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छोटे शेयरधारकों की कैसी भूमिका

एन सुंदरेश सुब्रमण्यन /  June 25, 2017

वित्तीय दबाव वाली कंपनियों के लिए कई नियमों को आसान बनाते हुए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा इन कंपनियों के पुनरुद्धार के लिए चलाए गए अभियान में हाथ बंटा रहा है। सेबी ने पिछले सप्ताह हुई अपनी बोर्ड बैठक में इन कंपनियों के संभावित निवेशकों को मूल्य निर्धारण एवं खुली पेशकश संबंधी दायित्वों में छूट देने का निर्णय लिया है। 

 
आधिकारिक बयान में कहा गया है कि दिवालिया एवं दिवालियापन संहिता 2016 के तहत नैशनल कंपनी लॉ बोर्ड ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) द्वारा अनुमोदित समाधान योजनाओं के लिए अधिग्रहण नियमों के तहत खुली पेशकश से छूट दी जाएगी। साथ ही, इन कंपनियों में रणनीतिक पुनर्गठन के तहत ऋण को इक्विटी में बदला गया हो तो बैंक से शेयरों की खरीदारी करने वाले निवेशकों को खुली पेशकश संबंधी दायित्वों से छूट होगी। इश्यू ऑफ कैपिटल ऐंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्ïस (आईसीडीआर) के तहत मूल्य निर्धारण संबंधी नियमों से भी ऐसे निवेशकोंं को रियायत दी गई है। आमतौर पर किसी खस्ताहाल कंपनी में सीधे तौर पर पूंजी निवेश करने वाले नए निवेशकों पर आईसीडीआर के तहत मूल्य निर्धारण संबंधी नियम लागू होते हैं।
 
हालांकि बैंकिंग समुदाय और विश्लेषकोंं ने बाजार की इस बहुप्रतीक्षित रियायत का स्वागत किया है लेकिन वित्तीय तौर पर खस्ताहाल कंपनियों के अल्पांश शेयरधारक इसे अधिक फायदेमंद नहीं मान रहे हैं। एनसीएलटी के तहत सुधारात्मक कार्रवाई के लिए तैयार की गई पहली सूची में शामिल 12 कंपनियों के अल्पांश शेयरधारकों की संख्या एवं उनके प्रोफाइल पर नजर डालने से इस नियम के प्रभाव का आकलन किया जा सकता है। इनमें से सूचीबद्ध नौ कंपनियों में छोटे शेयरधारकों की संख्या करीब 10 लाख है। जबकि इन कंपनियों के शीर्ष संस्थागत निवेशकों में भाारतीय जीवन बीमा निगम, ब्लैकस्टोन, रेलिगेयर, एचडीएफसी म्युचुअल फंड और यूटीआई म्युचुअल फंड शामिल हैं।
 
हालांकि इन शेयरधारकों द्वारा कोई खास आवाज नहींं उठाई गई है, लेकिन अब निजी कंपनियों में भी अल्पांश शेयरधारक कहीं अधिक मुखर होने लगे हैं। खुली पेशकश संबंधी दायित्वों से छूट दिए जाने से बैंकों के पास इन शेयरों को ऊंची कीमत पर बेचने के लिए प्रभावी तौर पर एक विकल्प होगा जो अन्य शेयरधारकों के पास उपलब्ध नहीं होगा। इनगवर्न रिसर्च सर्विसेज के प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रमण्यन ने कहा कि इन रियायतों से संकटग्रस्त कंपनियों अथवा निवेशकों को कुछ खास मदद नहीं मिलने वाली है। उन्होंने कहा, 'यह तो उसी तरह की बात हुई कि आप चांद पर जाना चाहते हैं, जरा मैं आपके लिए यह दरवाजा खोल दूं।' उन्होंने बताया कि इन कंपनियों की समस्याओं को निपटाने के लिए कहीं अधिक प्रयास करने होंगे। हालांकि दिवालिया कानून के तहत प्रक्रिया शुरू करने के लिए आरबीआई द्वारा चयनित इन 12 प्रमुख कंपनियों का कुल ऋण बोझ 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। इनमें सूचीबद्ध सभी नौ कंपनियों में 26 फीसदी खुली पेशकश के लिए कुल लागत 1,800 करोड़ रुपये से कम होगी। इनमें से कुछ कंपनियों के शेयरों में आई हालिया तेजी के बावजूद यह स्थिति दिख रही है। इनमें से पांच कंपनियों में खुली पेशकश का आकार कुल ऋण बोझ के 1 फीसदी से भी कम होगा।
 
बाजार नियामक की इस पहल का स्वागत करने वाले विश्लेषकों का कहना है कि यदि अल्पांश शेयरधारकों ने यह बलिदान नहीं किया तो उनकी स्थिति कहीं अधिक खराब हो जाएगी क्योंकि किसी नए निवेशक के आने के बाद ही पुनरुद्धार का अवसर मिलेगा। ग्रांट थॉर्टन इंडिया के पार्टनर, इंडिया लीडरशिप टीम, हरीश एचवी ने कहा कि किसी सूचीबद्ध कंपनी में अल्पांश शेयरधारकों के लिए खुली पेशकश एकमात्र विकल्प नहीं है और इन रियायतों से निवेशकों को फायदा हो सकता है। उन्होंने कहा, 'इससे उन्हें उस मूल्य पर अपने शेयरों को बेचने का अवसर मिलेगा जिस मूल्य पर अधिग्रहणकर्ता शेयरों के एक हिस्से के लिए भुगतान करने जा रहा है। भारी वित्तीय दबाव तले दबी कंपनियां काफी संकट में हैं और वे नकदी जुटाना चाहती हैं। ऐसे में शेयरधारकों को अपने शेयरों का कोई खास मूल्य नहीं मिलेगा।'
 
लेकिन, ऐसा पहले भी सुना गया है। इनमें से कई निवेशक दूसरी बार अपने शेयरों की बिक्री से इनकार कर रहे हैं। साल 2015 में जब रणनीतिक ऋण पुनर्गठन (एसडीआर) प्रभावी हुआ था, उस समय सेबी ने बैंकों को खुली पेशकश करने से छूट दी थी। उस समय बैंकों को इस शर्त पर एक साल की लॉक-इन अवधि दी गई थी कि यदि बैंक इन शेयरों को हस्तांतरित करेगा तो उसके साथ-साथ लॉक-इन अवधि का भी हस्तांतरण होगा। हालांकि इस रियायत के बावजूद पिछले दो साल के दौरान कुछ खास प्रगति नहीं दिखी। इसलिए सरकार और आरबीआई को नई योजना के साथ पहल करनी पड़ी।
 
बोर्ड बैठक के बाद सेबी के चेयरमैन अजय त्यागी से जब अल्पांश शेयरधारकों के हितों की सुरक्षा के बारे मेंं पूछा गया तो उन्होंने कहा कि तीन साल की लॉक-इन अवधि के साथ आने वाले नए निवेशकों को एक विशेष प्रस्ताव के जरिये शेयरधारकों द्वारा मंजूरी दी जाएगी। शेयरधारकों को दिए जाने वाले नोटिस में खरीदारों की पहचान, उनके कारोबारी मॉडल और उनकी साख के बारे में जानकारी दी जाएगी। उन्होंने कहा, 'उम्मीद है कि इससे इन कंपनियों में अल्पांश शेयरधारकों के हितों की रक्षा होगी।'
 
हालांकि लंबी लॉक-इन अवधि के रूप में एक अतिरिक्त रियायत दी गई है लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि यह प्रस्ताव के लिए एक बड़ी बाधा हो सकती है। हालांकि यह रियायत उस स्थिति में उपलब्ध नहीं होगी जब कंपनी दिवालिया कानून के तहत एनसीएलटी की प्रक्रिया के दायरे मेंं हो। दिवालिया कानून के तहत प्रक्रिया में अल्पांश शेयरधारकों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा क्योंकि यहां निर्णय लेनदारों को करना होता है।
 
जहां तक शेयरों के हस्तांतरण के लिए बैंकों के विशेष प्रस्ताव का सवाल है तो फिलहाल यह स्पष्टï नहीं है कि उसमें अल्पांश शेयरधारकों को वोटिंग का अधिकार होगा अथवा नहीं। संबंधित पक्ष के लेनदेन के लिए सेबी के नियमों के अनुसार, किसी खास प्रस्ताव में दिलचस्पी रखने वाले व्यक्ति को मतदान से दूर माना जाता है। स्टेकहोल्डर्स एम्पावरमेंट सर्विसेज के संस्थापक जेएन गुप्ता ने कहा, 'यदि बैंकों को मतदान की अनुमति दी जाएगी तो यह कहने का कोई मतलब नहीं होता कि विशेष प्रस्ताव से सुरक्षा मिलेगी। तब तो हर प्रस्ताव पास हो जाएगा।'
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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