बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो की प्रासंगिकता!
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बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो की प्रासंगिकता!

टीटी राम मोहन /  June 25, 2017

विनोद राय बीसीसीआई पर ही ध्यान केंद्रित करें तो बेहतर है। वहां उन्हें व्यस्त रखने की पर्याप्त वजह मौजूद हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं टीटी राम मोहन 

 
क्या हमें विनोद राय की अध्यक्षता वाले बैंक बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) की आवश्यकता है? यह सवाल इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि चार सरकारी वित्तीय संस्थानों आईआईएफसीएल, आईएफसीएल, सिडबी और एक्जिम के मुखिया के पद पर नियुक्ति के लिए समिति का गठन किया गया। बीबीबी की स्थापना अप्रैल 2016 में की गई। इसका प्रमुख काम था सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों का चयन। इसके अन्य काम थे सरकारी बैंकों को नीतिगत सहायता मुहैया कराना और उनको पूंजी जुटाने के लिए नवाचारी तरीके सुझाना। 
 
अब इसके मूल काम में कतर ब्योंत हो गई है। चार वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों की नियुक्ति का काम अब एक समिति के हवाले है जिसकी अध्यक्षता वित्त मंत्रालय के अधीन आने वाले वित्तीय सेवा विभाग की सचिव अंजली चिब दुग्गल के पास है। समिति के अन्य सदस्यों में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन, इलाहाबाद बैंक की पूर्व चेयरपर्सन रही शुभलक्ष्मी पणसे, सलाहकार फर्म इंडएशिया के प्रवर्तक प्रदीप शाह और आईआईएम इंदौर के निदेशक हृषीकेश टी कृष्णन शामिल हैं। दुग्गल और विश्वनाथन, दोनों बीबीबी के सदस्य हैं। पणसे और शाह को हाल ही में शामिल किया गया है। प्रोफेसर कृष्णन बीबीबी के सदस्य नहीं हैं। राय और बीबीबी के तीन अन्य सदस्य अनिल ए खंडेलवाल, रूपा, कुडवा और एच एन सिनॉर इस नई समिति में शामिल नहीं हैं। 
 
बीबीबी पीजे नायक समिति की अनुशंसाओं में से एक के अनुरूप गठित की गई। यह समिति बैंकों के प्रशासन को लेकर बनी थी। परंतु राजग सरकार ने जिस बीबीबी का गठन किया वह नायक समिति की अनुशंसाओं के अनुरूप नहीं थी। नायक समिति की इच्छा थी कि बीबीबी सरकार से पूरी तरह दूर रहे। उसकी इच्छा यह भी थी कि सरकारी बैंकों के प्रमुख, प्रबंध निदेशक और स्वतंत्र निदेशक आदि सभी का चयन बीबीबी करे। 
 
परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। बीबीबी में वित्तीय सेवा सचिव को भी शामिल कर लिया गया और आरबीआई के डिप्टी गवर्नर को भी। हकीकत में यह मूल नियुक्ति समिति थी जो एक अन्य नाम से बैंक प्रमुखों का चयन करती थी। केवल आरबीआई गवर्नर की जगह राय का नाम चेयरमैन के पद पर दिखा। बीबीबी ने बैकों के प्रबंध निदेशकों और कार्यकारी निदेशकों का चयन तो किया लेकिन चेयरमैन और स्वतंत्र निदेशकों का नहीं। 
 
यहां तक कि प्रबंध निदेशकों के मामले में भी बीबीबी को पूरी स्वायत्तता नहीं थी। इंडियन बैंक के प्रबंध निदेशक को बदलकर आईडीबीआई बैंक का प्रबंध निदेशक बना दिया गया। इसके लिए बीबीबी से मशविरा तक नहीं किया गया। दो लोग जिन्हें बीबीबी ने इलाहाबाद बैंक और सिंडिकेट बैंक के लिए चुना था, उन्हें  सरकार ने पंजाब नैशनल बैंक और बैंक ऑफ इंडिया में नियुक्त कर दिया। बीबीबी के सदस्यों में से एक सिनॉर ने विरोध स्वरूप त्यागपत्र दे दिया लेकिन उन पर पद पर बने रहने का दबाव डाला गया। 
 
ऐसा कोई दिखावा तक नहीं किया गया कि बीबीबी को बैंकों की नीति तय करने या पूंजी जुटाने की प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है। फंसे हुए कर्ज का मुद्दा आरबीआई के हवाले है। चूंकि बीबीबी का दायरा अब और अधिक सीमित कर दिया गया है तो यह पूछना बनता है कि क्या हमें वाकई इसकी आवश्यकता भी है? बीबीबी का विचार अपने आप में निहायत बुरा है। यह धारणा ही अपने आप में अत्यंत बुरी है कि सरकारी बैंकों में शीर्ष पदों पर नियुक्ति का काम किसी स्वतंत्र समिति को सौंपा जाए। चूंकि सरकार सरकारी बैंकों के प्रति सदन में जवाबदेह है इसलिए उसे इनके शीर्ष पदों पर नियुक्ति की पूरी जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। ऐसे में इन बैंकों के प्रमुखों के पदों पर नियुक्ति का काम किसी वरिष्ठï अधिकारी के हवाले होना चाहिए और बीबीबी को विदा कर देना चाहिए। विनोद राय को अब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पर ही ध्यान देने दिया जाए। वहां उनके व्यस्त रहने का पूरा साजोसामान है। 
 
मौद्रिक नीति संबंधी उलझाव
 
इस माह के आरंभ में जब अद्यतन मौद्रिक नीति संबंधी वक्तव्य जारी किया गया तो उसके साथ एक नाटकीय घटनाक्रम जुड़ा हुआ था। बैठक से पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने मौद्रिक नीति समिति के साथ एक बैठक का प्रस्ताव रखा ताकि सरकार का नजरिया उसे बताया जा सके। परंतु समिति ने इससे इनकार कर दिया। मौद्रिक नीति समिति ने 5-1 से यह निर्णय लिया कि नीतिगत दरों पर यथास्थिति बरकरार रखी जाए। सुब्रमण्यन ने अपनी नाखुशी छिपाई नहीं। उन्होंने कहा कि एक सुखद वैकल्पिक वृहद आर्थिक आकलन मौजूद था जिसके आधार पर दरों में कटौती की जा सकती थी। सुब्रमण्यन ने कहा कि मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमान में गलती के चलते उसका गलत आकलन प्रस्तुत हुआ है। मीडिया ने तत्काल यह कह दिया कि आरबीआई के एक और गवर्नर की सरकार के साथ ठन गई है। 
 
आखिर सही कौन है? मुख्य आर्थिक सलाहकार या आरबीआई? आरबीआई ने कहा कि यह स्पष्टï नहीं है कि मौजूदा कम मुद्रास्फीति दर के कारक स्थायी हैं अथवा अस्थायी। वह  इस मामले में प्रतीक्षा करके देखना चाहेगी कि क्या मुद्रास्फीति 4 फीसदी के नीचे रहती है। मुख्य आर्थिक सलाहकार चाहे अलग सोचें लेकिन वह यह नहीं कह सकते कि आरबीआई के पास बातों के लिए आधार नहीं है। दरअसल इस प्रकृति के विवाद हल ही नहीं किए जा सकते।
 
इसके बजाय उनको यह कहना चाहिए कि मौद्रिक नीति समिति को मुद्रास्फीति की दर 4 फीसदी अथवा दो फीसदी ऋणात्मक रखनी है। ऐसे में आरबीआई को 4 प्रतिशत पर अडिग नहीं रहना चाहिए। यह बात निश्चित तौर पर नहीं कही जा सकती है कि मुद्रास्फीति 4 फीसदी से कम रहेगी लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि वह 5 फीसदी से कम रहेगी। बाद वाले दृष्टिïकोण को अपनाएं तो दरों में कटौती की संभावना बनती है। अब यह तो अपने आप में एक रहस्य ही है कि मुख्य आर्थिक सलाहकार ने यह दलील क्यों नहीं दी।
Keyword: BCCI, विनोद राय बीसीसीआई,
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