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भारतीय मुसलमान या मुस्लिम भारतीय के रूप में पहचान!

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  June 27, 2017

मध्य प्रदेश में पिछले दिनों 15 युवाओं को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वे कथित रूप से चैंपियंस ट्रॉफी क्रिकेट प्रतियोगिता के फाइनल में पाकिस्तान की जीत का उत्सव मना रहे थे। इस दलील के आधार पर देखा जाए तो ब्रिटेन को तो उन सभी भारतीयों को गिरफ्तार कर लेना चाहिए जिनके पास ब्रिटेन की नागरिकता है लेकिन वे क्रिकेट मैच में भारत का समर्थन करते हैं। 

 
आश्चर्य नहीं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे होने पर किसी ने कहा था, 'भारतीय मुस्लिमों पर कभी इस कदर दबाव नहीं था जितना कि फिलहाल है।' यह बात मुझे तीन दशक पुरानी एक घटना की याद दिलाती है जब मैं एक बड़े कई संस्करण वाले समाचार पत्र में काम किया करता था। आईसीएस के एक प्रतिष्ठिïत पूर्व सदस्य और एक अत्यंत विशिष्टï परिवार के वंशज ने समाचार पत्र के लिए एक आलेख लिखा। आलेख के अंत में उनका परिचय एक भारतीय मुस्लिम के रूप में दिया गया था। जबकि ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उनका नाम ही पाठकों को उनके धर्म के बारे में सबकुछ बताने के लिए पर्याप्त था। कुछ दिन बाद उन्होंने संपादक को पत्र लिखकर कहा कि उनका परिचय एक मुस्लिम भारतीय के रूप में दिया जाना चाहिए था बजाय कि भारतीय मुस्लिम के। जाहिर सी बात है उनके लिए यह बात मायने रखती थी। इस बात ने हमें काफी चकित किया था। हालांकि उन्होंने देश में मुस्लिमों की पहचान की समस्या को सबसे संक्षिप्त स्वरूप में प्रस्तुत किया था। तब से अब तक समस्या समाप्त नहीं हुई बल्कि इसने और बुरा रूप अख्तियार कर लिया है। इसमें संघ परिवार की भी भूमिका रही है। 
 
हमेशा राजनीति
 
इस पत्र को भी प्रकाशित किया गया। कार्यालय में इसके बारे में बातचीत आरंभ हो गई। मसखरी करने वाले लोगों ने कहा कि सभी लेखकों को उनके धर्म के आधार पर ही चिह्निïत किया जाना चाहिए। मसलन: हिंदू भारतीय, ईसाई भारतीय, सिख भारतीय आदि। परंतु संपादकीय पृष्ठï के प्रभारी को यह विचार रास नहीं आया। इस पत्र के बाद हममें से कुछ लोगों ने यह सवाल भी किया कि आखिर क्यों ऐसे विशिष्टï व्यक्ति ने अपनी मुस्लिम पहचान पर जोर देने का आग्रह किया। आखिर उन्होंने सैयद शहाबुद्दीन की तरह बात क्यों की? भारतीय विदेश सेवा के सदस्य रहे सैयद शहाबुद्दीन बाद में राजनेता बन गए और सन 1980 और 1990 के दशक में वह भारतीय मुस्लिमों के प्रवक्ता के समान रहे। 
 
हमने जो सवाल उठाए थे, दरअसल भारतीय मुस्लिम समुदाय के ये दोनों शीर्ष सदस्य हमें और बाकी मुसलमानों तक को वही बताने की कोशिश कर रहे थे। सवाल यह है कि तब चिंतित होने की कौन सी बात है? शहाबुद्दीन का इस वर्ष मार्च में निधन हो गया। उनकी स्पष्टï राजनीतिक वजह थीं लेकिन अन्य सज्जन का क्या? उनकी तो कोई राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा भी नहीं थी। कांग्रेस की बात करें तो उसने भारतीय मुसलमानों को हमेशा केवल एक राजनीतिक समूह के रूप में देखा है और हमेशा उनके वोटों को ही अपने लिए अहमियत दी है। या फिर क्या आरएसएस और भाजपा ने उनको हमेशा के लिए हिंदुओं के दुश्मन के रूप में चित्रित किया? क्या वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि कांग्रेस उनको धोखा दे रही थी? क्या इंदिरा गांधी ने धीरे-धीरे जो दूरी बनानी शुरू की उसने इसे गति प्रदान की? या फिर राजीव गांधी सरकार ने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का जो आदेश दिया उसकी वजह से ऐसा हुआ? क्या वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि भाजपा उनके पीडि़त दिखने के सिंड्रोम को विनियोजित कर रही है और हिंदुओं के मन में यह अहसास भर रही है कि दरअसल हिंदू पीडि़त हैं? बहुसंख्यकों के मन में पीडि़त होने का अहसास भरना उस वक्त एक नई नीति थी। पश्चिम एशिया के देशों ने तब से ही इसे सफलतापूर्वक अपना रखा है। 
 
सिर्फ पराभव 
 
वर्ष 1986 के बाद के 30 वर्ष में यह बात एकदम स्पष्टï हो गई कि उन दोनों पढ़े लिखे मुस्लिमों का डर सही था। उसके पीछे पर्याप्त वजह थी। मुस्लिम उतने ही अहम रह गए जितने कि शतरंज के खेल में प्यादे। उनकी तादाद तो अच्छी खासी होती है लेकिन उनके पास ताकत कतई नहीं होती। इस बात का जो नतीजा निकला वह सर्वथा अप्रत्याशित था। ठीक जिस तरह आरएसएस-भाजपा के शहरी समर्थकों में शामिल उच्चवर्ण के हिंदुओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनका नेतृत्व कम शहरी लोगों की ओर अपना आधार बना लेगा, उसी तरह उक्त दोनों मुस्लिम सज्जनों ने भी शायद यह अनुमान नहीं लगाया होगा कि उनके समुदाय का शीर्ष नेतृत्व भी उन लोगों के हाथ में चला जाएगा जो राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों के बारे में एक अलग तरह का विचार रखते हैं।
 
परंतु जब राजनीति में धर्म और राष्ट्रवाद को शामिल किया जाता है तो वास्तव में यही होता है। फिर चाहे यह भाजपा की शैली में  हो या तमाम अन्य गैर दक्षिण भारतीय राजनीतिक दलों के तर्ज पर। यह बात अल्पसंख्यकों को बतौर एक समूह राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बनाती है लेकिन इसके साथ ही साथ समूह के लोगों की संवेदनशीलता में भी यह इजाफा कर देती है। 
 
इस बदलाव का पूरा असर नेतृत्व, नीति और अन्य तौर तरीकों में महसूस किया जा सकता है। ऐसे में अब भाजपा के लिए मुस्लिम केवल सामाजिक महत्त्व के रह गए हैं क्योंकि गैर मुस्लिम बातचीत उन्हें हिंदू मतों को एकजुट करने का अवसर देती है। शेष गैर दक्षिण भारतीय राजनीतिक दलों की बात की जाए तो वे केवल राजनीतिक तौर पर मायने रखते हैं। वे सामाजिक तौर पर मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं करते क्योंकि इससे उनके हिंदू समर्थक नाराज हो सकते हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पहले और दूसरे कार्यकाल में यह प्रयास किया गया और इसकी कीमत उनको 2014 के आम चुनाव में चुकानी पड़ी थी। निकट भविष्य में भी इसमें बदलाव आने की उम्मीद नहीं है और यह सिलसिला जारी रहेगा।
Keyword: india, muslim, madhya pradesh,,
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