वाला मुनाफा तुलनात्मक रूप से कम होता है।

जीएम अगले दशक तक वैश्विक स्तर पर अपना परिचालन लाभ नौ से दस फीसदी पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। वर्ष 2017 की पहली तिमाही में जीएम ने वैश्विक स्तर पर 8.2 फीसदी का एबिटा मार्जिन हासिल किया था। भारत में जीएम का सफर अब एक तरह से अपने आखिरी मुकाम पर जा पहुंचा है। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा, 'हमें यह यकीन हो गया कि भारत में निवेश बढ़ाने की योजना का मनचाहा नतीजा नहीं हासिल कर पाएंगे। इससे नेतृत्व की स्थिति हासिल करने में भी हमें कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही हम घरेलू बाजार में दीर्घावधि लाभपरकता ही हासिल कर पाएंगे।'

लेकिन सवाल यह है कि आखिर भारत में ऐसा क्या हुआ कि दुनिया की शीर्ष ऑटो कंपनी में शुमार जनरल मोटर्स बुरी तरह नाकाम हो गई? जीएम ने 1990 के दशक के आखिर में ओपल एस्ट्रा ब्रांड के साथ भारतीय बाजार में दस्तक दी थी। उसने ओपल को अपने लोकप्रिय ब्रांड वॉक्सहाल और शेव्रले के ऊपर तरजीह दी थी। लेकिन ओपल एस्ट्रा कार को सात लाख रुपये से अधिक मूल्य वर्ग में पेश किए जाने से यह भारतीय बाजार में फौरी कामयाबी नहीं हासिल कर पाई।

वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में सरकार ने मारुति सुजूकी में अपनी हिस्सेदारी कम कर दी थी जिसके बाद से मारुति ने प्रतिस्पद्र्धात्मक रुख अख्तियार कर लिया था। दरअसल कोरियाई ऑटो कंपनी हुंडई भारतीय बाजार पर अपना कब्जा बढ़ाने में लगी हुई थी। जीएम ने बदलते माहौल में अपनी छोटी सिडैन कार ओपल कोरसा पेश की। बाद में वह उसका हैचबैक संस्करण भी लेकर आई। हालांकि उस समय तक हुंडई की छोटी कार सैंट्रो भारत में खासी लोकप्रिय हो चुकी थी। सैंट्रो भारतीय जरूरतों के हिसाब से काफी सटीक कार थी और उसे लोकप्रिय बनाने के लिए कंपनी ने जानी-मानी हस्तियों को भी प्रचार के लिए जोड़ा था।

जब जीएम को यह अहसास हुआ कि उसे भारत में लोकप्रिय होने के लिए एक छोटी कार की जरूरत है तो फिर वह शेव्रले स्पार्क और बीट लेकर आई। इसके नतीजे भी अच्छे रहे। वर्ष 2010-11 में जीएम की बाजार हिस्सेदारी 4 फीसदी वृद्धि के साथ 110,000 इकाई पर पहुंच गई। वर्ष 2000 के दशक के अंतिम वर्षों में यूटिलिटी व्हीकल टवेरा ने भी जीएम की बिक्री बढ़ाने में खास योगदान दिया था। लेकिन कंपनी कामयाबी के इस सिलसिले को आगे नहीं जारी रख पाई। उसने छोटी कारों के नए मॉडल नहीं पेश किए और तेजी से बढ़ते स्पोट्र्स यूटिलिटी व्हीकल श्रेणी से भी दूरी बनाए रखी।

पीडब्ल्यूसी के पार्टनर अब्दुल मजीद का मानना है कि अमेरिकी कार कंपनियां आम तौर पर छोटे कार बाजार की जरूरतों को ठीक से नहीं समझ पाती हैं। वह कहते हैं, 'अमेरिका का कार बाजार भारत की तुलना में काफी बड़ा है। भारत में कामयाब होने के लिए आपके पास खास भारतीय जरूरतों के हिसाब से रणनीति होनी चाहिए लेकिन जीएम के पास उसका अभाव था।'

विश्लेषकों के मुताबिक भारत में जीएम की नाकामी की एक बड़ी वजह यह रही कि वह छोटी कारों के वर्ग में लगातार नए उत्पाद नहीं पेश कर पाई। वहीं चीन के बाजार में अब छोटी कारों के बजाय लोग सिडैन को तरजीह देने लगे हैं तो वहां पर जीएम की स्थिति काफी बेहतर है। जीएम की यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी कंपनी रेनॉ ने भारत में तेजी से बढ़ते एसयूवी वर्ग में अपने लिए काफी संभावनाएं देखी और उसके कॉम्पैक्ट एसयूवी डस्टर को भारत में काफी पसंद भी किया गया। डस्टर की कामयाबी ने ही रेनॉ को भारत में कॉम्पैक्ट छोटी कार क्विड पेश करने का भरोसा दिलाया। 

बदलते कारोबारी माहौल के अनुरूप खुद को ढाल पाने में नाकाम रही जीएम की बाजार हिस्सेदारी भी लगातार घटती चली गई। वित्त वर्ष 2016-17 में भारतीय यात्री वाहन बाजार में जीएम की हिस्सेदारी घटकर महज 0.85 फीसदी ही रह गई। हालांकि जीएम की चेयरपर्सन मेरी बारा ने 2015 तक भारतीय कारोबार को लेकर निराशाजनक रुख नहीं अपनाया था। उन्होंने भारत में उत्पादन गतिविधियों को बढ़ाने के लिए 1 अरब डॉलर की निवेश योजना का ऐलान किया था। इससे भारत में 10 नए उत्पाद पेश करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन जनवरी, 2017 में कंपनी ने इस निवेश योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और यह परखने में लग गई कि क्या इस निवेश योजना से उसे भारतीय बाजार में कोई वाणिज्यिक लाभ मिल पाएगा?

इस बीच भारत में जीएम के सबसे पुराने संयंत्र हलोल में कामगारों के आंदोलन के कई मामले सामने आने लगे। इस साल अप्रैल में बंद किए जाने के बाद भी हलोल संयंत्र के स्थायी कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना और स्थानांतरण आदेशों के विरोध में प्रदर्शन करते रहे हैं। इन परेशानियों को देखकर हलोल संयंत्र खरीदने की इच्छुक चीनी कंपनी शांघाई ऑटोमोटिव इंडस्ट्री कॉर्प अपनी योजना पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर हो गई है। हाल ही में शांघाई कॉर्प ने कहा है कि जीएम के साथ हलोल पर हुआ करार श्रम विवादों के निपटारे पर ही निर्भर करेगा।

बहरहाल जीएम ने तलेगांव संयंत्र में अपना परिचालन काफी हद तक सीमित कर लिया है। इस संयंत्र की उत्पादन क्षमता 160,000 वाहनों की है। फिलहाल यहां पर मैक्सिको और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों को निर्यात करने के लिए शेव्रले बीट गाडिय़ां बनाई जा रही हैं। जल्द ही बीट का सिडैन संस्करण भी लाने की तैयारी है। जीएम तलेगांव संयंत्र को किसी कंपनी को बेचने का भी फैसला कर सकती है। एक सूत्र के मुताबिक जीएम तलेगांव संयंत्र किसी ऐसी कंपनी को बेच सकती है जो उसके लिए ठेके पर वाहनों का उत्पादन जारी रखे। जीएम इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक काहेर काजेम इन अटकलों पर कोई भी टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं।
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