बिजनेस स्टैंडर्ड - किसानों की बदहाली से बिगड़े हालात
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किसानों की बदहाली से बिगड़े हालात

संदीप कुमार /  06 26, 2017

परेशान किसान

रिकॉर्ड फसल उत्पादन की वजह से कीमतों में भारी गिरावट, नोटबंदी और सरकार की अनदेखी जैसी ऐसी बहुत सी वजह हैं, जिनके कारण मध्य प्रदेश में किसानों को सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन करने और पुलिस की लाठियां एवं गोलियां खाने को विवश होना पड़ा

देश के तमाम अन्य हिस्सों की तरह मध्य प्रदेश में भी कृषि क्षेत्र को बेहतर मॉनसून का लाभ मिला था। विभिन्न फसलों की प्रचुर पैदावार ने किसानों के चेहरे खिला दिए लेकिन यही बेहतरीन पैदावार आगे चलकर किसानों के लिए कष्टप्रद साबित हुई। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों कहा, प्रदेश में फल, सब्जियों और अनाज की बंपर पैदावार हमारे लिए खुशी की वजह है लेकिन इसके चलते कीमतों में आई गिरावट ने किसानों को बहुत नुकसान पहुंचाया है।' उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह दालों तथा अन्य उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर क्रय कर प्रदेश को राहत दिलाए। जानकारों के मुताबिक बंपर फसल और नोटबंदी की मार ने फसल की कीमत को औंधे मुंह लुढ़का दिया।

प्रदेश की मंडियों में उपज की कीमत में आया बदलाव इसकी गवाही देता है। वर्ष 2016 में जहां प्याज की फसल 150 से 500 रुपये प्रति क्विंटल बिकी थी वहीं इस वर्ष यह घटकर 100 से 300 रुपये प्रति क्विंटल रह गई। वहीं लहसुन की कीमत पिछले साल के 3,000 से 9,000 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर 1,000 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल तक रह गई।

प्याज ने गिराई गाज

आश्चर्य नहीं कि प्रदेश में आंदोलन कर रहे किसानों की मांगों में फसल की उचित कीमत की मांग प्रमुख थी। प्रदेश सरकार ने हालात बिगड़ते देखकर प्याज की सरकारी खरीद की घोषणा कर दी। सरकार 8 रुपये प्रति किलो की दर पर किसानों से प्याज खरीद रही है क्योंकि थोक बाजार में इसकी कीमत दो रुपये प्रति किलो तक आने से किसानों की लागत तक नहीं निकल पा रही थी। गत 25 जून तक प्रदेश सरकार 47.66 लाख टन प्याज किसानों से खरीद चुकी है। प्याज उत्पादन के अनुमानों में रोज बदलाव हो रहा है। अकेले इस सत्र में प्याज के उत्पादन का अनुमान 32 लाख टन से बढ़ाकर 80 लाख टन कर दिया गया है। पहले समर्थन मूल्य पर प्याज की खरीद 30 जून तक होनी थी लेकिन बिक्री केंद्रों पर किसानों की मीलों लंबी कतारें देखते हुए सरकार ने इस तारीख को 15 जुलाई तक बढ़ा दिया है। इस प्याज को सरकार अलग-अलग जगह पर बेच रही है। राशन की दुकानों पर इसे दो रुपये प्रति किलो की दर पर बेचा जा रहा है। इंदौर मंडी के आढ़ती महेश सोनगरा बताते हैं कि प्रदेश का प्याज दिल्ली 7-8 रुपये प्रति किग्रा पर बिक रहा है। इसके बावजूद ढुलाई की लागत के चलते प्रति किलो तीन रुपये तक का नुकसान हो रहा है। प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी स्वीकार करते हैं कि प्याज खरीद बिक्री के इस पूरे चक्र में सरकार को करीब 600 करोड़ रुपये का नुकसान सहना पड़ेगा।

नोटबंदी भी वजह

कारोबारी नोटबंदी के प्रभाव को नकारने में संकोच नहीं कर रहे हैं। नवंबर में अचानक हुई नोटबंदी के बाद बाजार में नकदी की किल्लत हो गई। इसके चलते व्यापारियों ने माल उठाना बंद कर दिया। किसान पहले बंपर पैदावार के चलते कीमत कम होने से परेशान थे। नोटबंदी के चलते फसल न बिकने ने उस मार का असर दोहरा कर दिया। हालांकि रिजर्व बैंक ने तंत्र में पर्याप्त नकदी डाली है लेकिन इसके बावजूद दिक्कतें खत्म नहीं हुई हैं। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक किसानों के खाते में जो पैसे आरटीजीएस से आते हैं उनका भुगतान होने में 20 से 25 दिन लग जाते हैं। इस अवधि में किसान खाली हाथ रहता है। उसे दैनिक खर्च के लिए उधार लेना पड़ता है और वह कर्ज के दुष्चक्र में फंसता जाता है। इतना ही नहीं आरटीजीएस से होने वाले भुगतान में से कई बार सहकारी बैंकों का कर्ज पहले ही काट लिया जाता है। इस तरह किसान के हाथ कई बार शून्य ही लगता है।

मालवा क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था सोयाबीन, प्याज, लहसुन और टमाटर जैसी फसलों पर निर्भर करती है। इनकी कीमतों में बीते एक साल के दौरान औसतन 25 प्रतिशत से लेकर 90 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई। इसने स्थानीय किसानों की कमर तोड़कर रख दी। स्थानीय किसान नेतलाल साहू कहते हैं कि सरकार को फसल कीमत में गिरावट की एक सीमा तय करनी चाहिए। प्याज की जो खरीद इस आंदोलन और रक्तपात के बाद तय की गई वह सरकार को पहले ही कर लेनी चाहिए थी।

एक सत्र में उपज के महंगा बिकने पर अगले सत्र में उसका उत्पादन बढ़ जाता है। किसानों के मुताबिक पिछले कुछ सालों से प्रदेश में लहसुन की फसल अच्छी बिक रही थी। नोटबंदी के चलते बड़े खरीदार बाजार से दूर हुए और मांग की तुलना में उपलब्धता बहुत अधिक बढ़ गई। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग इस फसल को हाथों-हाथ ले रहा था लेकिन नोटबंदी ने इसे भी प्रभावित किया। हालांकि इंदौर स्थित खाद्य प्रसंस्करण फर्म गार्लिको इंडस्ट्रीज की निदेशक ज्योति गर्ग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखतीं। 

गर्ग ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली इकाइयों को जरूर प्रभावित किया है लेकिन संगठित क्षेत्र की बाजार हिस्सेदारी या खरीद पर नोटबंदी ने कोई असर नहीं डाला। किसान नेता जसविंदर सिंह कहते हैं कि बड़े कारोबारियों ने फसल खरीदकर चेक से भुगतान किया। लेकिन किसानों के लिए यह कागज के टुकड़े से अधिक कुछ नहीं था क्योंकि शुरुआती महीनों में बैंकों के पास भुगतान करने के लिए नकदी ही नहीं थी। शीत गृहों की की कमी भी समस्या की एक वजह रही। देश की खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल कह चुकी हैं कि बागवानी क्षेत्र में देश में कुल आवश्यकता के बमुश्किल छह फीसदी के बराबर ही शीतगृह और भंडारण सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में शीघ्र खराब होने वाली फसलों का भंडारण नहीं हो पाता। उनको जल्द से जल्द खपाने की कोशिश में किसान कीमत से समझौता करते हैं। 
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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