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कम कमाई की वजह से किसान बना रहे दलहन और तिलहन से दूरी

दिलीप कुमार झा / मुंबई June 20, 2017

इस खरीफ सीजन में किसान तिलहन और दलहन की अपेक्षा कपास और मक्के जैसी अधिक लाभकारी फसलों का रुख कर रहे हैं। मंडियों में कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चलने के कारण तिलहन और दलहन के रकबे में गिरावट आने की संभावना है। दूसरी ओर, किसानों का गुस्सा भड़क रहा है क्योंकि सरकारी एजेंसियों द्वारा उनके उत्पाद नहीं लिए जा रहे हैं और व्यापारी भी जीएसटी से पहले खरीदारी नहीं कर रहे हैं। मंद बुआई के कारण 2017-18 (जुलाई-जून) की मांग-आपूर्ति में नये सिरे से सामंजस्य स्थापित हो सकता है। 
 
भारत अपने खाद्य तेल के 55 प्रतिशत (1.4 करोड़ टन) और दलहन के 25 प्रतिशत (55 लाख टन) भाग के लिए आयात पर निर्भर रहता है। अगर कमाई के नजरिये से देखें तो इसकेमद्देनजर कपास और मक्के के रकबे में बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि अगले सीजन में इससे कीमतों में गिरावट आ जाएगी। किसानों के राष्ट्रव्यापी असंतोष ने खरीफ की बुआई को प्रभावित किया है। महाराष्ट्र में पिछले साल की तुलना में 1.1 प्रतिशत के क्षेत्र में ही बुआई हुई है। 
 
सामान्य मॉनसून के पूर्वानुमान की वजह से अगले कुछ दिनों में बुआई में तेजी आने की संभावना है। कोटक कमोडिटी सर्विसीज के उपाध्यक्ष अरबिंदो प्रसाद ने कहा कि पिछले साल मूंगफली, अरहर और सोयाबीन की तुलना में कपास और मक्का से बेहतर कीमत प्राप्त हुई है। किसान ऐसी लाभकारी फसलों का रुख कर सकते हैं। रिकॉर्ड उत्पादन के कारण दलहन और तिलहन के दाम दबाव में रहे हैं। ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिये सरकार द्वारा भी किसानों को इनकी अधिक खेती के लिए आकर्षित किया गया था। 
 
इसके अलावा, आयात ने भी कीमतों को नीचे रखा। अक्टूबर 2016 और मई 2017 के बीच अरहर की कीमत 45.71 प्रतिशत गिरकर अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य से 25 प्रतिशत नीचे 3,800 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई। मूंग और उड़द के दाम भी क्रमश: 23 प्रतिशत और 30 प्रतिशत गिरकर 4,600 रुपये और 5,650 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए जोकि न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी कम हैं। सोयाबीन और मूंगफली के दाम क्रमश: 11 प्रतिशत और 17 प्रतिशत तक गिरकर 2,886 रुपये और 3,725 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए।
 
हालांकि कपास के दामों में भी गिरावट दर्ज की गई है लेकिन यह गिरावट दलहन और तिलहन की अपेक्षा कम थी। मध्यम प्रकार की बेंचमार्क कपास के दाम 4.7 प्रतिशत तक गिरकर फिलहाल 11,477 रुपये प्रति गांठ (170 किलोग्राम) पर चल रहे हैं। केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि तिलहन एक परंपरागत फसल है जिसका प्रतिस्थापन कम है लेकिन दलहन की खेती करने वाले किसान दूसरी फसलों की ओर स्थानांतरित हो सकते हैं। चूंकि मिट्टïी की दशा तिलहन के अनुकूल है इसलिए दलहन के किसान तिलहन की ओर स्थानांतरित हो सकते हैं। ऐंजल कमोडिटी ब्रोकिंग के रितेश कुमार साहू ने कहा कि जब तक सरकार आयात शुल्क नहीं बढ़ाती तब तक संभव है कि किसान दलहन और तिलहन की ओर कम ही जाएं।
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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