बिजनेस स्टैंडर्ड - वैश्विक आतंकवाद से निपटने की चुनौती
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वैश्विक आतंकवाद से निपटने की चुनौती

हरदीप पुरी /  June 19, 2017

मौजूदा हालात पर नजर डाली जाए तो अंदाजा लग जाता है कि दुनिया में आतंकवाद से लड़ाई लंबी चलने वाली है। इसके लिए जरूरी है कि विभिन्न देश अपने-अपने स्तर पर पूरी ईमानदारी बरतें। बता रहे हैं हरदीप पुरी 

 
अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, लंदन में दो सप्ताह के भीतर दो आतंकी हमले हुए। इतना ही नहीं गत 31 मई को काबुल में हुए एक आतंकी हमले में 80 लोग मारे गए। कहने का तात्पर्य यह है कि दुनिया भर में आतंकवाद से लड़ाई अभी काफी लंबी चलने वाली है। मार्च 2002 की बात है मैंने लंदन छोड़ा ही था और जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि की हैसियत से काम संभाला था। यहां उस बातचीत को याद करना श्रेयस्कर होगा जो एक दोपहर भोज पर ब्रिटेन के प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख के साथ हुई थी। उस वक्त मुख्य धारा की बहस यही थी कि राज्य सत्ता मानवाधिकारों का हनन करती है जबकि व्यक्ति आमतौर पर सत्ता की ताकत और उसके दमन के समक्ष असहाय और संवेदनशील होता है। लंदन में मेरा सामना तीन वर्ष तक इस बहस से हो चुका था और अब मेरी बारी थी कि मैं बहस का मुद्दा तय करूं। मैंने इस पूरी बहस के दोहरेपन पर ध्यान केंद्रित किया। जो आतंकवाद का शिकार नहीं है और उससे जूझ नहीं रहा है उसके लिए इस विषय पर उपदेश देना बहुत आसान है। यही वजह है कि हमारी बातचीत बहुत सुखद नहीं रही। मैंने उनसे कहा कि हमारे पश्चिमी पड़ोसी मुल्क की ओर से प्रायोजित आतंकवाद से आंखे मूंद लेने, आतंकियों के विभिन्न धड़ों को सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराने और ब्रिटेन  की लोकतांत्रिक आजादी का फायदा उठाने की कोशिशें आखिरकार उसे भी संकट में डालेंगी। मैंने बताया कि कैसे बर्मिंघम में सन 1984 में एक भारतीय राजनयिक रवींद्र म्हात्रे की हत्या कर दी गई थी।
 
किसी भी देश के इतिहास में 15 वर्ष काफी लंबा समय होता है। इस अवधि में बहस का रुख भी काफी हद तक बदल जाता है। अल कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन कुछ देशों के समर्थन और सहयोग से ही बचे हुए हैं और फल-फूल रहे हैं। पश्चिमी देशों की सरकारों ने फारस की खाड़ी में कई सुन्नी मुल्कों की उन कोशिशों को प्रोत्साहित किया है जो सीरिया में बशर अल असद की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए तमाम आतंकी संगठनों का सहयोग कर रहे हैं और उनको वित्तीय मदद मुहैया करा रहे हैं।
 
सीरिया जिस गृहयुद्घ में उलझा हुआ है वह एक तरह का छाया युद्घ भी है जिसमें रूस और ईरान खुलकर असद की मदद कर रहे हैं। इसके साथ ही वह एक पंथ आधारित युद्घ भी है जिसमें एक ओर बशर अल असद हैं तो दूसरी ओर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और अन्य सुन्नी राष्ट्र जो असद को हटाने के लिए भरपूर आर्थिक और सैन्य मदद मुहैया कराने को तत्पर हैं।
 
लेकिन इस लड़ाई में कोई भी मासूम नहीं है। असद भी युद्घ अपराधों के उतने ही दोषी हैं जितने कि उनके खिलाफ खड़े आतंकी संगठन। ये वही संगठन हैं जिन्हें  सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का समर्थन हासिल है। हां, यह सच है कि कतर मुस्लिम ब्रदरहुड को वित्तीय मदद मुहैया कराता रहा है। यह बात सर्वज्ञात है कि मुस्लिम ब्रदरहुड मिस्र और सऊदी अरब को अस्थिर करने का प्रयास कर रहा है। 
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का यह कहना सही नहीं है कि कतर ही सारी समस्याओं की जड़ है। अमेरिका खुद सऊदी अरब के रुख का मददगार है। लेकिन खुद सऊदी अरब भी वहाबी सलाफी विचारधारा का केंद्र बना हुआ है। यह विचारधारा न केवल अरब बल्कि एशिया और यूरोप समेत दुनिया भर में उदार मुस्लिमों को कट्टïर बनाने का काम कर रही है। 
 
ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के साथ गठजोड़ कायम करना न केवल अदूरदर्शी कदम है बल्कि यह सीरिया के पंथ आधारित युद्घ में पक्षधरता को भी प्रदर्शित करता है। बल्कि यह एक व्यापक पंथ आधारित संघर्ष में अमेरिकी हस्तक्षेप है जिससे उसे कुछ खास हासिल नहीं होने वाला है। 
 
सऊदी अरब अपेक्षाकृत अस्थिर ट्रंप प्रशासन पर अपना दबाव बनाने में कामयाब रहा है। इससे न केवल इस पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी बल्कि पश्चिम एशिया और अधिक खतरनाक होता जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की अमेरिका यात्रा के दौरान 110 अरब डॉलर के जो हथियार के सौदे हुए वे इसी सोच को प्रदर्शित करते हैं। 
 
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अभी भी पक्षपात नजर आता है। हमारा पश्चिमी पड़ोसी देश उन समूहों को प्रोत्साहित करता है जो भारत के लिए समस्याएं खड़ी करना चाहते हैं। इसके साथ-साथ वह हक्कानी नेटवर्क पर लगाम लगाने का दिखावा भी करता है। इस प्रक्रिया में उसका सामना हिलेरी क्लिंटन की उस उक्ति से हो गया जिसमें उन्होंने कहा था कि आप अपने घर के पिछवाड़े सांप नहीं पाल सकते और उनसे यह उम्मीद भी नहीं कर सकते कि वे आपको काटेंगे नहीं। 
 
अल कायदा, इस्लामिक स्टेट अथवा दाएश मौजूदा खामियों और विभिन्न देशों के रुख में मौजूद विरोधाभास का फायदा उठाना जारी रखेंगे। तुर्की कुर्द समुदाय पर हमलावर रुख जारी रखेगा जबकि अन्य स्थानों पर कुर्द इस्लामिक स्टेट से लडऩे का काम बखूबी कर रहे हैं। 
 
दुनिया के तमाम देशों को बिना किसी अपवाद के आतंकवाद का समर्थन बंद करना चाहिए। समस्या की असल जड़ वह भावना है जिसके तहत एक आतंकी किसी और के लिए स्वतंत्रता सेनानी हो जाता है। कतर बहुत छोटा मुल्क है और उसकी आबादी भी सऊदी अरब की तुलना में बहुत कम है लेकिन क्षेत्र के देशों को अस्थिर करने के लिए उसके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं। संसाधनों के मामले में ईरान भी कोई पीछे नहीं है। हालांकि उस पर तमाम पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध भी थोपे। उधर, अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले नए सुन्नी नाटो के बीच का गठजोड़ भी अपरिपक्व नजर आता है। ये तमाम तरकीबें और गड़बडिय़ों और संकटों को जन्म देंगी। इनकी वजह से ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होंगी जिनका कुछ अन्य देश फायदा उठा सकेंगे। क्या इस दिशा में आगे बढऩा चाहिए? अगर ऐसा होता है तो इराक, लीबिया और सीरिया में समस्या और अधिक कठिन होती जाएगी। 
Keyword: terror, वैश्विक आतंकवाद,
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