बिजनेस स्टैंडर्ड - एफटीए देशों से बढ़ा कागज का आयात
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एफटीए देशों से बढ़ा कागज का आयात

दिलीप कुमार झा / मुंबई June 26, 2017

मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) वाले देशों से कागज के आयात में बढ़ोतरी होने से परेशान घरेलू कागज मिलों ने कागज और अखबारी कागज के आयात पर डंपिंग-रोधी शुल्क लगाने की सरकार से गुजारिश की है। वाणिज्यिक खुफिया एवं सांख्यिकी महानिदेशालय (डीजीसीआईएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2016-17 में भारत ने 30 लाख टन कागज का आयात किया था जबकि एक साल पहले यह 26.1 लाख टन था। अगर कीमत के नजरिये से देखें तो कुल 13,937 करोड़ रुपये मूल्य के कागज एवं अखबारी कागज का आयात किया गया जबकि वर्ष 2015-16 में यह 12,284 करोड़ रुपये रहा था।
 
भारतीय कागज उद्योग पिछले सात वर्षों में सालाना 11.76 फीसदी की औसत दर से बढ़ा है लेकिन आसियान देशों से मंगाए जा रहे सस्ते कागज से घरेलू उद्योग पर बुरा असर पडऩे लगा है। आसियान देशों के साथ एफटीए होने से वहां से आयात सस्ता पड़ता है। इसके चलते आसियान देशों से होने वाला कागज आयात पिछले सात वर्षों में 24.54 की तीव्र वृद्धि के साथ 344,700 टन पहुंच गया। कीमत के लिहाज से इस अवधि में सालाना 29.94 फीसदी तेजी के साथ 2016-17 में 1675 करोड़ रुपये का आसियान से आयात किया गया था।
चीन और इंडोनेशिया की कागज उत्पादन इकाइयों के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ परंपरागत तौर पर प्रमुख बाजार रहे हैं लेकिन अब इन दोनों बाजारों में स्थानीय कागज उद्योग को संरक्षण के नाम पर डंपिंग-रोधी शुल्क लगाया जा चुका है। भारतीय कागज उत्पादक संघ (आईपीएमए) के महासचिव रोहित पंडित कहते हैं कि विकसित देशों में आर्थिक प्रगति के सुस्त पडऩे और आसियान देशों की अर्थव्यवस्था के मूलत: निर्यात पर आश्रित होने से कागज और पेपरबोर्ड की अधिकता हो गई है। पंडित कहते हैं, 'इस स्थिति में भारत के कम आयात शुल्क का फायदा उठाने के लिए आसियान देशों ने अपने अतिरिक्त कागज उत्पाद को भारत भेजना शुरू कर दिया। इससे भारत सरकार को आर्थिक नुकसान होने के साथ ही यहां की तमाम कागज मिलों को भी घाटा उठाना पड़ रहा है।'
 
भारत में कागज मिलों की प्रतिनिधि संस्था आईपीएमए का कहना है कि उसकी उत्पादक इकाइयों की पूरी क्षमता का ही अभी तक पूरा उपयोग नहीं किया जा सका है। वह इसके लिए सस्ते आयात को वजह मान रहा है। भारतीय कागज उत्पादक इकाइयों की कुल क्षमता 1.52 लाख टन की है। दरअसल भारत में लकड़ी की कमी रहती है जबकि कागज उद्योग के लिए लकड़ी मुख्य कच्चा माल होता है। कागज उत्पादन के कच्चे माल की घरेलू उपलब्धता कम होने से इस उद्योग को काफी नुकसान हो रहा है। इन मिलों में आपूर्ति की जाने वाली लकड़ी की कीमत अन्य एशियाई देशों की तुलना में प्रति टन 30-40 डॉलर अधिक है। इस इकलौती वजह से भारत में कागज उत्पादन की लागत 100 डॉलर प्रति टन तक बढ़ जाती है।
 
पंडित का कहना है कि भारत-आसियान एफटीए के तहत कागज एवं पेपरबोर्ड पर सभी आयात शुल्क दरों को लगातार कम किया गया है। वह कहते हैं, 'सर्वाधिक वरीयता वाले देश (एमएफएन) के लिए मूल आयात दर 10 फीसदी से कम होते हुए जनवरी 2014 में नगण्य हो चुकी है। इसी तरह भारत-कोरिया सीईपीए के तहत बुनियादी आयात शुल्क कम होते हुए जनवरी 2018 में नगण्य स्तर पर पहुंच जाएगा।' 
 
भारतीय कागज उद्योग पहले से ही प्रतिस्पद्र्धी दरों पर कागज एवं पेपरबोर्ड के उत्पादन की चुनौती से जूझ रहा है। इस बीच विभिन्न एफटीए एवं द्विपक्षीय कारोबार समझौतों के तहत कागज आयात को भी वरीय शुल्क का लाभ देने से घरेलू कागज उत्पादकों की मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं। पंडित का कहना है कि बेहद कठिन परिवेश में काम कर रहे भारतीय कागज उद्योग को सस्ते आयात से संरक्षण देने के लिए कागज के आयात पर डंपिंग रोधी शुल्क लगाया जाना चाहिए। उन्होंने इसके लिए सरकार से तत्काल कदम उठाने की मांग की है।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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