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डीएसपी की हत्या के बाद घाटी के हालात में सुधार की बढ़ी नाउम्मीद

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  June 25, 2017

श्रीनगर में ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी की जिस सनसनीखेज तरीके से हत्या की गई है, उसने कश्मीर घाटी की मुश्किलों को एक नया और परेशान करने वाला मोड़ दे दिया है। पुलिस उपाधीक्षक मोहम्मद अयूब पंडित को श्रीनगर की जामिया मस्जिद के बाहर करीब 300 लोगों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। किसी भी जगह पर अराजकता और अलगाव की भावना मजबूत होने का इससे अधिक स्पष्ट संकेत कोई और नहीं हो सकता है। 

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यह मामला कश्मीर में सरकारी अधिकारियों की अन्य हत्याओं से काफी अलग है। पहला, यह घटना आतंकवादियों के पहले से बनाई गई योजना के तहत अंजाम दिए गए हमले जैसा नहीं है। दूसरा, जिस व्यक्ति की हत्या की गई है वह जम्मू कश्मीर पुलिस का एक वरिष्ठ अधिकारी था। तीसरा, इस पूरी घटना को सरेआम अंजाम दिया गया। जम्मू कश्मीर पुलिस का कश्मीर घाटी में एक खास स्थान रहा है। किसी भी अन्य पुलिसबल की तरह उन्हें भी स्वाभाविक तौर पर भारतीय संविधान का संरक्षक माना जाता है। लेकिन ऐतिहासिक रूप से वह सामान्य कश्मीरियों और दिल्ली के 'औजार' माने जाने वाले अद्र्धसैनिक बलों के बीच एक निर्णायक मध्यबिंदु रहे हैं। कश्मीरी अवाम के बीच ही पले-बढ़े और उन्हीं लोगों के बीच रहने वाले पुलिसकर्मी समाज के लिए जरूरी रोजमर्रा की पुलिस गतिविधियों को अंजाम देते रहे हैं। उन्हें आम तौर पर दिल्ली-विरोधी गुस्से और हिंसा का भी शिकार नहीं होना पड़ता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हालात काफी बदल गए हैं। अब उनके  परिजनों का बहिष्कार करने के साथ ही उन पर हमले भी होने लगे हैं। उसी प्रवृत्ति ने जघन्य हत्या की इस वारदात को अंजाम दिया है।
 
इससे कश्मीर घाटी में हिंसा के बदलते चरित्र का भी संकेत मिलता है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अविवेकपूर्ण गठबंधन होने और बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से ही कश्मीर घाटी में हो रहा प्रतिरोध अब प्रायोजित छापामार युद्ध नहीं बल्कि आम जनता के विद्रोह की तरह दिखाई देने लगा है। यह सोचना नासमझी भरा होगा कि 2017 में कश्मीर का अब भी वही चरित्र है जो 1991, 2008 या यहां तक कि 2014 में भी हुआ करता था। आम लोगों की भीड़ अद्र्धसैनिक सुरक्षाकर्मियों और आतंकवादियों के बीच खड़ी होने लगी है। पहले इस तरह की घटना को असामान्य माना जाता।
 
आखिर कौन सी चीज है जिसने हालात को यहां तक पहुंचाया है। इस सवाल का जवाब थोड़ा पेचीदा है। फिर भी एक बात तो निश्चित है। प्रतिरोध का मौजूदा दौर दिल्ली के प्रति लोगों के बढ़े हुए गुस्से और स्थानीय नेतृत्व के प्रति हो रहे मोहभंग का नतीजा है। पुराने कश्मीरियों की यह शिकायत है कि अब वे युवा और गुस्सैल लोगों पर लगाम नहीं रख पा रहे हैं। मुझे भी किसी ने बताया है कि हालात से हताश वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अब यहां तक कहने लगे हैं कि समूची जनता से लड़ पाना मुश्किल है। अगर ऐसा है तो यह असफलता की स्तब्धकारी स्वीकारोक्ति है। भारतीय राज्य युवा कश्मीरियों की एक पूरी पीढ़ी को यह दर्शाने में नाकाम रहा है कि सक्रिय प्रतिरोध से इतर भी उम्मीद की कोई किरण है। भारतीय नागरिक के तौर पर हासिल अधिकारों से खुद को वंचित मानने वाले युवा अब अपनी पहचान कश्मीरी के तौर पर ही करने लगे हैं। अगर हम इस बंद-गली से निकलना चाहते हैं तो हमें कश्मीर मुद्दे के प्रति एकदम अलग नजरिया अपनाने की जरूरत होगी।
 
आखिर किस वजह से यह मसला गंभीर होता जा रहा है? पहली बात तो यह है कि राज्य सरकार अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुकी है। काफी हद तक इसकी शुरुआत गठबंधन बनने की प्रक्रिया के दौरान ही हो गई थी। पीडीपी ने पूरा चुनाव अभियान भाजपा को कश्मीर से बाहर रखने के नाम पर चलाया था जबकि भाजपा पीडीपी को सत्ता से दूर रखने की बात कर रही थी लेकिन सरकार बनाने के लिए दोनों ही दल एक-दूसरे के साथ आ गए। इससे घाटी के 'भारत-समर्थक' नेताओं के खिलाफ लगने वाला सिद्धांत-हीनता का सबसे बड़ा आरोप सच साबित होता नजर आया। सरकार के बरताव ने मामले को और भी बिगाड़ दिया है। मुख्यमंत्री तो लगभग शांत ही हो गई हैं। 
 
उसी तरह केंद्र सरकार भी चुप्पी साधे हुए है। भाजपा जम्मू कश्मीर की सरकार में शामिल है लेकिन उसी पार्टी की अगुआई वाली केंद्र सरकार शायद यह बात भूल गई है। केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से घावों पर मरहम लगाने वाला एक भी शब्द कश्मीरियों को नहीं सुनने को मिला है। यहां तक कि लंबे समय से कायम अपने सिद्धांतों को भी सेना के कुछ तत्त्व तिलांजलि देने लगे हैं। हाल ही में सेना के एक अधिकारी का एक व्यक्ति को ढाल के तौर पर इस्तेमाल करने का वीडियो देखने के बाद तो यही कहा जा सकता है।
 
जरा अटल बिहारी वाजपेयी से इसकी तुलना कीजिए। वाजपेयी ने कहा था कि कश्मीर विवाद को साझा इंसानियत के ही आधार पर सुलझाया जा सकता है। लेकिन मौजूदा भाजपा के लिए कश्मीर मुद्दा महज उत्तर प्रदेश में वोट पाने का एक जरिया और अमरनाथ की यात्रा का एक पड़ाव भर है। अगर आप भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की तेजी से मुखर होती आवाजों को सुनें तो कश्मीर 'असली' भारतीयों की भावनाओं की एक जगह भी है। 
 
केंद्र सरकार की स्वार्थपरक चुप्पी के बीच भारत की 'आवाज' को अब पूरा कश्मीर टेलीविजन पर सुन रहा है। अद्र्धसैनिक बल के एक अधिकारी ने मुझसे कहा कि टाइम्स नाऊ और रिपब्लिक टीवी चैनल कश्मीर घाटी में राष्ट्रीय हित के लिए पाकिस्तान टीवी और जिओ टीवी से भी अधिक खतरनाक हैं। इन टीवी चैनलों पर नजर आने वाले ऐंकर और पूर्व एवं वर्तमान सैन्य अधिकारियों की अमानवीय और खूनी संघर्ष को बढ़ावा देने वाली शैली कश्मीरी अवाम के बीच अलगाव के अहसास को बढ़ाने का ही काम करती है। कश्मीर के लोग कहते हैं कि अगर यह निष्ठुर घृणा ही भारत की असली आवाज है तो फिर शांति की उम्मीद कौन कर सकता है?
Keyword: jammu kashmir, military, DSP, police,,
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