बिजनेस स्टैंडर्ड - व्यापार गोष्ठी : किसानों की समस्याओं का क्या है स्थायी निदान?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, November 24, 2017 07:34 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

व्यापार गोष्ठी : किसानों की समस्याओं का क्या है स्थायी निदान?

पाठकों की राय /  06 18, 2017

कारगर नीति की दरकार, तभी फलेंगे किसान
सही नीति से ही होगा निदान
समय-समय पर किसानों की कर्ज माफी की वकालत की गई है और कई मौकों पर किसानों का कर्ज माफ  भी किया गया है। आजादी के इतने सालों बाद भी ऐसी स्थिति क्यों बनी हुई है कि किसान कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं। मध्य प्रदेश की घटना से शुरू हुए शोर-शराबे के बाद किसानों का कर्ज माफ  कर देना इस ज्वलंत समस्या का सटीक समाधान है। जवाब होगा बिल्कुल नहीं। सरकार और कृषि मंत्रालय को ऐसी नीति और योजना बनानी पड़ेगी, जिससे किसान कर्ज के दलदल में फंसे ही नहीं।

शंकर जालान
कोलकाता, पश्चिम बंगाल


छोटे-बड़े किसान पर आधारित हो नीति
किसान परिवार खेती से अपना खर्च नहीं चला पाते हैं। उपज मंडी तक पहुंचने पर वित्तीय रूप से व्यावहारिक नहीं रह जाती क्योंकि 60 फीसदी छोटे किसान मोटे ब्याज पर साहूकारों से कर्ज लेकर खेती करते हैं। यहां पर सरकार को छोटे-बड़े किसानों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी होगी। सामाजिक योजनाओं, पेंशन योजना, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य योजनाओं से तेजी से इन्हें जोडऩा होगा। नेताओं को कर्ज माफ ी जैसी लोकलुभावन घोषणाओं के बजाय सिंचाई, बिजली, खेती की नई तकनीक, उन्नत बीज और समय पर मौसम की सही जानकारी किसानों तक पहुंचानी चाहिए। ई-मंडी सफ ल बनाने का प्रयास भी हो।
नीलेश तिवारी
रीवा, मध्य प्रदेश

 

छोटे स्तर पर कृषि बाजार देंगे राहत
किसानों की समस्या पहले की तरह अनाज की कमी की वजह से नहीं, बल्कि बाजार में उतार-चढ़ाव की वजह से है। जीएम बीजों से अनाज पैदावार में दुनिया भर में भारी उछाल आई है, जिससे बाजार में कीमतें घट रही है। इसका असर भारत पर भी हो रहा है। इन कारणों से बचने के लिए हमारे सामने रक्षा कवच नहीं है। इसलिए सरकार को खुद किसानों के नेतृत्व में छोटे-छोटे स्तरों पर कृषि बाजार की स्थापना करनी होगी, जहां किसानों की उपज को लागत से अधिक उचित मूल्यों पर खरीदने की व्यवस्था हो और वहां से बाजार के लिए कृषि उत्पादों के दाम तय होने चाहिए।
अभिनव कुमार
कोलकाता, पश्चिम बंगाल

 

कृषि संग आय के अन्य उपाय भी करें
भारत में किसान की हालत के लिए मॉनसून भी जिम्मेदार है और पारंपरिक सोच भी। किसान को बाजार व उद्योग की मांग के अनुरूप ही फ सल बोनी चाहिए। बैंक से मिले कर्ज को वह कहीं और खर्च कर देता है। किसान को नई वैज्ञानिक पद्घतियों की जानकारी तो देनी ही चाहिए, मुर्गी पालन, बकरी पालन, मधुमक्खी पालन, सुअर पालन, गाय-भैंस पालन भी सिखाना चाहिए ताकि उसे आय के वैकल्पिक साधन भी मिलें। औषधीय पौधों, फ लों वृक्ष व खाली पडी जमीन पर वृक्षारोपण से भी वह अपनी आय को बढ़ा सकता है। उसे गांवों में ही कुटीर या छोटे उद्योग लगाने को प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए। किसान को बैंक ऋण की बैसाखी के बजाय आत्मनिर्भर बनाया जाए।
डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल
मुजफ्फ रनगर, उत्तर प्रदेश


लाभकारी मूल्य ही स्थायी निदान
सरकार को पशुधन व वृक्षारोपण के निष्पादन कानूनों का सरलीकरण किसान की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाए। किसानों को उनकी उपज के उत्पादन की लागत में लाभ जोड़कर सरकार स्वयं उपज की खरीद करे। किसान की लागत से भी कम दाम पर खाद्यान्न व जिंस सरकार द्वारा खरीद कर और सस्ते दामों पर जनता को बेची जाएं।  प्रत्येक ग्राम सभा में किसान गुणवत्ता संस्थाएं खोली जाएं, जहां किसानों की समस्याओं का निदान हो। इसके लिए तकनीकी, आर्थिक व प्रशासनिक सहयोग इन संस्थाओं की संस्तुति के अनुसार सरकार द्वारा किया जाए।
मिर्जा तस्नीम बेग
रायबरेली, उत्तर प्रदेश


ईमानदारी से लागू हों योजनाएं
किसानों का ब्याज माफ करना, सब्सिडी देना, पूरा पानी उपलब्ध कराना, बिजली देना , सरकार द्वारा फसल की खरीद, मौसम की मार पर जांच कर उचित मुआवजा आदि अनेक ऐसे कार्य हैं जिन्हें यदि ईमानदारी से किया जाए तो न केवल किसानों की समस्याएं दूर हो सकती हैं, बल्कि ये समस्याएं भविष्य में पैदा ही नहीं होगी। अभी किसान आंदोलित हैं और इसे विपक्ष मुद्दा बना रहा है। किसानों के हित में पक्ष व विपक्ष दोनों को बातचीत के माध्यम से ऐसे समाधान निकालने जिससे समस्याओं को स्थायी हल हो सके।
प्रदीप माथुर
अलवर, राजस्थान


उपज का उचित मूल्य ही स्थायी हल
कर्ज माफी किसानों की समस्या का स्थायी समाधान बिल्कुल नहीं है। कर्ज माफ ी से किसान आज तो खुश होंगे, लेकिन कल उनकी स्थिति फिर पहले जैसी हो जाएगी। उनकी समस्याएं तब हल होंगी, जब उन्हें उपज का सही मूल्य मिलेगा। केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को बातचीत से इसका हल करना चाहिए और इसमें किसानों को भी साथ देना होगा। उन्हें खेती में लगने वाली सामग्री की लागत काबू में रखकर कृषि उपज की वाजिब कीमतें सुनिश्चित करनी होंगी।
दुर्गेश यादव
बैतूल, मध्य प्रदेश


मजबूत कृषि नीति की दरकार
किसानों की समस्याओं के स्थायी समाधान की कोशिश कोई नहीं कर रहा - न सरकार, न समाज और न ही किसान नेता। सभी अपनी महत्त्वाकांक्षा के चलते किसानों से राजनीतिक कर रहे हैं। सरकारों, नेताओं और नीति नियंताओं को समझना होगा कि ऋण या ब्याज माफी से किसानों की समस्या बिल्कुल नहीं सुलझेंगी। यह केवल फौरी समाधन है, दीर्घकालिक नहीं। इसलिए सरकारों को देर किए बगैर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत कृषि नीति तथा कृषि बजट लाने पर काम करना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं, जब देश में न किसान होगा और न खेती।
महेंद्र सिंह
गुरुग्राम, हरियाणा


कृषि को उद्योग से जोड़ने की जरूरत
साहूकार से कर्ज लेने, वैज्ञानिक खेती का अभाव होने, मंडी पर निर्भर होने और सामाजिक-आर्थिक बाधाओं के कारण किसानों की स्थिति बहुत कमजोर होती जा रही है। ऐसे में कृषि  उत्पाद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के बीच तालमेल से ग्रामीण बेरोजगारी भी दूर की जा सकती है। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए वहां के स्थानीय उत्पाद को ध्यान में रखते हुए लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना भी की जानी चाहिए। कृषि उत्पादों के बेहतर रखरखाव के लिए  शीतगृह और गोदाम बनाने के लिए रियायती ब्याज देने की जरूरत है। सरकार को भी बुनियादी ढांचा बढ़ाना चाहिए ताकि छोटे किसानों को फायदा मिले।
सुमित्रा देवी
बेगूसराय, बिहार


आयोग की सिफारिशें लागू हों

मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसान आंदोलन कारण कर्ज माफी और फ सल का उचित दाम नहीं मिलना ही है। सरकार को उपवास और राजनीति छोड़कर प्राथमिकता के साथ किसानों की समस्याओं का तुरंत निदान करना चाहिए और खजाने का खयाल रखते हुए उन्हें राहत देनी चाहिए। देश की जनसंख्या बढऩे के साथ ही कृषि क्षेत्र में बेरोजगारी भी बढ़ रही है। अब समय आ गया है कि वर्ष 2004 में बनी स्वामीनाथन आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों को लागू कर देना चाहिए, जिससे किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान हो सकें।
मृत्युंजय  कुमार
दिल्ली


किसानों को सुविधाएं मिले
कृषि में आवश्यकता से अधिक लोग काम कर रहे हैं। अगर कुछ लोगों को गैर कृषि कार्यों में लगाया जाए तो रोजगार उत्पन्न होंगे। जैविक खाद पर सब्सिडी मिले, सरकार किसानों को सस्ते सिंचाई उपकरण दे और मंडी तक माल पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था भी अच्छी रहे। तरह-तरह का बीमा देना भी आवश्यक है। नकली और खराब बीजों को बाजार में नहीं आने दिया जाए, कृषि महाविद्यालयों के छात्रों को कुछ समय गांवों में काम करने के लिए कहा जाए और नीति आयोग में कृषि विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।
निखिल शर्मा
जयपुर, राजस्थान


नए सिरे से करनी होगी कारगर पहल
अन्नदाता फसल के वाजिब दाम और कर्ज माफी को लेकर गोलियां खा रहा है, खुदकुशी कर रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक किसानों की खुदकुशी की घटनाएं 42 फीसदी तक बढ़ी हैं। उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। भारत की 64.44 फीसदी आबादी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है तो उसकी उपेक्षा क्यों की जा रही है। यदि मोदी सरकार बड़े पूंजीपतियों और कर्ज नहीं चुकाने वालों के कर्ज माफ कर देती है तो किसानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों?
डॉ. हर्ष वर्धन कुमार
पटना, बिहार


किसानों को मिले उचित मूल्य
कृषि प्रधान भारत में किसानों की समस्या सरकार गठन से लेकर आज तक कम होने के बजाय बढ़ी हैं। किसान की अच्छी फ सल ही नहीं होगी तो देश में खाद्यान्न संकट उत्पन्न होगा। फ सल कम होती है तो बाजारों में जमाखोर सक्रिय हो जाते हैं और सरकार को आयात करना पड़ता है। किसानों की हालत सुधारने के लिए उन्हें उपज का अधिक मूल्य मिलना चाहिए और देश के भीतर-बाहर कहीं भी अपना माल बेचने की छूट मिलनी चाहिए। तभी किसान खुशहाल हो सकता है।
दिनेश गुप्ता
पिलखुवा, उत्तर प्रदेश


उन्नत तकनीक व उचित मूल्य जरूरी
कर्ज के मकडज़ाल में उलझे किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं। विभिन्न राज्यों में हिंसक किसान आंदोलन हो रहे हैं। स्थायी समाधान के लिए सरकार को अत्याधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध करानी होगी। किसानों को कर्ज माफी से ज्यादा उन्नत बीज, उर्वरक, सिंचाई और उत्पादन के न्यूनतम समर्थन मूल्य की आवश्यकता है। महाराष्ट्र ज्वलंत उदाहरण है, जहां कुछ साल पहले किसानों की आत्महत्या की दर बहुत अधिक थी। लेकिन बूंद सिंचाई प्रणाली और बहुमंजिला कृषि पद्धति के आविष्कारों ने वहां के किसानों की जिंदगी बदल दी।
सोनाली शर्मा
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


उपज का बेहतर दाम, कर्ज माफी हल
किसानों की ऋ ण इस समस्या के समाधान के लिए सीमांत और लघु किसानों द्वारा किसी राष्ट्रीय बैंक, राज्य की सहकारी समिति या वित्तीय संस्थाओं से लिया गया कर्ज पूरी तरह से माफ किया जाए ताकि किसान नए सिरे से खेती कर सकें। उनकी फसल के लिए स्पष्टï और पारदर्शी न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करना होगा। फसल बीमा के अलावा कृषक जीवन बीमा भी कराया जाए। बफ र स्टॉक की व्यवस्था हो ताकि कृषि उत्पादों के मूल्य एकदम न गिरें।
कविता भटनागर
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश


कोरे आश्वासन नहीं, ठोस उपाय जरूरी
कृषि मॉनसून पर निर्भर है। अच्छी वर्षा हुई तो किसान की फ सल अच्छी और कहीं सूखा पड़ गया तो सब चौपट। सरकारें किसानों की समस्याओं के निदान के लिए विभिन्न प्रयोग ही कर रही हैं, पर तत्काल समाधान किसी के पास नहीं। वातानुकूलित कमरों में बैठकर बनी योजनाओं से कुछ नहीं होगा। खेतों में जाकर, गावों में रहकर और धरती माता के प्रत्यक्ष दर्शन कर ही समस्याएं जानी जा सकेगी  और तभी उनका निदान हो सकेगा।
हरमोहन नीमा
इंदौर, मध्य प्रदेश


पांच सर्वश्रेष्ठ पत्र

मिले लाभकारी मूल्य
अनिल कुमार तोमर
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

उत्पादन ज्यादा हो या प्राकृतिक आपदा में फसल चौपट हो जाए, दोनों सूरतों में किसान को ही नुकसान होता है। इसलिए उनकी समस्याएं दूर करने के लिए पहले खेती की लागत कम करनी होगी और फिर फसल का न्यूनतम मूल्य उसका मुनाफा तय करते हुए निश्चित करना होगा। फसल खराब हो तो किसान को बीमा के जरिये संरक्षण मिले और उत्पादन ज्यादा हो तो ऐसा तंत्र तैयार हो, जिसमें किसान की पूरी उपज लाभकारी मूल्य पर खरीद ली जाए। फिर चाहे उपज का निर्यात किया जाए या गरीबों को सस्ते में बेचा जाए या गरीब देश को मुफ्त में देकर विदेश नीति बेहतर की जाए। लेकिन वह नहीं होना चाहिए, जो सरकार ने दाल के मामले में किया था। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकार बैंक कर्ज, खरीद केंद्र, खाद-बीज बिक्री केंद्र, फसल बीमा व्यवस्था आदि को भ्रष्टाचार से मुक्त रखा जाए।


कृषि आधारित उद्योग जरूरी
डॉ. नीता सिन्हा
पटना, बिहार
किसानों की समस्या इतनी सी है कि फसल उगाने पर वह जितना खर्च करता है, उसे बेचकर उतना कमा नहीं पाता। इसके अलावा खेती पर जितने लोग निर्भर हैं, उनका बोझ खेती नहीं उठास सकती। किसानों की स्थिति सुधारनी है तो सरकार को सर्वप्रथम किसानों और उनके आश्रितों को वैकल्पिक रोजगार कार्यक्रमों से जोडऩा होगा। इसके लिए उन्हें कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाए। खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्योग को चुस्त दुरुस्त बनाया जाए। अधिक उत्पादन हो तो आयात पर रोक लगे। उपज को ऊंचे समर्थन मूल्य पर खरीदकर भंडारण किया जाए। राजनीतिक दबाव में कर्ज माफी समाधान नहीं है। जितनी रकम अब तक कर्ज माफी में गई है, उससे खेती का बुनियादी ढांचा तैयार किया गया होता तो किसानों का उद्घार हो चुका होता। उद्घार कर्ज माफी से नहीं, कर्ज लौटाने योग्य बनाने से होगा।

धरातल पर उतरें योजनाएं
रजनीश कुमार यादव
रायपुर, छत्तीसगढ़
किसानों की समस्याओं से निजात पाने के सरकारी, गैर-सरकारी प्रयास फलीभूत तो हुए हैं, पर कई परियोजनाओं को धरातल पर उतारना बाकी है। ई-नाम, ई-मंडी, ई-मार्केट जैसे कई पोर्टल कृषि व्यवसाय को विपणन के उचित मंच प्रदान करने के लिए तैयार किए गए हैं। इनका सही और सार्थक प्रयोग हो। कृषि क्षेत्र में तकनीकी उन्नयन, कौशल विकास पर जोर दिया जाए, मृदा संबंधी ज्ञान, कृषि भूमि के उचित प्रयोग एवं पैदावार वृद्धि, भंडारण, सिंचाई, खेती संबंधी ज्ञान को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए। बिचौलियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई के प्रावधान हों और खेती के लिए धन का भरपूर इंतजाम। कर्ज माफी को सही तरीके से लागू किया जाए ताकि जरूरतमंदों को ही लाभ मिले। मृदा संरक्षण व जैविक खेती संबंधी बातों पर जोर दिया जाए तो कई समस्याओं से निजात पाई जा सकती है।

उचित एमएसपी जरूरी
प्रकाश सुथार
श्रीगंगानागर, राजस्थान

कर्ज माफी फौरी राहत ही है। सरकार को किसानों की दशा सुधारने के लिए पूरे देश में जल विकास की योजना पर काम करना चाहिए क्योंकि 50 फीसदी से अधिक खेती योग्य भूमि पर सिंचाई की सुविधा नहीं है। इसके अलावा पौष्टिïक मोटे अनाजों की खेती को उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के जरिये प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। फसलों को प्राकृतिक आपदाओं, कीड़ों और रोगों से बचाने के लिए बीमा तंत्र मजबूत किया जाए। महंगे रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक खाद इस्तेमाल कर उनकी किस्में सुधारी जाएं। पारिस्थिति के अनुकूल खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाए। सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में शीतलन केंद्रों की स्थापना एवं कृषि प्रसंस्करण के बुनियादी ढांचे में निवेश को प्रोत्साहन देना चाहिए। ऋ ण वापसी के प्रति प्रोत्साहित करने हेतु ऐसे किसानों को बेहद कम ब्याज दरों पर ऋ ण प्रदान किया जाए।

पुरस्कृत पत्र

व्यावसायिकता और सहकारिता बढ़े
अभीष्ट देव पाण्डेय
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए उन्हें खेती की सामग्री और आधारभूत सुविधाएं उचित मूल्य पर दी जाएं। उसके बाद कृषि उत्पादन की समूची प्रक्रिया में सस्ती और सुगम तकनीक के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए क्योंकि खेती में मजदूर आसानी से मिल नहीं रहे हैं और भारी भरकम मशीनों ने खेती को खर्चीला बना दिया है। उचित मूल्य पर उपज बिके और किसानों को मजबूरी में औने-पौने दाम पर बिक्री नहीं करनी पड़े, इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से ही काम नहीं चलेगा। बेहतर होगा कि किसान खुद ही सहकारी समितियों या स्वयं सहायता समूहों का प्रयोग करें। अकसर यह भी देखा गया है कि किसान कर्ज लेकर उनका प्रयोग गैर कृषि कार्यों में कर लेते हैं और बाद में कर्ज माफी की अपेक्षा करते हैं। इसे रोककर फसल बीमा योजना को अनिवार्य किया जाए

बकौल विश्लेषक
एपीएमसी सुधार, कृषि ढांचे पर निवेश जरूरी

सिराज हुसैन

सेवानिवृत्त कृषि सचिव (भारत सरकार)

हरित क्रांति के बाद भारतीय किसानों ने कुछ इलाकों में बारिश पर पूरी निर्भरता, मिट्टी क्षरण और प्रतिबंधित बाजार से उपज का लाभकारी मूल्य न मिलने के बावजूद भारतीयों को खाद्य सुरक्षा प्रदान की है। मीडिया खासकर टीवी में महंगाई को लेकर हल्ला मचने के बीच सरकार द्वारा कृषि उत्पाद कारोबार को नियंत्रित रखने और खाद्य प्रसंस्करण पर उच्च कर दरों का भी किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ा है। एनएसएसओ ने वर्ष 2013 की जनवरी-दिसंबर अवधि के सर्वे में पाया कि 19 फीसदी ग्रामीण परिवारों नेे गैर संस्थागत एजेंसी व 17 फीसदी ने संस्थागत ऐजेंसी से कर्ज लिया। शहरी परिवारों के मामले में यह आंकड़ा क्रमश: 15 व 10 फीसदी रहा। इस तरह विभिन्न सरकारों द्वारा घोषित कृषि कर्ज माफी का लाभ गैर संस्थागत एजेंसी से कर्ज लेने वालों को नहीं मिलेगा। छोटे व सीमांत व अनौपचारिक रूप में पट्टïे पर भूमि लेने वाले भूमिहीन मजदूरों को भी कर्जमाफी से फायदा नहीं मिलता है। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकारों के सामने असली चुनौती बड़ी संख्या में ऐसे गरीब किसानों को फायदा पहुंचाने की है, जो कर्ज नेटवर्क से बाहर हैं और जिन्हें कर्जमाफी का लाभ नहीं मिलता है। गेहूं व धान किसानों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिल जाता है। लेकिन दूसरी कृषि उपज (गन्ना, कपास को छोड़कर) पैदा करने वाले खासकर सब्जी किसान इसे बेचने के लिए कृषि उपज विपणन समिति की कृपा पर निर्भर है। यदि सरकार वास्तव में छोटे व सीमांत किसानों की मदद करना चाहती है तो उसे एपीएमसी नियमों में वास्तविक सुधारों पर तेजी से काम कर ताजा उपजों के लिए बुनियादी ढांचे में बड़ा निवेश करना होगा। बीते 10 वर्षों में केंद्र सरकार ने साबित किया है कि सही नीति से निजी क्षेत्र ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश करने के लिए आगे आ सकता है। निजी उद्यमिता गारंटी योजना (पीईजी) के तहत भारतीय खाद्य निगम व राज्य एजेंसियों ने 136 लाख टन भंडारण क्षमता विकसित हुई। सरकार इसी तरह का बुनियादी ढांचा जल्द खराब होने वाली कृषि उपज क्षेत्र में बनाकर किसानों को बेहतर दाम दिलाने में मदद कर सकती है। क्या सरकार इस क्षेत्र में भी बड़े निवेश को तैयार है?  बातचीत : रामवीर सिंह गुर्जर

उपज का लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य स्थायी हल

शिव कुमार शर्मा 'कक्का जी'

राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ

किसानों की असल समस्या उन्हें उपज का उचित मूल्य नहीं मिलना है। कई बार किसानों को उसकी उपज की लागत से कम मूल्य मिलता है। जब किसान की लागत ही नहीं निकलेगी तो वह खेती कै से कर सकता है? किसान खान-पान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बच्चों की शादी समेत अन्य खर्चों के लिए खेती पर ही निर्भर है। ऐसे में किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान सिर्फ उसे उसकी उपज का उचित मूल्य मिलने से हो सकता है। उचित मूल्य का मतलब किसानों की लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य। लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य देने का वादा मौजूदा केंद्र सरकार ने किया भी है। सरकार द्वारा किसानों की उपज का उसकी लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य घोषित करने से अकेले काम नहीं चलेगा। इसे दिलवाना भी सुनिश्चित करना होगा। इसके लिए सरकार को किसानों की उपज की सरकारी खरीद की गांरटी की व्यवस्था भी करनी चाहिए। नियम तो है किसानों की उपज समर्थन मूल्य से नीचे नहीं बिकनी चाहिए। लेकिन सरकारों के कमजोर होने से किसानों की उपज समर्थन मूल्य से नीचे बिक रही है। समर्थन मूल्य पर उपज की खरीद केवल गेहूं, चावल धान की ही न तो सभी उपजों की होनी चाहिए। सरकारों के निकम्मेपन से उपज का लाभकारी मूल्य न मिलने से किसान कर्जदार हुए है। इसलिए सरकार को एक बार किसानों को ऋणमुक्त करना चाहिए। सरकार द्वारा किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना सुनिश्चित करने के बाद आगे उनके लिए ऋण मुक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। कुल मिलाकर किसानों की समस्याओं का एक मात्र स्थायी हल उनकी उपज की लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य दिलाने के साथ उपज की सरकारी खरीद की गारंटी सुनिश्चित करना है।  बातचीत : रामवीर सिंह गुर्जर

Keyword: गोष्‍ठी, किसान, कृषि,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या उमंग से मिलेगा डिजिटल भुगतान को बढ़ावा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.