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नए कलेवर में दिखेगा दिल्ली के प्रगति मैदान का तेवर

ज्योति मुकुल /  06 18, 2017

मैदान की गति-प्रगति

हॉल ऑफ नेशंस और अन्य इमारतों की जगह नई इमारतें बनाई जा रही हैं। आईटीपीओ के सामने प्रगति मैदान के कायाकल्प का काम समय पर पूरा करने की है चुनौती
पुनर्विकास परियोजना का अहम मकसद एक ऐसी जगह बनाना है, जहां भारत बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों और सम्मेलनों का आयोजन कर सके
प्रगति मैदान में मौजूद जो इमारतें ढहाई जा रही हैं, उनका निर्माण 1970, 1980 और 1990 के दशक में हुआ था

जब आप प्रगति मैदान के बारे में सोचते हैं तो जेहन में हॉल ऑफ नेशंस की तस्वीर उभरकर सामने आती है। लेकिन वहां 40 साल से खड़ी यह इमारत और कुछ अन्य इमारतें इतिहास के पन्नों में सिमट गई हैं। इन्हें ढहाने की एक मुख्य वजह यह थी कि इनमें से ज्यादातर इमारत वातानुकूलन के लिए उपयुक्त नहीं थीं। इसके अलावा प्रगति मैदान के मालिक इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) का कहना है कि उनमें से ज्यादातर जर्जर भी हो गई थीं।

भले ही इसके कई कारण हों, लेकिन हॉल ऑफ नेशंस के शिल्पकार राज रेवाल कहते हैं कि इस इमारत को ढहाना ठीक उसी तरह है, जिस तरह अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध को नष्ट करना। उनका आरोप है कि आईटीपीओ देश के आधुनिक शिल्पकारी इतिहास के एक आवश्यक हिस्से को मिटा रहा है। कुल लोग इसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार द्वारा कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की निशानियों को मिटाने की कोशिश के रूप में देखते हैं। इन इमारतों को ढहाने का काम 15 जून तक निर्धारित किया गया था, जिनमें 10 हॉल, 23 राज्य एवं 4 केंद्र सरकार के पविलियन को गिराना भी शामिल है। आईटीपीओ के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एलसी गुप्ता कहते हैं, 'इसमें (कांग्रेस के इतिहास को मिटाना) सत्यता का लेशमात्र भी नहीं है। मैं इस भावुकता का सम्मान करता हूं, लेकिन मैं कुछ नया बनाकर आधुनिक शिल्पकारी और डिजाइन शामिल कर रहा हूं, जिससे दिल्ली की शान और बढ़ेगी।'

बढ़ेगी चमक

इमारतों को ढहाया जाना प्रगति मैदान के व्यापक पुनर्विकास का शुरुआती कदम है। प्रगति मैदान दिल्ली के बीचोबीच 123 एकड़ में फैला हुआ है। गुप्ता ने कहा, 'जो इमारते ढहाई जा रही हैं, उनका निर्माण 1970, 1980 और 1990 के दशक में हुआ था। उनमें 1,000 से 1,500 लोगों के बैठने की कुल क्षमता है और पार्किंग के लिए जगह 400 से 500 कारों की है। ये सुविधाएं जरूरत से बहुत कम हैं और इनमें सुधार काफी लंबे समय से लंबित है।' उन्होंने कहा कि प्रदर्शनी उद्योग हर साल 17 से 18 फीसदी की दर से बढ़ रहा है, लिहाजा अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की मेजबानी के लिए बुनियादी ढांचा खड़ा करने की जरूरत है।

यहां सात नए हॉल बनाए जाएंगे, जिनमें कुल जगह 1.46 लाख वर्ग मीटर होगी। इन नए हॉल में प्रदर्शनी, खाद्य एवं पेय और कार्यक्रम से पूर्व के आयोजनों के लिए जगह होगी। इन हॉल में चार पास-पास होंगे, जिनमें दो मंजिलों में प्रत्येक में 25,000 वर्ग मीटर जगह होगी।  शेष तीन हॉल में 50,000 वर्ग मीटर जगह उपलब्ध होगी। गोयल कहते हैं, 'ये हॉल लघु, मध्यम और बड़ी प्रदर्शनी के लिए बनाए गए हैं।'

इसके अलावा प्रदर्शनी के लिए 50 एकड़ स्थान खुला होगा। दूसरे चरण में हॉल नंबर 7 से 12 (ए) तक का निर्माण होगा , जिसमें 22,000 वर्ग मीटर जगह होगी। इन हॉलों को मेट्रो से जोडऩे के लिए एक स्काईवॉक का निर्माण होगा। इस कॉम्प्लेक्स में देखने वाली चीज 50,000 वर्ग मीटर में फैला कन्वेंशन सेंटर होगा, जिसमें 7,000 लोगों के बैठने की जरूरत होगी। यह विज्ञान भवन से करीब पांच गुना अधिक है। इसके पास 1.66 लाख वर्ग मीटर की बेसमेंट पार्किंग होगी, जो 4,800 वाहनों के लिए पर्याप्त होगी। 

आईटीपीओ ने जल्द कन्वेंशन सेंटर का अवधारणा मॉडल जल्द ही जारी करने की योजना बनाई है।  प्रगति मैदान के इस पुनर्विकास का एक आवश्यक हिस्सा एक भूमिगत मार्ग होगा, जो भूमिगत पार्किंग से होकर गुजरेगा। यह सुरंग मथुरा रोड से शुरू होगी और प्रगति मैदान कॉम्प्लेक्स के नीचे से होते हुए रिंग रोड पर निकलेगी। इस पर 800 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, लेकिन शहरी विकास मंत्रालय एक वर्तमान योजना के तहत इसका अलग से वित्त पोषण करेगा।  यह योजना मेले के दौरान यातायात को कम करने के लिए बनाई गई है। इसका काम कॉम्प्लेक्स के पुनर्विकास के काम के साथ ही होगा। 

हालांकि प्रगति मैदान को फिर से विकसित करने की योजना पहली बार 2012 में बनाई गई थी, लेकिन इस साल जनवरी में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की स्वीकृति के बाद काम तेजी पकड़ पाया है। अब इस परियोजना की प्रबंधन सलाहकार नैशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन ने निर्माण के प्रस्तावों के लिए वैश्विक बोलियां आमंत्रित की हैं। इस महीने तक वेंडर मिलने के आसार हैं।

कन्वेंशन सेंटर का काम दिसंबर 2018 तक और पूरे कॉम्प्लेक्स का काम जुलाई-अगस्त 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यह डेडलाइन काफी महत्त्वाकांक्षी लगती है, लेकिन सभी मंजूरियां मिली होने की वजह से गोयल को भरोसा है कि वे इस लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब रहेंगे। इसकी ले-आउट योजना नई दिल्ली की आर्किटेक्ट्स इन को-पार्टनरशिप (अरकोप) और ऐडास द्वारा बनाई गई है। दिल्ली हवाई अड्डे पर टर्मिनल 3 और गुरुग्राम में मेदांता हॉस्पिटल जैसी परियोजनाओं का श्रेय अरकोप को जाता है। 

योजना की लागत

समन्वित प्रदर्शनी एवं कन्वेंशन सेंटर के पूरे पहले चरण की लागत 2,254 करोड़ रुपये अनुमानित है। इसमें यातायात का दबाव कम करने के लिए 800 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जाने वाले भूमिगत रास्ते की लागत शामिल नहीं है। हालांकि इस परियोजना के लिए कोई सरकार की तरफ से कोई धन नहीं मुहैया कराया जाएगा। गुप्ता के मुताबिक आईटीपीओ इसके पुनर्विकास के लिए अपने करीब 1,200 करोड़ रुपये के कोष का इस्तेमाल करेगा। इसके अलावा उसने 3.7 एकड़ जमीन बेचने की योजना बनाई है, जिस पर एक होटल बनाए जाने की योजना है। 

इसके लिए आईटीपीओ जल्द ही मंत्रिमंडल की मंजूरी लेगा। मंत्रिमंडल इसे फ्री-होल्ड आधार पर बेचने या स्थायी आधार पर जमीन देने की मंजूरी देगा। जिस भूखंड पर संभावित होटल बनना है, वह कॉम्प्लेक्स के कोने में हैं। इस भूखंड में प्रवेश और निकासी भैरों मार्ग से होती है। गुप्ता कहते हैं,'इस भूखंड की नीलामी होगी और इसके जरिये जुटाए जाने वाले धन का इस्तेमाल पुनर्विकास में किया जाएगा।' मई 2016 में आईटीपीओ ने इस भूखंड का लैंड यूज बदलवाया था ताकि वहां होटल का निर्माण हो सके। 

इस भूखंड को बेचकर जुटाई जाने वाली राशि और आंतरिक कोष का इस्तेमाल करने के बाद शेष राशि ऋण के रूप में जुटाई जाएगी, जिस पर सरकार की गारंटी होगी। इस समय आईटीपीओ को हर साल करीब 80 करोड़ रुपये की कमाई होती है। इसे उम्मीद है कि नए सेंटर के बाद उसके राजस्व में इजाफा होगा और इस आने वाले पैसे का इस्तेमाल ऋण के भुगतान में किया जाएगा।

गुप्ता का अनुमान है कि इस कर्ज को लौटाने की अवधि सात से नौ वर्ष होगी। आईटीपीओ ने योजना बनाई है कि परियोजना तैयार होने से पहले मार्केटिंग की जाएगी ताकि शुरुआत से ही अच्छा कारोबार पैदा किया जा सके। भले ही पुनर्विकास का काम चल रहा हो, लेकिन आईटीपीओ ने अपने मुख्य आयोजन इंडिया इंटरनैशनल ट्रेड फेयर को जारी रखने की योजना बनाई है। हालांकि इसका आकार छोटा होगा। राज्य पविलियनों को ढहाया जा रहा है, इसलिए उन्हें अस्थायी जगह मुहैया कराई जाएगी।

प्रदर्शनी स्थल के पुनर्विकास का काम पूरा होने के बाद राज्यों को उन्हीं नियम एवं शर्तों पर वही जगह मुहैया कराई जाएगी। गोयल का कहना है कि पुनर्विकास परियोजना का अहम मकसद एक ऐसी जगह बनाना है, जहां भारत बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों और सम्मेलनों का आयोजन कर सके। ऐसा ही एक कार्यक्रम जिस पर भारत की नजर है, वह 2019 में होने वाला जी20 सम्मेलन है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो पुनर्विकास परियोजना से शहर को एक नया नायाब तोहफा मिल सकता है।

Keyword: हॉल ऑफ नेशंस, इमारत, आईटीपीओ, प्रगति मैदान, परियोजना, अंतरराष्ट्रीय, कार्यक्रम, सम्मेलन,
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