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किसान समस्या का कैसे करें निदान?

नितिन देसाई /  June 22, 2017

 

किसानों को व्यक्तिगत स्तर पर या सामूहिक रूप से सशक्त बनाने वाली नीतियों की मदद से बाजार की अनिश्चितताओं से जुड़े जोखिम को कम किया जा सकता है। इस संबंध में जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

मध्य प्रदेश तथा कुछ अन्य राज्यों में किसान आंदोलनों ने देश में कृषि क्षेत्र की स्थिति को लेकर चिंता पैदा कर दी है। यह ध्यान देने लायक है कि इस वर्ष किसानों का विरोध प्रदर्शन तब हो रहा है जबकि गत वर्ष मॉनसून बेहतर रहा है। विरोध प्रदर्शन का स्वरूप बताता है कि किसानों की नाराजगी बहुत ज्यादा है। परंतु तात्कालिक और दीर्घकालिक हल तलाश करने के लिए कृषि अर्थव्यवस्था की गहरी समझ होना आवश्यक है। 
 
बीते पांच साल में कृषि अर्थव्यवस्था का आकलन सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) के जरिये किया जाता रहा है जिसकी जानकारी राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी के आंकड़ों से आती है। इस अवधि में यह 2.3 फीसदी की दर से बढ़ा है। फसल उत्पादन के आंकड़ों का सूचकांक देखें तो वर्ष 2010-11 से इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है। इसलिए जीवीए में होने वाली वृद्घि मूलतया कृषि कारोबार में हुई वृद्घि को ही दर्शा सकता है। हालांकि वर्ष 2013-14 से आगे अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)की बात करें तो चावल में औसतन केवल 4.1 फीसदी और गेहूं में 4.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जबकि  उर्वरकों, गैर कृषि कच्चे माल की की कीमतों में तब से अब तक औसतन 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में लागत और हासिल का अनुपात वर्ष 2011 के 98.8 से सुधरकर वर्ष 2015-16 में 106.8 फीसदी हुआ है। 
 
हालांकि कारोबार की शर्तें (लागत मूल्य और हासिल मूल्य का अंतर) फिलहाल कृषि के पक्ष में है लेकिन अगर किसान बनाम गैर किसानों पर यही अध्ययन किया जाए तो यह अनुपात गैर किसान कृषि श्रमिकों के पक्ष में कतई जाता नहीं दिखता। यहां यह पिछले कई सालों से 97 पर स्थिर है। कृषि आय के आंकड़ों की बात करें तो उनके मुताबिक वर्ष 2010-11 से 2014-15 के बीच इसमें दोगुने की बढ़ोतरी हुई है। इसलिए फिलहाल हमारा सामना केवल कृषि वृद्घि की चिंताओं से नहीं हो रहा है बल्कि इसका संबंध भूस्वामियों और श्रमिकों के बीच आय के वितरण से भी है। 
 
देश में कृषि अब पारंपरिक तौर तरीके से अलग हटकर आधुनिक पूंजीवादी स्वरूप ग्रहण कर रही है जहां किसान जमीन में सुधार और सिंचाई में निवेश कर रहे हैं, बीज की नई किस्में अपना रहे हैं, नई फसल और खेती के नए तरीके अपना रहे हैं। मामूली जोत वाले कई किसान अपनी जमीन बड़े किसानों को लीज पर दे रहे हैं। उद्यमी प्रकृति के किसान इन सुधारों के लिए कर्ज ले रहे हैं और निवेश कर रहे हैं जबकि मौसम और बाजार की अस्थिरता से जुड़े जोखिमों में कोई कमी नहीं आई है।
 
मौसम से जुड़े जोखिम को देखा जाए तो जल प्रबंधन ही उसका उपाय है। लेकिन सिंचाई के क्षेत्र में हमने कोई खास प्रगति नहीं की है। सतह से होने वाली सिंचाई कमजोर हो रही है। पिछले काफी समय से सिंचित क्षेत्र में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। वह भी किसानों द्वारा लगाए गए ट््यूबवेल की बदौलत। लेकिन ट्यूबवेल में समस्या यह है कि उसने देश के कई हिस्सों में भूजल का जबरदस्त दोहन किया है। 
 
किसानों को फसल बीमा सुरक्षा का काफी जोरशोर से प्रचार किया गया था लेकिन इसका दायरा भी बहुत कम है। वर्ष 2013-14 में बुआई के 22 फीसदी रकबे से बढ़कर 2015-16 तक यह 26 फीसदी हुआ है। यही वजह है कि कृषि ऋण माफी की मांग जोर पकड़ रही है। इसके अलावा ब्याज में छूट की मांग भी हो रही है। यह देश में कृषि ऋण व्यवस्था की व्यवहार्यता को जटिल बनाता है। 
 
आपूर्ति क्षेत्र की अनिश्चितता दूर करने में वक्त लगेगा और मौसम की अनिश्चितता से पूरा बचाव संभव नहीं है। खासतौर पर जलवायु परिवर्तन के आसन्न खतरे को देखत हुए। वाणिज्यिक उत्पादक तेजी से ज्यादा पैदावार वाली किस्मों का रुख कर रहे हैं। इसका असर जैव विविधता पर पड़ेगा। हालांकि बाजार की अनिश्चितता से जुड़ी इस समस्या को ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों की मदद से दूर किया जा सकता है जो किसानों को व्यक्तिगत स्तर पर या समूह में सशक्त बनाएं। 
 
चावल और गेहूं की सरकार द्वारा उच्च खरीद और भंडारण के चलते कई बार यह भ्रम पैदा हो जाता है कि कृषि बाजार पर सरकार का दबदबा है। हमारे राजनेता भी इस भावना को बल देते हुए उन उपजों की कीमतों से जुड़े फैसले करते हैं जिनके बाजार पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। सरकारी खरीद की व्यवस्था केवल चावल और गेहूं के बाजार में ही तगड़ी पहुंच रखती है वह भी सीमित राज्यों में। ताजा सरकारी खरीद सत्र में 93 फीसदी से अधिक गेहूं की खरीद पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में हुई। चावल की 93 फीसदी खरीद 10 राज्यों में हुई। सकल रकबे में 60 फीसदी से अधिक में गेहूं और चावल से इतर फसल उगाई गई। इनमें से अधिकांश के लिए एमएसपी घोषित होने के बावजूद सरकारी खरीद शायद ही होती हो। 
 
किसान पूरी तरह निजी खरीद पर निर्भर हैं। खराब होने वाली चीजों जैसे कि फलों और सब्जियों तथा दूध का बाजार भी कृषि का एक अहम घटक है। इनमें से कई चीजों का बाजार अस्थिर है क्योंकि मौसम और बेमौसम में इनकी आवक पर असर पड़ता है। ये समस्त उत्पाद उपभोक्ताओं में जबरदस्त मांग रखते हैं और किसानों की आय का जरिया हैं। फल और सब्जियां बागवानी की अहम घटक हैं जो कृषि उत्पादन में 30 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं।
 
आलू और प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अब बढ़ती समृद्धि के बीच टमाटर भी दिल्ली के नीति नियंताओं के लिए अहम हो गया है। वहां ध्यान मुद्रास्फीति और उपभोक्ताओं के हितों पर रहता है। इस वर्ष हालात बदल गए हैं। समस्या मुद्रास्फीति नहीं बल्कि अपस्फीति की है। किसानों की बात करें तो खराब होने वाली फसलों में से प्रमुख फसलों की कीमतें पिछले छह महीने से लगातार गिर रही हैं। कीमतों में यह गिरावट विमुद्रीकरण के कारण हो सकती है जिसने कारोबारियों को प्रभावित किया। ये कारोबारी प्राय: नकदी में कारोबार करते हैं और बाजार से नकदी ही छिन गई। यही वजह है कि मई 2017 में कई वर्ष में पहली बार खुदरा महंगाई में कमी आई। 
 
कृषि विपणन व्यवस्था में सुधार अनिवार्य हो चला है। उसकी मदद से ही किसानों के गुस्से से निपटा जा सकता है। उत्पादकों के सहकारी संघों और प्रसंस्करण तथा शीत गृह शृंखलाओं में निवेश करने, संगठित खुदरा कारोबार के रास्ते खोलने तथा किसानों से प्रत्यक्ष संवाद आदि की मदद, किसान किसके साथ खरीद बिक्री करें इससे संबंधित प्रतिबंध आदि हटाकर यह सब किया जा सकता है। इसके अलावा सरकार में यह इच्छा शक्ति होनी चाहिए कि वह उन पारंपरिक कारोबारियों पर कार्रवाई कर सके जो ग्रामीण और शहरी बाजारों में दबदबा बनाए हुए हैं। 
Keyword: madhya pradesh, farmer, मध्य प्रदेश,
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