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दखलअंदाजी से हो मुक्त सरकारी प्रतिनिधि का कामकाज

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  June 20, 2017

पिछले दिनोंं भारतीय मीडिया में एक ऐसी बैठक की खबरों की चर्चा रही जो दरअसल हुई ही नहीं थी। दरअसल यह खबर आम थी कि वित्त मंत्रालय के अधिकारियों और रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के सदस्यों के बीच कोई बैठक आयोजित की गई है। लगभग उसी वक्त अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के प्रमुख को उनके पद से इसलिए हटा दिया गया क्योंकि ऐसी जानकारी सामने आई थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के न्याय को बाधित करने संबंधी एक मामले की जांच के दौरान उनके और ट्रंप के बीच किसी तरह की चर्चा हुई। 

 
इन दोनों घटनाओं से एक साझा प्रश्न उपजता है। अगर किसी संस्थान में खुद का प्रशासनिक और निर्णय ढांचा मौजूद है तो सरकार को उसमें या उसके कामकाज में किस हद तक हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि ऐसा कोई हस्तक्षेप सरकार करती है तो उसका स्तर क्या होना चाहिए? कई लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए यह बहस का विषय ही नहीं है। उनका मानना है कि एक बार संस्थान के सरकारी होने का अर्थ है सरकार को उसके प्रशासन में हस्तक्षेप का पूरा अधिकार होना। अगर आप भी इस रुख में यकीन करते हैं तो आप चाहें तो इस आलेख को आगे न पढ़ें। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो मुद्दा भारत के लिए अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक प्रासंगिक है। जानते हैं कि ऐसा क्यों है? 
 
देश के अधिकांश आर्थिक कानूनों की मदद से पूंजी बाजार, बीमा क्षेत्र, पेंशन फंड अथवा दूरसंचार और विमानन आदि क्षेत्रों के लिए नियामक गठित किए गए हैं। इन सभी मामलों में इस बात के विशेष प्रावधान किए गए हैं कि केंद्र सरकार चाहे तो नियामकों को नीति के संबंध में जरूरी निर्देश दे सकती है। अगर नीतियों को लेकर एक से अधिक दृष्टिïकोण संभव हों तो सरकार का नजरिया ही अंतिम होगा। कई लोगों के लिए सरकार की यह विधिक स्थिति पर्याप्त है कि वह किसी नियामकीय या जांच संस्थान में बिना शर्त अपनी बात कह सके। 
 
निश्चित तौर पर जब हस्तक्षेप को लेकर विवाद उत्पन्न होता है तो सरकार से जुड़े लोग इन प्रावधानों का उल्लेख करते हैं। इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि अक्सर यह कहा जाता है कि सरकारी रिकॉर्ड में इस बात का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है। यह भी सच है कि औपचारिक रूप से इनका इस्तेमाल करने को लेकर एक किस्म की अनिच्छा रहती है। यानी इनका इस्तेमाल कुछ इस अंदाज में होता है कि उसका कहीं कोई दस्तावेजीकरण न होने पाए। उदाहरण के लिए जब वित्त मंत्रालय को पूंजी बाजार के किसी नियामक और बीमा नियामक को आपसी मतभेद दूर करने के लिए नीतिगत निर्देश देना था और उनको बताना था कि यूनिट लिंक्ड बीमा योजनाओं का नियमन कैसे होना चाहिए क्योंकि उनमें बीमा और म्युचुअल फंड दोनों के गुण होते हैं, तब दरअसल वित्त मंत्रालय ने उनसे कहा कि वे वाद प्रस्तुत करें। नीति निर्देशन शक्ति का औपचारिक इस्तेमाल तब होता जबकि कोई लिखित रुख अपनाया जाता और उस निर्णय की जवाबदेही तय की जाती। लेकिन ऐसे अवसरों पर अनौपचारिक तौर पर केवल निर्देशन से काम चला लिया जाता है।  जब एमपीसी के गठन की बात आई तो पारंपरिक केंद्रीय बैंकरों के बीच ऐसी ही खींचतान देखने को मिली। समिति का स्वरूप कुछ ऐसा बनाया गया कि इसमें शामिल वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधियों को केंद्रीय बैंकरों से चर्चा करनी होती। हालांकि यहां भी अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केंद्रीय बैंक के पास ही रहा क्योंकि इस समिति में भी आरबीआई को निर्णायक मत देने का अधिकार है। 
 
समिति के सदस्यों से मुलाकात के वित्त मंत्रालय के विचार में देश की एक प्रमुख केंद्रीय प्रशासनिक समस्या निहित है। फिर चाहे मामला कॉर्पोरेट प्रशासन का हो या सांविधिक प्रशासन का। जब किसी सरकारी व्यवस्था में जन प्रतिनिधित्त्व, कहीं भी नामित प्राधिकार के रूप में शामिल होता है तो उसे निर्णय लेने का भी समुचित अधिकार होना चाहिए। यानी उस नामित व्यक्ति को डाकिये या प्रवक्ता के रूप में नहीं व्यवहार में लाया जाना चाहिए। वह कोई संदेशवाहक या एजेंट नहीं है जो नामित प्राधिकार के निर्देश का पालन करे। 
 
उदाहरण के लिए कंपनी के निदेशक मंडल में एक निदेशक शेयरधारकों द्वारा नामित होता है। उसे कंपनी के प्रशासन में सांविधिक भूमिका निभानी होती है। वास्तव में अंशधारकों द्वारा नामित होने के कारण उसे बोर्ड में उनकी बातों को सामने रखना चाहिए और यह तय करने में भूमिका निभानी चाहिए कि न केवल उस बोर्ड कार्यालय में कामकाज कैसे हो बल्कि उसे समूचे प्रशासन के काम पर नजर रखनी चाहिए। लेकिन हकीकत में उनका इस्तेमाल रबर स्टाम्प की तरह होता है। वे केवल कागज पर ही उपस्थिति दर्शाते हैं। 
 
यह काफी हद तक ऐसा प्रतीत होता है मानो चुने हुए प्रतिनिधियों के शासन के स्थान पर जनता के शासन में भीड़ का नजरिया हो। यह सुनने में माओवादी जैसा प्रतीत हो सकता है। पर ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें जनता के मतों ने सत्ता में पहुंचाया था। ब्रेक्सिट मामले में यूनाइटेड किंगडम के सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी ऐसा ही मामला है। वहां की संसद ने निर्णय लिया कि उसे यूरोपीय संघ से अलग होना है। ऑस्ट्रेलिया में समलैंगिक विवाहों का मामला भी ऐसा ही है जहां संसद के लोगों ने अपना पल्ला झाडऩे की कोशिश की। और पूरा मामला निर्वाचित प्रतिनिधियों के मतदान के भरोसे छोड़ दिया।  सरकारी प्रतिनिधित्व के साथ एमपीसी का गठन करने का यह अर्थ कतई नहीं है कि सरकार समिति को यह बताए कि उसको क्या करना चाहिए और क्या नहीं? उनको चुने जाने के बावजूद समिति के सदस्यों का जिम्मा है अपना काम करना और स्वतंत्र निर्णय लेना। लेकिन इन सब बातों के बीच एक अत्यंत अहम तत्त्व है: सरकार का ऐसा हस्तक्षेप कुछ इस प्रकार होगा कि खुली बैठकों का आयोजन करने के बजाय ये तमाम चर्चाएं थिंक टैंक की चर्चाओं के समांतर आयोजित की जाएंगी। इतना ही नहीं इन चर्चाओं को लॉबीइंग में प्रभावशाली लोगों के ड्राइंग रूम और कॉकटेल सर्किल में भी अंजाम दिया जाएगा। 
Keyword: मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन,
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