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राष्ट्रपति चुनाव : भाजपा के 'तुरूप के पत्ते' ने बढ़ाई 'एकजुट' विपक्ष की कठिनाई

अर्चिस मोहन /  06 20, 2017

राष्ट्रपति पद के लिए उम्‍मीदवार का चयन

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा है कि उनकी पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) राष्ट्रपति पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करेगी। हालांकि बीजद राष्ट्रपति चुनाव के लिए 'संयुक्त' हुए विपक्ष का हिस्सा नहीं है। लेकिन 17 दलों के इस गठजोड़ में शामिल कुछ दल भी कोविंद के खिलाफ साझा उम्मीदवार खड़ा करने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं।

इन विपक्षी दलों के नेताओं का मानना है कि राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को लेकर अब किसी तरह का असमंजस नहीं रह गया है। संभावना है कि राजग उम्मीदवार के पक्ष में राष्ट्रपति निर्वाचक मंडल के 60 फीसदी से भी अधिक मत पड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनका आकलन है कि विपक्ष को राष्ट्रपति चुनाव में अब अपनी ताकत नहीं लगानी चाहिए। इसकी वजह यह है कि दलित समुदाय से ताल्लुक रखने के अलावा कोविंद कभी भी कट्टर हिंदुत्व के लिए चर्चा में नहीं रहे हैं।

ऐसी राय रखने वाले विपक्षी नेताओं का मानना है कि विपक्ष को किसी बड़े मुद्दे पर सरकार की घेराबंदी के लिए अपनी एकजुटता का इस्तेमाल करना चाहिए। इन दलों की राय में मोदी सरकार की मजदूर, किसान और गरीब विरोधी नीतियों का खुलासा करने और इसके खिलाफ देशव्यापी भारत बंद को सफल बनाने की मुहिम में विपक्ष को जुट जाना चाहिए। अनुमान है कि विपक्ष के इस भारत बंद का आयोजन अगले पखवाड़े किया जा सकता है।

इस बीच विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं ने विपक्षी उम्मीदवार के तौर पर पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और पूर्व सांसद प्रकाश आंबेडकर के नाम पर चर्चा की है। मीरा कुमार दलित नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री जनजीवन राम की बेटी हैं। वहीं प्रकाश आंबेडकर संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर के पौत्र हैं। विपक्षी खेमे में शामिल वामपंथी दल चाहते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रतीकात्मक वैचारिक लड़ाई जरूर लड़ी जाए। हालांकि कांग्रेस का रुख अभी अनिश्चित है और संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार के बारे में अंतिम फैसला गुरुवार को होने वाली बैठक में ही होने की संभावना है। मीरा कुमार के कांग्रेस से जुड़े होने की वजह से विपक्ष के कुछ दलों को उनके नाम पर एतराज होने की भी संभावना है।

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने कहा है कि अगर विपक्ष दलित समुदाय से संबंधित कोई बेहतर उम्मीदवार नहीं खड़ा करता है तो वह कोविंद को समर्थन देंगी। उन्होंने कहा है कि कोविंद दलित जाति कोली से संबंधित होने के साथ ही उत्तर प्रदेश से भी ताल्लुक रखते हैं लिहाजा बसपा उनके प्रति नकारात्मक रुख नहीं अपनाएगी। वैसे अगर प्रकाश आंबेडकर को विपक्षी उम्मीदवार के तौर पर चुना जाता है तो मायावती का समर्थन हासिल किया जा सकता है। लेकिन बिहार के दलित समुदाय में खासी पैठ रखने वाला जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) कोविंद के खिलाफ चुनाव लडऩे को लेकर खास उत्सुक नहीं दिख रहा है।

विपक्षी खेमे में शामिल बिहार के एक नेता ने कहा, 'दलित के खिलाफ दलित उम्मीदवार खड़ा करने का आखिर क्या मतलब है? क्या सवर्ण जातियां इतने साल तक यही नहीं चाहती रही हैं? कोविंद राष्ट्रपति पद के लिए एक अच्छे प्रत्याशी हैं। विपक्षी एकता को आगे लड़ाई के कई और मोर्चे मिलने वाले हैं और हमें उन्हीं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।' उनके आकलन में समाजवादी पार्टी, जेडीयू और कांग्रेस के भी कुछ नेताओं के विचारों की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है।

इस धारणा के समर्थक वर्ष 1997 की याद दिलाते हैं जब दलित समुदाय से संबंधित के आर नारायणन का नाम राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर सामने आने पर लगभग सभी दलों ने उनका समर्थन किया था। उस समय नारायणन को संयुक्त मोर्चे की तरफ से उम्मीदवार बनाया गया था लेकिन कांग्रेस और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने भी समर्थन दिया था। संयुक्त मोर्चे में जनता दल समेत कई क्षेत्रीय दल शामिल थे।

खास बात यह है कि उस समय विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहली बार किसी दलित के बैठने का समर्थन किया था। अकेले शिवसेना ने ही नारायणन के खिलाफ खड़े पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन को अपना समर्थन दिया था। अगर कोविंद चुनाव जीत जाते हैं तो वह भारत के राष्ट्रपति बनने वाले दूसरे दलित होंगे।

इन विपक्षी नेताओं का कहना है कि राजग के पास पहले से ही निर्वाचक मंडल के 48.6 फीसदी मत हैं। इसके अलावा कोविंद का नाम सामने आने के बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), बीजद, वाईएसआर कांग्रेस और अन्नाद्रमुक ने भी अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। ऐसी स्थिति में राजग उम्मीदवार को 60 फीसदी से अधिक निर्वाचक मंडल का समर्थन मिल गया है और उनकी जीत सुनिश्चित लग रही है। 

जेडीयू राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद को समर्थन देकर बिहार के दलित मतदाताओं के बीच यह संदेश दे सकती है कि भले ही नरेंद्र मोदी देश के लिए अच्छे नेता हों लेकिन बिहार के लिए तो नीतीश कुमार ही सबसे अच्छे नेता हैं। इसी तरह ओडिशा में भाजपा के तीव्र उभार से परेशान नवीन पटनायक कोविंद को समर्थन देकर लोगों को यह जताना चाहते हैं कि ओडिशा उनके नेतृत्व में पूरी तरह सुरक्षित है और भाजपा की नीतियों से कोई अंतर नहीं है। जेडीयू की तरह बीजद भी लंबे समय तक भाजपा का सहयोगी दल रह चुका है। बीजद ने 1998 से लेकर 2009 तक ओडिशा में भाजपा का साथ दिया था तो जेडीयू लंबे साथ के बाद वर्ष 2013 में भाजपा से अलग हुई थी।
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