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जीआरपी और आरपीएफ से संबद्ध कुछ तथ्य

विवेक देवरॉय /  June 20, 2017

जीआरपी और आरपीएफ के क्षेत्राधिकार, क्रियाकलाप और कार्मिक आवश्यकताओं में काफी अंतर है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विवेक देवरॉय 

 
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के एकल पीठ ने वर्ष 2014 में कहा था, 'सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश बनाम दुर्गा प्रसाद के मामले में अधिनियम की धारा 8(1) पर विचार किया और कहा कि रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के एक अधिकारी द्वारा अधिनियम की धारा 8(1) के तहत की गई जांच को संहिता की धारा 162 के अधीन की गई जांच नहीं माना जा सकता। इसलिए बालकिशन ए देवीदयाल बनाम महाराष्ट्र के मामले में यह तय पाया गया कि अधिनियम, 1966 की धारा 8(1) के तहत कार्रवाई करने वाले आरपीएफ अधिकारी को पुलिस के जांच अधिकारी के समान अधिकार नहीं हैं और इसलिए वह संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करके प्रक्रिया आरंभ नहीं कर सकता।' अधिनियमों की बात करें तो इस बाबत रेलवे अधिनियम 1989, रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम 1957, रेलवे परिसंपत्ति (अवैध कब्जा) अधिनियम 1966 और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) 1973 हैं।
 
सन 1957 के मूल आरपीएफ अधिनियम में सन 1985 में संशोधन किया गया था ताकि आरपीएफ को केंद्रीय सशस्त्र बल बनाया जा सके। अब जरा धारा 14 को उद्घृत करते हैं, 'इस अधिनियम के अधीन गिरफ्तारी करने वाला बल के किसी भी सदस्य को बिना किसी भी देरी के उस व्यक्ति को पुलिस अधिकारी के पास ले जाना चाहिए और उसकी अनुपस्थिति में उसे तत्काल नजदीकी पुलिस स्टेशन ले जाना चाहिए।'
 
जैसा कि उक्त अदालती आदेशों में भी परिलक्षित हुआ। इसका उत्तर एकदम स्पष्टï है। आरपीएफ कोई पुलिस बल नहीं है। कई रेलवे स्टेशनों पर मेरी नजर आरपीएफ की चौकियों पर गई है जहां लिखा होता है 'आरपीएफ थाना।' सवाल यह है कि अगर आरपीएफ पुलिस बल नहीं है तो उसे थाना कैसे कहा जा सकता है? दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(एस) में कहा गया है, 'पुलिस थाने का अर्थ है कोई भी ऐसी जगह या चौकी जिसे राज्य सरकार ने पुलिस थाना घोषित किया हो।' राज्य सरकार की ओर से ऐसी घोषणा के अभाव में किसी भी जगह को पुलिस थाना कैसे कहा जा सकता है? वर्ष 2003 में रेलवे अधिनियम में संशोधन के साथ हालात और अधिक खराब हो गए। इसके चलते धारा 179 और 180 में बदलाव आया। बिना कानून की गहराई से जानकारी किए धारा 180 डी (2) को इसमें जोड़ दिया गया। इसके मुताबिक अधिकृत प्राधिकारी (मसलन आरपीएफ) उन्हीं अधिकारों का प्रयोग कर सकता था जिनका कि किसी थाने का प्रभारी कर सकता था। 
 
अगर सीआरपीसी इसकी इजाजत नहीं देता तो क्या रेलवे अधिनियम में संशोधन करके आरपीएफ को पुलिस के अधिकार दिए जा सकते हैं? रेलवे के नजरिये से देखें तो पुलिस से तात्पर्य है सरकारी रेल पुलिस (जीआरपी)। मूल समस्या यहीं है। आरपीएफ का मूल काम है रेलवे की परिसंपत्तियों की रक्षा करना। कानून व्यवस्था राज्य का मामला है और जीआरपी राज्य सरकारों के अधीन आती है। यह भी सच है कि कई बार अपराधों के मामले में अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता पड़ती है लेकिन कोई राज्य इस बात के लिए तैयार नहीं होगा कि जीआरपी रेल मंत्रालय को रिपोर्ट करे। अधिकांश राज्यों ने भी आरपीएफ को संघीय पुलिस फोर्स में तब्दील करने का विचार का विरोध किया है। दिसंबर 2016 में आई रेलवे की स्थायी समिति की 12वीं रिपोर्ट रक्षा और सुरक्षा पर केंद्रित थी। वहीं आरपीएफ के अधिकार बढ़ाने की बात पर अब तक 26 राज्यों की टिप्पणियां हासिल हुई हैं और पांच राज्यों से उत्तर प्रतीक्षित हैं। 26 राज्यों में से 17 ने प्रस्तावित संशोधनों का विरोध किया है। गृह मंत्रालय से भी उसे समर्थन नहीं मिला। इसके अलावा गृह मंत्रालय ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन एक संघीय पुलिस बल के निर्माण की राह बनाएंगे जिससे क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद और समस्या उत्पन्न होगी। इतना ही नहीं पुलिस (रेलवे पुलिस समेत) संविधान की अनुसूची 7 की सूची 2 में भी राज्य का मसला है। ऐसे में आरपीएफ को पुलिस अधिकार देने से संविधान की शक्ति के वितरण की व्यवस्था में दिक्कत पैदा हो सकती है और यह सहकारी संघवाद के खिलाफ हो जाएगा।
 
देश में आरपीएफ के 76,000 मंजूर पद हैं। इसमें करीब 11,000 लोग विशेष रेलवे सुरक्षा बल के सदस्य हैं। आरपीएफ के अधिकांश जवान पूर्वी रेलवे और उत्तरी रेलवे में पदस्थ हैं लेकिन 76,000 का आंकड़ा काफी पुराना है। अगर मैंने सही समझा है तो इनकी तादाद 18,000 बढ़ा दी गई है। जीआरपी की लागत का 50 फीसदी भारतीय रेल वहन करती है जबकि शेष 50 फीसदी राज्य सरकार द्वारा वहन की जाती है। आपको सुनने को यही मिलेगा लेकिन यह पूरा सच नहीं है। भारतीय रेल जीआरपी के वेतन का 50 फीसदी वहन करता है। वह उनकी पेंशन, उपकरण, हथियार, वाहन, बुनियादी चीजों, प्रशिक्षण आदि के व्यय में कोई हिस्सेदारी नहीं करती। इन बातों को ध्यान में रखा जाए तो वह जीआरपी की कुल लागत का 20 फीसदी वहन करती है। मैं पूरी तरह निश्चित तो नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि जीआरपी के लिए नियत पद 38,000 हैं। यह 76,000 का आधा है। बहरहाल, एक रोचक बात ऐसी है जो अधिकांश लोगों को पता नहीं है। कई राज्यों ने जीआरपी की क्षमता में इजाफा किया है। ये राज्य व्यय का 100 फीसदी वहन करते हैं और भारतीय रेल से 50 फीसदी से अधिक मदद की उम्मीद नहीं करते। इसकी वजह से जीआरपी की स्वीकृत क्षमता तकरीबन 48,000 मानी जा सकती है। मेरे पास इसका कोई राज्यवार ब्योरा नहीं है लेकिन पंजाब, बिहार और जम्मू कश्मीर जैसे राज्य ऐसे हैं जहां यह सबसे अधिक हुआ है। यही वजह है कि इन राज्यों में प्रति ट्रेन सबसे अधिक जीआरपी जवान देखने को मिलते हैं। असम में भी इनकी तादाद बहुत अच्छी है। प्रति रेलवे स्टेशन देखें तो जीआरपी के सबसे अधिक जवान जम्मू कश्मीर में तैनात हैं। इसके बाद दिल्ली का नंबर आता है। राज्य का झुकाव इस ओर है कि राज्यों की 100 फीसदी फंडिंग के साथ जीआरपी के जवान रखे जा सकें। इससे यही अंदाजा लगता है कि जीआरपी बरकरार रहेगी और आरपीएफ उसकी जगह नहीं ले सकेगा। 
 
(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।) 
Keyword: railway, GRP, RPF,,
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