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तटस्थ मध्यस्थ की नियुक्ति से ही खुलेगी निष्पक्षता की राह

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  June 18, 2017

उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मुद्दे पर चल रही खींचतान से जहां न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं मध्यस्थता के क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए चल रहा संघर्ष उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। सरकार, सार्वजनिक उद्यम और उनकी सहयोगी कंपनियां देश में ठेके देने के सबसे बड़े स्रोत हैं। बड़ी परियोजनाओं के निर्माण का ठेका निजी फर्मों को देने का अधिकार होने से सरकार और उपक्रमों को अनुबंध में बेहतर स्थिति हासिल होती है। अक्सर इनकी तरफ से निजी फर्मों को जिस अनुबंध की पेशकश की जाती है उसमें एकतरफा प्रावधान होते हैं। इनमें सबसे ज्यादा विवाद सरकार या उपक्रमों के ही शीर्ष अधिकारियों या उससे संबंधित व्यक्तियों को मध्यस्थ नियुक्त करने को लेकर खड़ा होता है। 

 
उच्चतम न्यायालय ने अतीत के अपने कई फैसलों में उपक्रमों की इस प्रवृत्ति की आलोचना की है और उन्हें विरोधी पक्ष के लिए भी बराबरी का मौका देने को कहा है। हालांकि न्यायालय की इन टिप्पणियों को काफी हद तक नजरअंदाज ही किया जाता रहा है। इस समस्या को दूर करने के लिए विधि आयोग की 246वीं रिपोर्ट की अनुशंसाओं के अनुरूप मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम को दो साल पहले संशोधित किया गया था। इस असमानता को खत्म करने के लिए मध्यस्थों के चयन और उनकी निर्योग्यताओं के संबंध में दिशानिर्देश भी जारी किए गए थे। लेकिन उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कुछ हालिया फैसलों से पता चलता है कि सार्वजनिक उपक्रम अब भी मध्यस्थता पर कायम अपना वर्चस्व छोडऩे के लिए नहीं तैयार हैं। ये सरकारी कंपनियां अपने ही मामलों में खुद को न्यायाधीश की भूमिका में बनाए रखना चाहती हैं।
 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एफकॉन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम रेल विकास निगम लिमिटेड मामले में मध्यस्थों की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता के मुद्दे पर विचार किया था। कोलकाता में रेल निगम के लिए एक पुल बनाने को लेकर विवाद हो गया था। निजी निर्माण कंपनी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की लेकिन रेल निगम अपने ही पैनल के पांच लोगों में से किसी एक को मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग पर अड़ा रहा। खास बात यह है कि मध्यस्थों के पैनल में शामिल सभी लोग रेलवे के ही पूर्व अधिकारी थे। रेल निगम का दावा था कि निर्माण कंपनी मध्यस्थता की इस शर्त पर अनुबंध में सहमति जता चुकी थी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मध्यस्थता प्रक्रिया में चुनिंदा नाम होने से मध्यस्थता पर भरोसे में कमी आने की आशंका है लिहाजा उसने अनुबंध में तय मध्यस्थता प्रावधान को बाध्यकारी न माना। इसके साथ ही उसने एफकॉन्स को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को अपना मध्यस्थ नामित करने की इजाजत दे दी।
 
उच्च न्यायालय अपने इस फैसले में इसी साल उच्चतम न्यायालय की तरफ से वोस्तेल्पाइन शिनेन बनाम दिल्ली मेट्रो रेल निगम मामले में सुनाए गए फैसले की राह पर ही चला है। जर्मनी की कंपनी वोस्तेल्पाइन ने विवाद निपटाने के लिए जब मध्यस्थता की मांग की तो दिल्ली मेट्रो की तरफ से एक सूची उसे सौंपी गई जिसमें शामिल सभी लोग सरकारी विभागों या उपक्रमों के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश थे। विदेशी कंपनी ने इसे हितों के टकराव का मामला बताते हुए उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्माण कंपनी के एतराज को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसे मान लेने पर मध्यस्थता के लिए उपलब्ध लोगों की संख्या काफी कम हो जाएगी। हालांकि उसने दिल्ली मेट्रो को भी मध्यस्थता के लिए सुझाए गए लोगों की सूची में कुछ और नाम शामिल करने को कहा था।
 
मध्यस्थता अधिनियम में संशोधन के बाद मध्यस्थों के चयन को लेकर कई मापदंड तय किए गए हैं लेकिन इसके बाद भी उसमें कई मुद्दे अनसुलझे ही रह गए हैं। इसकी वजह यह है कि कोई भी नियम सभी तरह की परिस्थितियों का अंदाजा नहीं लगा सकता है जिसके चलते वकील और न्यायाधीश उसके प्रावधानों की अपने हिसाब से व्याख्या कर सकते हैं। मसलन, उच्च न्यायालयों में सरकारी कंपनियों के पूर्व अधिकारियों को मध्यस्थ नियुक्त किए जाने को लेकर अलग-अलग राय देखी गई है।
 
सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी संदेह से परे नहीं हैं। पिछले महीने दिल्ली उच्च न्यायालय ने गेल इंडिया और एचआरडी कॉर्पोरेशन के बीच विवाद में दो न्यायाधीशों को मध्यस्थ नियुक्त करने पर उठाई गई आपत्ति को खारिज कर दिया था। अमेरिकी कंपनी एचआरडी ने इन दोनों न्यायाधीशों के गेल के साथ संबंध होने का दावा करते हुए उन्हें मध्यस्थता के अनुपयुक्त बताया था। उनमें से एक न्यायाधीश ने गेल से संबंधित एक मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी लेकिन न्यायालय ने इसे कारोबारी रिश्ता मानने से इनकार करते हुए कहा कि इसे अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता है। दूसरे न्यायाधीश के बारे में एचआरडी की दलील थी कि उसने गेल को किसी अन्य मामले में कानूनी सलाह दी थी। लेकिन न्यायालय ने कहा कि वह न्यायाधीश नियमित अंतराल पर कानूनी सलाह नहीं देते हैं। न्यायालय का कहना था कि अगर किसी कंपनी को लगातार सलाह दी जा रही है तभी उसे कारोबारी संबंध माना जा सकता है। फैसले के मुताबिक, किसी स्वतंत्र सलाहकार से एक मामले में कानूनी सलाह लेने का यह मतलब नहीं है कि उस सलाहकार के साथ कंपनी का संबंध बन गया है। 
 
सरकारी उपक्रमों को अनुबंधित पक्षों का भरोसा कायम करने के लिए अनुबंध के पुराने प्रारूप में बदलाव करने के लिए तैयार होना होगा। केवल नए कानून के अनुरूप शर्तों को तय करना ही काफी नहीं है, उन्हें न्यायपूर्ण और निष्पक्ष भी दिखना चाहिए। मध्यस्थता में होने वाले विलंब की बड़ी वजह मध्यस्थों के चयन को लेकर होने वाला विवाद है। विवादों के निपटान की यह वैकल्पिक प्रणाली भी इस वजह से कारगर नहीं हो पा रही है। इससे दुनिया के अन्य मध्यस्थता केंद्रों की तुलना में भारत पिछड़ता जा रहा है।
Keyword: supreme court, high court,,
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