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बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा की गुणवत्ता में हो सुधार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  June 21, 2017

मुख्य आर्थिक सलाहकार को तमाम पेशेवर अर्थशास्त्रियों के बीच हमेशा वित्त मंत्रालय का एक सम्मानित पद माना जाता है। देश के कई प्रतिष्ठिïत अर्थशास्त्री उस पद पर रहे हैं। उनमें से कई ने सरकार की आर्थिक नीति को आकार देने में काफी योगदान किया है। जबकि कई अन्य शीर्ष आर्थिक प्रशासक तक बने। उनमें से एक तो देश के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब रहे। यहां मेरा उद्देश्य बतौर मुख्य आर्थिक सलाहकार इन अर्थशास्त्रियों के प्रदर्शन का आकलन करना नहीं है। बल्कि मैं उनके काम करने के तरीके में एक हालिया रुझान को रेखांकित करना चाहता हूं। यह भी कि यह बदलाव देश के आर्थिक प्रशासन के लिए क्या निहितार्थ रखता है। 

 
मुख्य आर्थिक सलाहकार का एक प्रमुख काम है सालाना बजट पूर्व दस्तावेज तैयार करना जिसमें समीक्षाधीन वर्ष के दौरान देश की अर्थव्यवस्था की प्रमुख उपलब्धियां दर्ज की जाती हैं और कई नीतिगत मसलों को पेश किया जाता है जिनसे निपटकर सरकार को तेज आर्थिक वृद्घि हासिल करनी होती है। इसके अलावा मुख्य आर्थिक सलाहकार को अहम आर्थिक मसलों पर वित्त मंत्री के आंख-कान की भूमिका भी निभानी होती है। व्यापक तौर पर यह भूमिका बदली नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार सरकार की आर्थिक नीति में अपना योगदान देते रहे हैं। परंतु हाल के वर्षों में कुछ खास क्षेत्रों में उनकी भूमिका को लेकर बहस छिड़ी है। खासतौर पर बाहरी क्षेत्रों मसलन व्यापार और भुगतान संतुलन के प्रबंधन और डाटा सुधार जैसे कि कई आर्थिक सूचकांकों के आधार वर्ष बदलना। हाल के कुछ वर्षों में मुख्य आर्थिक सलाहकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच के रिश्तों पर सबका ध्यान रहा।
 
परंतु हाल के वर्षों में उनके काम में सबसे अहम बदलाव उस तरीके में आया है जिसके जरिये वे बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा तैयार करते हैं। वर्ष 1990-91 तक आर्थिक समीक्षा एक ऐसा दस्तावेज होता था जिसमें क्षेत्रवार समीक्षा होती और अर्थव्यवस्था, प्रमुख नीतिगत मुद्दों और सरकार के समक्ष चुनौतियों पर बात की जाती। इसके अलावा सार्वजनिक वित्त, अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा समेत कई सामाजिक क्षेत्र के मुद्दों को लेकर भी जानकारी रहती। अशोक देसाई ने सन 1991 से 1993 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार की भूमिका निभाई लेकिन उनको मुख्य सलाहकार का पद दिया गया था। उन्होंने इसके ढांचे में अहम बदलाव किए थे। उन्होंने आर्थिक समीक्षा को दो हिस्सों में बांटा। पहले हिस्से में आर्थिक चुनौतियों का आकलन था और दूसरे में अर्थव्यवस्था का क्षेत्रवार चरणबद्घ आकलन पेश किया गया और डाटा सुधार के तरीके में भी सुधार किया गया। उसके बाद के मुख्य आर्थिक सलाहकारों ने जो आर्थिक समीक्षा तैयार की, उसमें डाटा पेश करने के तरीके में और सुधार किया गया। लेकिन वे एक खंड वाली पुरानी व्यवस्था की ओर लौट गए। इस दौरान अहम आर्थिक नीति संबंधी मुद्दों, सरकार की चुनौतियों और अवसरों पर ध्यान केंद्रित किया गया जबकि अर्थव्यवस्था की प्रमुख चुनौतियों और अवसरों को रेखांकित किया जाता। लेकिन इन सभी ने यह सुनिश्चित किया कि पहले खंड में जो भी लिखा जाए उसे जरूरत से अधिक तवज्जो न दी जाए। किसी भी मुख्य आर्थिक सलाहकार ने अपना नाम समीक्षा लिखने वाली टीम के नेतृत्वकर्ता के रूप में नहीं दिया। 
 
वर्ष 2007-08 में अरविंद विरमानी के आगमन के बाद तस्वीर बदल गई। उन्होंने अपना और अपनी टीम का नाम बतौर लेखक देना शुरू किया। उनके बाद आए कौशिक बसु ने भी यह सिलसिला जारी रखा। परंतु डॉ. बसु ने जो भाग लिखा उसने समीक्षा में अन्य सभी भागों की महत्ता को कम कर दिया। प्रशासनिक चुनौतियों से निपटने के नए तरीके पेश किए गए। भले ही उनका बजट से कोई सीधा संबंध नहीं था। जाहिर है बाद में ज्यादातर चर्चा इस बात पर होती रही कि डॉ. बसु ने अर्थव्यवस्था के हालात के बारे में क्या लिखा और क्या कुछ किए जाने की आवश्यकता है।
 
इस दौरान अन्य समान महत्त्व के मुद्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ये मुद्दे तमाम सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों से संबंधित थे। सांख्यिकी से जुड़े हिस्से की महत्ता भी कम हो गई। इसके लिए आंशिक तौर पर यह बात भी जिम्मेदार रही कि अन्य स्रोतों से कहीं अधिक अद्यतन आंकड़े मिल रहे थे। खासतौर पर आरबीआई से। इसके अलावा इन आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण में कोई सुधार भी देखने को नहीं मिला। डॉ. बसु के बाद आए रघुराम राजन ने भी वही रुख बरकरार रखा। उन्होंने भी इस पर अपनी निजी छाप छोड़ी। मौजूदा मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी यही रुख बरकरार रखा और आर्थिक समीक्षा में विश्लेषण और अन्य सामग्री की गुणवत्ता में सुधार जारी रहा। यहां दो बदलाव ध्यान देने लायक हैं। अब आर्थिक समीक्षा के मुख्य संदेश और वित्त मंत्रालय की नीति निर्माण रुख में दूरी हो गई है। इससे पहले आर्थिक समीक्षा वित्त मंत्रालय या वित्त मंत्री की सोच बताती थी। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि अब यह समीक्षा पूरी तरह मुख्य आर्थिक सलाहकार का नजरिया प्रस्तुत करती है। सरकार और वित्त मंत्री की तो बात ही दूर है।
 
दूसरी बात, पहले खंड पर जरूरत से अधिक जोर देने से अन्य खंडों की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। बीते कुछ सालों में अन्य भागों की गुणवत्ता सुधारने के लिए कुछ खास प्रयास नहीं किए गए। हकीकत में पिछली समीक्षा में तो अन्य क्षेत्रों पर कोई खंड ही नहीं था। न ही सांख्यिकी वाला हिस्सा था। वादा किया गया था कि ये हिस्से जून तक प्रस्तुत किए जाएंगे। इस बात का असर वित्त मंत्रालय की आर्थिक शाखा के मानस पर पड़ा होगा। आवश्यकता इस बात की है कि आर्थिक समीक्षा की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ विभाग के नैतिक बल में भी इजाफा करने का प्रयास किया जाए। बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा में वित्त मंत्रालय और आर्थिक नीति को लेकर सरकार के विचारों को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। वह केवल मुख्य आर्थिक सलाहकार का दस्तावेज बनकर न रह जाए।
Keyword: budget, संसद बजट सत्र, narendra modi,,
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