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मीडिया के लिए शुरुआत में नकारात्मक रहेगा जीएसटी

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  June 23, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है। इस नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का 126,200 करोड़ रुपये के आकार वाले मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के लिए क्या मायने होगा? इस सवाल का जवाब तीन बातों पर निर्भर करता है। पहला, कोई कंपनी मीडिया की किस शाखा से संबंध रखती है? वह फिल्म, टेलीविजन, प्रिंट, रेडियो, ऑनलाइन मीडिया या फिर एकीकृत कंपनी है? और उसमें से भी उसका ताल्लुक सामग्री निर्माण, वितरण या खुदरा किस मूल्य शृंखला से है? अन्य कारकों के अलावा काफी कुछ उद्योग के ढांचे और कारोबारी विन्यास पर भी निर्भर करता है। आप फिल्म उद्योग का ही उदाहरण लीजिए। निर्माण गतिविधियों से जुड़ी फर्मों के लिए तो जीएसटी फायदे का सौदा साबित होगा। पहले के हालात के उलट अब निर्माता लागत मूल्य के बरअक्स अपने राजस्व पर जीएसटी का भुगतान कर सकते हैं। पहले वे निर्माण उपकरणों या अन्य मदों में होने वाले खर्च पर मूल्य वद्र्धित कर (वैट) का दावा नहीं कर सकते थे। हालांकि फिल्मों के  प्रदर्शन या रंगमंच से जुड़ी कंपनियों के लिए हालात ज्यादा जटिल होने वाले हैं। मनोरंजन कर की दरें देश के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग होने से जीएसटी का असर इस पर निर्भर करेगा कि किस राज्य में किसी फिल्म प्रदर्शन कंपनी के कितने अधिक थिएटर मौजूद हैं? 

 
जीएसटी के तहत 100 रुपये से कम कीमत वाले फिल्म टिकटों पर 18 फीसदी की दर से जीएसटी लगेगा जबकि 100 रुपये से अधिक मूल्य वाले टिकटों पर 28 फीसदी की दर से कर लगेगा। पीवीआर सिनेमाज के मुख्य वित्त अधिकारी नितिन सूद का मानना है कि पीवीआर और आईनॉक्स जैसी कंपनियों के मल्टीप्लेक्स थिएटर देश के शीर्ष 50 शहरों में मौजूद हैं। भारत में बिकने वाले कुल टिकटों में 100 रुपये से कम मूल्य वाले टिकटों की संख्या 10 फीसदी से भी कम है। यह टिकट बिक्री से प्राप्त रकम का 5-6 फीसदी ही है। मल्टीप्लेक्स का औसत टिकट मूल्य 160 रुपये से अधिक होता है। भारतीय मल्टीप्लेक्स संघ ने देश के 20 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में जीएसटी के संभावित असर को लेकर एक आकलन किया है। 
इस विश्लेषण में पाया गया है कि 12 राज्यों में टिकटों पर 28 फीसदी जीएसटी का नकारात्मक असर पड़ेगा जबकि सात राज्यों में इसका सकारात्मक असर रहने की संभावना है और एक राज्य में यह निष्प्रभावी रहेगा। खाद्य एवं पेय पदार्थों पर 18 फीसदी की दर से जीएसटी लगने का असर पूरी तरह नकारात्मक रहने की आशंका है। इसकी वजह यह है कि पहले सरकार इन उत्पादों पर 12.5 फीसदी की दर से ही वैट वसूल करती थी। सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघरों में टिकटों का मूल्य आम तौर पर गिरावट पर है। 
 
इन पर जीएसटी के असर को लेकर काफी चर्चा हो रही है। बेहतर स्थिति वाले सिनेमाघरों में टिकट का औसत मूल्य 100 रुपये से अधिक रहने की संभावना है। इस तरह सिनेमाघरों के लिए तो जीएसटी का असर काफी हद तक नकारात्मक ही रहने के आसार हैं। हालांकि एक अच्छा पहलू यह है कि जीएसटी के आने से सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघरों को पारदर्शी बनाने का रास्ता साफ होगा। अभी तक ये सिनेमाघर अधिकांशत: नकदी में ही लेनदेन करते हैं और मनोरंजन कर का भी आम तौर पर भुगतान नहीं करते हैं। इस विमर्श का दूसरा बिंदु भी है। कर की शर्तों के आधार पर जीएसटी को आप सीधे तौर पर नकारात्मक, सकारात्मक या तटस्थ नहीं करार दे सकते हैं। अगर यह कारगर साबित होता है तो इससे कर प्रणाली में अनुशासन और पारदर्शित आएगी जो कि अब तक कारोबार में काफी हद तक नदारद रही है। भारत में सभी केबल प्रणालियों के दो-तिहाई कारोबार पर स्थानीय नेताओं और उनके समर्थकों का कब्जा है। ये केबल कारोबारी राजस्व की जानकारी देने में भी बड़े पैमाने पर हेरफेर करते हैं। हालांकि जीएसटी के तहत किसी भी कारोबारी को अपने इनपुट एवं आउटपुट के बीच संतुलन दिखाना होगा, लिहाजा केबल प्रसारकों को भी अपने राजस्व संग्रह की जानकारी देनी होगी और उसके हिसाब से कर का भुगतान करना पड़ेगा। अगर जीएसटी की वजह से केबल कारोबार में सौ फीसदी पारदर्शिता आ जाती है तो इससे अकेले टेलीविजन उद्योग में ही एक से दो अरब डॉलर आ जाएंगे।
 
विमर्श का तीसरा बिंदु जीएसटी की जटिलताओं के निपटारे में मीडिया उद्योग की काबिलियत से जुड़ा हुआ है। मसलन, पहले कंपनियों को केंद्रीय स्तर पर पंजीकृत होना काफी होता था लेकिन अब जिन राज्यों में भी वे कारोबार करेंगी उन्हें वहां पर अपना पंजीकरण कराना होगा। रेडियो मिर्ची की प्रतिनिधि कंपनी ईएनआईएल के मुख्य वित्त अधिकारी एन सुब्रमण्यन कहते हैं कि जीएसटी के इस प्रावधान के चलते रेडियो मिर्ची को देश के 22 राज्यों में अपना पंजीकरण कराना होगा। इन राज्यों में रेडियो मिर्ची के 50 स्टेशन काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि संचालन वाले सभी राज्यों में पंजीकरण कराना एक प्रक्रियागत परेशानी है। वह कहते हैं कि इस काम में लागत भी एक पहलू होगा। जहां तक छोटे शहरों का सवाल है तो वे राजस्व कमाई के बड़े स्रोत नहीं हैं। ऐसी स्थिति में हरेक राज्य में पंजीकरण कराना और जीएसटी संबंधी मामलों की देखरेख के लिए कर्मचारी रखने से कंपनी पर खर्च का बोझ भी बढ़ेगा। हरेक जगह एक कर्मचारी रखने पर सालाना 4-5 लाख रुपये का अनुमानित बोझ पडऩे का अनुमान है। कई जगहों पर पंजीकरण करने से एक ही कंपनी के विभिन्न कार्यालयों के भीतर सेवाओं के अंदरूनी स्थानांतरण की जटिलाएं पैदा हो सकती हैं। स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर काम करने वाले समाचारपत्रों और रेडियो फर्मों के लिए भी यह काफी हद तक सही लगता है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर संचालित होने वाले टेलीविजन नेटवर्क के समक्ष ऐसी चुनौती खड़ी होने की संभावना कम है। इस तरह जीएसटी मीडिया के लिए सीमित अवधि में जटिलताएं पैदा कर सकता है। हालांकि मूल्य शृंखला के परे यह अघोषित राजस्व और कराधान को दुरुस्त करने जा रहा है, लिहाजा इससे होने वाली परेशानियों के अच्छे नतीजे भी निकलेंगे।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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