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देश में नई कर व्यवस्था कितनी मजबूत?

अजय शाह /  June 27, 2017

मौजूद कर ढांचों की बोझ उठाने की क्षमता और उन पर पड़ रहे बोझ के बीच का अंतर उनके क्रियान्वयन और सफलता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
जब कोई पुल कमजोर होता है और एक भारी ट्रक उस पर से गुजरने का प्रयास करता है तो पुल ढह जाता है। हमें सार्वजनिक प्रशासन की भारवहन क्षमता का ख्याल रखना होगा। हमें धीरे-धीरे सावधानी से कम वजन डालना चाहिए और यह भरोसा होने के बाद ही वजन बढ़ाना चाहिए कि व्यवस्था उसे सहन करने में सक्षम है। जीएसटी के जिस डिजाइन को लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, वह अपनी उच्च दरों और जटिल नियमों के साथ अत्यंत भारी बोझ है। जिन 12 बड़ी कंपनियों को नई दिवालिया प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है उनका बोझ भी व्यवस्था को देखते हुए कोई कम नहीं है। हम एक संगठनात्मक समस्या की ओर बढ़ रहे हैं। 
 
दौडऩे के पहले हमें चलना सीखना चाहिए। यह साधारण सा विचार भी सार्वजनिक प्रशासन के लिए दूरगामी परिणाम ला सकता है। हर सरकारी व्यवस्था की एक क्षमता होती है। अगर हम किसी कमजोर व्यवस्था से यह कहेंगे कि वह बड़ी चुनौतियों का सामना करे तो उसके भ्रष्टïाचार और प्रवर्तन संबंधी कमियों का शिकार हो जाने की पूरी आशंका रहती है। जरा एक सरकारी कार्यालय पर विचार कीजिये जो जमीन का लेखा संभालता है। मान लीजिए कि अभी वह रोजाना 50 लेनदेन निपटा रहा है और अचानक उस पर 500 लेनदेन हर रोज का बोझ पड़ जाए। ऐसा होने पर उसका काम लंबित ही नहीं होता जाएगा बल्कि वही संगठनात्मक दिक्कत भी पैदा होगी जिसका जिक्र हम कर चुके हैं। यह अफरातफरी और भ्रष्टाचार को जन्म देगा। इस मामले में बोझ का आकलन रोजाना के लेनदेन से होगा।
 
सार्वजनिक प्रशासन में बोझ के दो और पहलू हैं: अधिकारियों को कितना विवेकाधिकार होगा और इस दौरान क्या कुछ दांव पर लगा होगा? सार्वजनिक प्रशासन में सबसे कठिन व्यवस्था वह होती है जहां काफी कुछ दांव पर लगा हो, अधिकारियों के पास विशेषाधिकार हो और लेनदेन की संख्या बहुत ज्यादा हो। एक स्कूली शिक्षक जो काम पर नहीं आता है वह हर महीने महज 10,000 रुपये की चोरी करता है। यहां बहुत ज्यादा कुछ दांव पर नहीं लगा है। एक भ्रष्टï न्यायाधीश या पुलिसकर्मी या कर अधिकारी करोड़ों रुपये बनाता है। जाहिर है यहां काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है।
 
दिवालिया सुधार में बोझ वहन 
 
दिवालिया प्रक्रिया में क्या बोझ हैï? अगर कोई फर्म डिफॉल्ट कर रही है तो इसका मतलब है कि उसे अतीत में घाटा हुआ है। दिवालिया प्रक्रिया में उस घाटे को आवंटित किया जाता है। अगर कोई बड़ी फर्म दिवालिया होती है तो बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। जिन लोगों को भारी घाटे का सामना करना पड़ता है वे दिवालिया प्रक्रिया में ताकतवर कानूनी टीमों की मदद लेते हैं और जबरदस्त पैसा खर्च करके यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि घाटे को किसी और के सर माथे पर डाल दिया जाए। 
 
दिवालिया प्रक्रिया में बोझ वहन की क्षमता कहां से आती है? दिवालिया विधायी सुधार समिति (बीएलआरसी) का मूल ढांचा भारी भरकम बोझ वहन करने के अनुकूल है। यह बोझ वहन क्षमता छह चीजों से आती है: (1) एक मजबूत दिवालिया संहिता का निर्माण (2) एक मजबूत आईबीबीआई का निर्माण (3) आईबीबीआई में एक मजबूत नियम निर्माण प्रक्रिया और उच्च गुणवत्ता वाले नियम बनाना (4) दिवालिया पेशेवरों के लिए एक मजबूत पेशेवर व्यवस्था की स्थापना (5) एक मजबूत सूचना तकनीक उद्योग और (6) एक मजबूत एनसीएलटी का गठन। 
 
जब ये सभी छह तत्त्व काम करने लगे तो इस बात का तुक बनता है कि नए दिवालिया कानून को छोटे-छोटे मामलों से परीक्षित किया जाए। इसके लिए 100 छोटे मामलों से शुरूआत की गई। यह अच्छी बात है। इस प्रक्रिया के दौरान कई खामियां सामने आएंगी। विफलताओं को जल्दी चिह्निïत करने के लिए एक मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता होगी। लेकिन अभी इस टीम का बनना बाकी है। 
 
अब तक एक भी मामला पूरी तरह नहीं निपट सका है। इसलिए हमें इसकी बोझ वहन क्षमता का पूरा अंदाजा नहीं है। कई कमियां जरूर नजर आई हैं जिनको दूर करना है। इन हालात में 12 बड़े मामलों की शुरुआत कहीं से सही नहीं लगती। बड़े मामलों का बोझ भी बहुत ज्यादा होता है। यह मौजूदा व्यवस्था पर जबरदस्त दबाव डालेगा। एक बार एक बड़ा मामला शुरू होने के बाद वापसी संभव नहीं। समझदारी इसी में होगी कि एक प्रतिभाशाली टीम तैयार की जाए जो हर कदम पर सावधानी भरी नजर रखे और उपरोक्त छह तत्त्वों की भार वहन क्षमता तैयार करे। 
 
जीएसटी की भारवहन क्षमता
 
जीएसटी में क्या बोझ है? जब कर दर अधिक हो तो वंचना का आकर्षण भी उतना ही ज्यादा होता है। कई कर दरें मनमानेपन की वजह बन सकती हैं। अगर आइसक्रीम की दर ज्यादा हो और दही की कम तो निर्माता निश्चित तौर पर आइसक्रीम में दही मिलाकर फायदा उठाएगा। ऐसे में प्रवर्तन क्षमता बढ़ाने की जरूरत होगी और अधिकारियों के मनमानेपन की आशंका बढ़ेगी। कई प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी जीएसटी को और बोझ वाला बनाती है। 
 
हमें एकीकृत केंद्रीय कर बोर्ड (सीबीटी) की आवश्यकता है जो कॉर्पोरेट आयकर और जीएसटी आदि सभी का विनियमन करे। इसके लिए मजबूत डाटाबेस और शोध क्षमता की आवश्यकता है। सीबीटी में विधायी, कार्यपालिका और अद्र्घ न्यायिक हर तरह की शाखाएं होती हैं। इसे एक कर प्रशासनिक अधिनियम में तब्दीली चाहिए जो तीनों प्रक्रियाओं के लिए मजबूत व्यवस्था बनाए। इसके लिए मजबूत रिपोर्टिंग और जवाबदेही व्यवस्था होनी चाहिए और एक बोर्ड की निगरानी भी ताकि शक्तियों को सावधानीपूर्वक डिजाइन किया जा सके। एक से अधिक राज्यों में काम करने वाली फर्म के लिए सीबीटी की ही इकलौती कर व्यवस्था होनी चाहिए। जीएसटीएन और ई-फाइलिंग सही दिशा में बढ़ रहे हैं। परंतु कंप्यूटरीकरण की एक बारीक परत गहरे प्रशासनिक सुधारों का विकल्प नहीं हो सकती।
 
भारतीय जीएसटी सुधार में हमने उच्चतम स्तर का बोझ डाल दिया है। जबकि उसमें बोझ सहने की क्षमता कम है। ऐसे में हम पर संगठनात्मक चूक का खतरा मंडरा रहा है। दिवालिया कानून सुधार के मामले में मूल बीएलआरसी ढांचा मजबूत है लेकिन क्रियान्वयन में गड़बड़ी है। इसका हल एक मजबूत टीम के रूप में ही नजर आता है। जीएसटी के मामले में जीएसटी नीति का मूल ढांचा और प्रशासनिक व्यवस्था ध्वस्त है इसलिए वित्त मंत्री की राह आसान नहीं है।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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