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खेती-किसानी के धंधे को गंवाने का जोखिम उठा नहीं सकते हम

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  June 19, 2017

मध्य प्रदेश में छह किसानों की दुखद मौत के बाद राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान कृषि क्षेत्र के गहराते संकट की तरफ जा पाया। पुलिस फायरिंग में जान गंवाने वाले किसान अपनी फसलों के लिए ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे थे। लेकिन केवल मध्य प्रदेश के किसान ही सड़कों पर नहीं उतरे हैं। देश के अधिक संपन्न एवं उत्पादक इलाकों में कृषि क्षेत्र की अशांति कहीं ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि इन इलाकों में खेती की लागत अधिक है और इसके चलते किसानों पर कर्ज का बोझ भी अधिक होता है। किसान कराह रहे हैं। उनका कहना है कि बस, बहुत हो गया।

 
खेती के मौजूदा संकट का संबंध अधिक उत्पादन से है। इस साल उपज अच्छी रही है लेकिन किसान फिर भी मुश्किल में हैं। अधिक उत्पादन होने से उनकी उपज की कीमत कम हो गई है। अच्छी पैदावार होने से तो किसानों के पास अपने नुकसान की भरपाई करने और कर्ज चुकाने का मौका था। लेकिन ऐसा कर पाने में नाकाम किसानों की हताशा हमें कुछ कदम उठाने के लिए मजबूर करती है।
 
किसानों की इस समस्या के कई पहलू हैं। पहला, देश फसलों के लिए अधिक कीमतें कैसे दे पाएगा? हमें खाद्य महंगाई दर को भी नीचे रखने की जरूरत है क्योंकि भोजन की ऊंची लागत उपभोक्ताओं को नाखुश कर देती है। यह भी सच है कि भारत में बेहद गरीब लोगों की बड़ी संख्या है। सरकार सस्ती दरों पर खाद्य सामग्री मुहैया कराने के लिए किसानों से कृषि उत्पाद खरीदती है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों में वितरित करती है। इस तरह देश भुखमरी जैसी स्थिति से बचा रहता है।
 
ऐसे में सरकार 'आगे कुआं पीछे खाईÓ वाली स्थिति में फंसी हुई है। एक तरफ किसान हैं जिन्हें खाद्य उत्पादों की सही कीमत देने की जरूरत है।  दूसरी तरफ हजारों किसानों समेत ऐसे लोग हैं जो महंगा भोजन खरीद पाने में अक्षम हैं। इसके बावजूद अभी तक सरकार की नीति किसानों को भुगतान करने की नहीं, खानपान के सामान पर सब्सिडी देने की रही है। एमएसपी की पूरी प्रणाली ही इसी पर टिकी है।
 
दूसरी चुनौती कृषि उत्पादों के सही मूल्य-निर्धारण से जुड़ी है। किसानों के लिए तो एमएसपी उपज मूल्य में होने वाली उठापटक से सुरक्षा देने वाला एक बीमा है। लेकिन एमएसपी केवल 22 खाद्य फसलों के लिए ही लागू है। लेकिन अब एमएसपी प्रणाली को नए सिरे से बनाने की जरूरत है। भोजन की लागत को उसकी समग्रता में समझने की जरूरत है। हम जानते हैं कि खेती का लागत मूल्य बढऩे से किसानों की आय कम हो रही है। किसानों को लगातार मौसम की मार झेलनी पड़ती है जिससे फसलों को भी काफी नुकसान होता है। लिहाजा हमें यह पता ही नहीं है कि एक किसान हमारी थाली तक भोजन पहुंचाने के लिए कितना निवेश कर रहा है?
 
सरकारों और बाजार अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में एमएसपी लगातार बढ़ा है। वे कहते हैं कि खरीद की लागत बढऩे से ही कृषि उत्पादकता बढ़ी है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि फसल उगाने में खर्च रकम के ही आधार पर उस उपज की लागत की गणना नहीं की जा सकती है। उपज की लागत का आकलन करते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसान उस फसल को उगाने के लिए मौसम की बेरहम मार और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य कारकों से निपटने में कितना खतरा उठाता है? इसके अलावा फसल उगाने के लिए जरूरी आधारभूत ढांचे पर होने वाले खर्च को क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए? भारत के किसान खेती संबंधी गतिविधियों में बड़े पैमाने पर अपनी निजी पूंजी भी लगाते हैं। वे अपने खेतों तक सिंचाई सुविधाएं पहुंचाने के लिए खुद ही भुगतान करते हैं। करीब 1.9 करोड़ कुओं और नलकूपों का निर्माण किसानों ने निजी पूंजी से ही कराया है।
 
भोजन की लागत पर हो रही इस चर्चा में दो नुकसानदायक विकृतियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। पहला, किसान को उसकी उपज के लिए भुगतान किस मूल्य पर किया जा रहा है और उस उत्पाद को उपभोक्ता किस मूल्य पर खरीदते हैं। हर कोई जानता है कि दोनों मूल्यों का अंतर लगातार बढ़ रहा है। कृषि संबंधी प्रतिबंधात्मक कानूनों से लेकर भंडारण, ढुलाई और बिचौलियों की भूमिका कम करने के लिए जरूरी ढांचागत सुविधाओं की कमी को इस मूल्य असमानता की वजह माना जाता है। अगर हम किफायती दर पर भोजन सामग्री चाहते हैं तो इस पर गौर करने की जरूरत है। 
 
दूसरी विकृति किसी खाद्य उत्पाद की बढ़ती कीमतों को काबू में करने के लिए खास मात्रा में उसका आयात करने के विकल्प से जुड़ी हुई है। हालांकि उस उत्पाद का आयात करने से घरेलू किसानों पर दोहरी मार पड़ती है। दोहरी नहीं बल्कि तिहरी मार। फसल खराब होने पर उन्हें नुकसान होता है, अधिक उत्पादन होने पर उनकी उपज का मूल्य कम हो जाता है और अधिक कीमत होने पर आयात के जरिये उन्हें लाभ उठाने का मौका नहीं दिया जाता है। आश्चर्य होता है कि इसके बाद भी किसान खेती में लगे हुए हैं और हमारे उपभोग को बरकरार रखा है।
 
यह मत सोचिए कि दूसरे देश विश्व व्यापार संगठन की बाध्यताओं के चलते अपने किसानों को सब्सिडी नहीं देते हैं। इसी तरह यह मानकर भी बेवकूफ न बनिए कि भारतीय किसानों को भारी सब्सिडी दी जाती है। कृषि सब्सिडी का बड़ा हिस्सा खाद कंपनियों के पास चला जाता है। बाकी खाद्य सब्सिडी का इस्तेमाल वितरण के लिए कृषि उत्पादों की खरीद में होता है। इस तरह खेती बाजार में काफी असमानता है और इसे समझने की जरूरत है। यह समय हमारे भोजन का वास्तविक मूल्य और खेतों में भोजन पैदा करने वाले किसानों के लाभ के तरीकों पर चर्चा करने का है। खेती-किसानी के धंधे को गंवाने का जोखिम हम नहीं उठा सकते हैं।
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयरनमेंट की प्रमुख हैं)
Keyword: madhya pradesh, farmer,,
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