बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या आरबीआई को दरों में कटौती करनी चाहिए?
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क्या आरबीआई को दरों में कटौती करनी चाहिए?

अभीक बरुआ और साक्षी गुप्ता /  June 26, 2017

क्या रिजर्व बैंक के सामने वाकई ऐसी परिस्थितियां बन चुकी हैं कि वह दरों में कटौती करे? इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अभीक बरुआ और साक्षी गुप्ता 

 
मुद्रास्फीति और ब्याज दरों में कटौती की चर्चा को लेकर पक्षधरता कुछ खास बातों पर निर्भर करती है। मसलन, इस बात को जानना जरूरी है कि आरबीआई ने लगभग तय कर लिया है कि वह लंबी अवधि के दौरान मुद्रास्फीति को 4 फीसदी के स्तर से नीचे रखेगा और इस दौरान 2 फीसदी इधर या उधर की रियायत का फायदा नहीं उठाएगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि कुछ महीनों तक मुद्रास्फीति का आंकड़ा कम होने पर भी उसके निर्णय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
 
इस दूरगामी नजरिये को अपनाते हुए आरबीआई की आंकड़ों पर निर्भरता कम हो गई है। जब तक उसे पूरा यकीन नहीं हो कि वह 4 फीसदी के लक्षित स्तर की ओर निरंतर स्थायी दर से बढ़ रहा है तब तक वह नीतिगत दर में आगे और कटौती करने की इच्छा नहीं दिखाएगा। यह सवाल दीगर है कि क्या आर्थिक क्षेत्र में धीमेपन के स्पष्टï संकेतों के बीच ऐसी एकतरफा सोच रखना सही है या नहीं। इस प्रश्न का उत्तर ही बताएगा कि जवाब देने वाला किस पक्ष में है। 
 
अगला प्रश्न है: क्या मुद्रास्फीति की दर में बीते कुछ महीनों के दौरान आई निरंतर और ठोस गिरावट आरबीआई को इतनी राहत देती है कि वह 4 फीसदी की दर से नीचे की ओर सफर शुरू कर सके? एचडीएफसी बैंक का विश्लेषण बताता है कि गतवर्ष शीर्ष मुद्रास्फीति में 70 फीसदी की गिरावट खाद्य पदार्थों की कीमतों में आई कमी, खासतौर पर सब्जियों और दालों की कीमतों में आई गिरावट से आई थी। इसे इस तरह समझें कि अगर गत वर्ष मई में सब्जियों और दालों की कीमतों में इजाफा हो रहा होता और बाकी सबकुछ पहले जैसा होता तो मई 2017 के अंत तक मुख्य मुद्रास्फीति की दर 4.9 फीसदी रहती। 
 
पारंपरिक तौर पर देखा जाए तो मुद्रास्फीति अल्पावधि की आपूर्ति ताकतों से प्रभावित होती है जो स्वाभाविक रूप से अस्थायी होती हैं। देखा जाए तो केंद्रीय बैंक को दरें निर्धारित करते समय कीमतों में तीव्र उछाल और गिरावट दोनों पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए। ऐसे में आरबीआई का मुद्रास्फीति में कमी और कीमतों में गिरावट के बावजूद दरों में कटौती नहीं करने का निर्णय उचित प्रतीत होता है। 
 
इस बात के कुछ प्रमाण हैं जो बताते हैं कि खाद्य आपूर्ति प्रबंधन में सुधार हुआ है। दालों का मामला रोचक है। यह सच है कि दालों के आक्रामक आयात और घरेलू किसानों को कीमत में प्रोत्साहन देने से कीमतें कम करने में मदद मिली है। उस दृष्टिï से देखें तो दालों की कीमतें ऐतिहासिक रूप से अस्थिर रही हैं। उनमें लगातार उतार-चढ़ाव आता रहा है और दालों की कीमतों में मौजूदा गिरावट पहले की ही किसी तेज गिरावट के सदृश है। 
 
चाहे जो भी हो लेकिन सर्वोत्तम आपूर्ति प्रबंधन का अनिवार्य तात्पर्य कीमतों में तेज गिरावट लाने से नहीं है। कीमतों में गिरावट का किसानों की आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव होता है जिससे अलग तरह से निपटना होता है। सरकार ने तब प्रत्यक्ष उपाय अपना कर हस्तक्षेप किया। इसमें खरीद मूल्य में इजाफा करना और यह सुनिश्चित करना शामिल था कि आपूर्ति के लिए खरीद उन्हीं स्तरों पर तय की जाए। खेती से होने वाली आय में कमी ने भी कृषि ऋण माफी की मांग को स्वर दिया है। विभिन्न राज्यों में भी इन दिनों कृषि ऋण माफी की होड़ सी मची दिख रही है। 
 
परंतु सरकार के इन प्रयासों के बावजूद कृषि आय में तत्काल कोई वृद्धि होने की आशा नहीं है लेकिन हां, इससे खाद्य समेत विभिन्न पदार्थों में मुद्रास्फीति का दबाव अवश्य पैदा हो सकता है। यह भी सच है कि किसान पहले ही दालों के उत्पादन से दूरी बनाना शुरू कर चुके हैं। इस वर्ष बुआई रकबे में 20 फीसदी की कमी आई है। कुल मिलाकर मूल्य चक्र में दोबारा बदलाव आता दिख रहा है।
 
सब्जियों की कीमतों में गिरावट के पीछे भी ऐसा ही किस्सा है। कम से कम उत्तर भारत के कुछ बड़े कारोबारियों की बात पर यकीन करें तो यही लगता है। बीते कुछ साल के दौरान प्याज और आलू की कीमतों में जो तेजी आई उसने किसानों को इन फसलों की अधिक बुआई के लिए प्रेरित किया। इस वर्ष तो नोटबंदी ने भी कृषि उपज की बिक्री को प्रभावित किया। इसका सीधा असर छोटे किसानों पर पड़ा।
 
इन कृषि जिंसों की ढांचागत समस्या बरकरार है। शीघ्र खराब होने वाले उत्पादों के भंडारण की समस्या बनी हुई है। इनमें तमाम फल और सब्जियां शामिल हैं। वहीं प्याज जैसे अपेक्षाकृत कम खराब होने वाले उत्पादों के निर्यात में बाधा बरकरार है। प्याज एक ऐसी फसल है जो एक खास अवधि में बाजार में खपानी ही होती है। बिना भंडारण के बुनियादी ढांचे में अहम सुधार किए या खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में स्थिर आपूर्ति की खपत के बिना यह संभव नहीं दिखता। 
 
ऐसे में कृषि उपजों की कीमतों में तीव्र उछाल की वापसी का जोखिम बना रहेगा। यह उन श्रेणियों में और ज्यादा है जहां बढ़ती आय के कारण मांग में इजाफा देखने को मिलता है। इसलिए हालिया राहत के बाद जरूरी नहीं कि आरबीआई दरों में कटौती करे। बल्कि वह अधिक स्थायी कमी की प्रतीक्षा करेगा। उसके बाद ही वह इस संबंध में कोई निर्णय लेगा। कई मुद्दे ऐसे हैं जो हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। ऐसे में वर्ष के मध्य में आरबीआई दरों में नाम मात्र की कटौती कर सकता है। हालांकि यह आधे मन से उठाया कदम हो सकता है और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति की संभावना कम है। 
 
हमें मूल मुद्रास्फीति पर ध्यान देना होगा। यह साल दर साल आधार पर 5.2 फीसदी से घटकर 4.1 फीसदी पर आ गई है। अगर हम आधार प्रभाव जैसे सांख्यिकीय आंकड़ों से समायोजन करें तो भी 4 फीसदी की स्थायी दर हासिल करने के लिए अपर्याप्त होगा। हमारा विश्लेषण बताता है कि स्वास्थ, शिक्षा समेत इस क्षेत्र के 40 फीसदी से अधिक अवयव अतीत में निरंतर गिरावट का प्रदर्शन कर चुके हैं। अब यह आपूर्ति में सुधार का मामला है या आय में वृद्घि कम होने का, यह निश्चित नहीं है। बहरहाल, आरबीआई को 4 फीसदी की दर को ध्यान में रखते हुए इस पर भी विचार करना चाहिए। 
 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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