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जी 20 समूह की हैं ढेर सारी प्राथमिकताएं

जैमिनी भगवती /  June 18, 2017

जी 20 को एक बार फिर वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों के स्तर पर लौट आना चाहिए और वित्तीय क्षेत्र के अहम मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
जी 20 देशों की अगली शिखर बैठक तीन सप्ताह बाद 7-8 जुलाई को जर्मनी के हैम्बर्ग में होनी है। पूर्वी एशियाई वित्तीय संकट के बाद सन 1999 में जी 7 का विस्तार कर इसे जी 20 में तब्दील किया गया। यह संगठन वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों तक सीमित रहा। वर्ष 2008 की वित्तीय मंदी के तत्काल बाद जी-20 के स्वरूप को बदला गया और इसमें सरकारों के मुखिया शामिल किए गए।
 
जी 20 समूह विश्व के कुल कारोबार के करीब तीन चौथाई के लिए उत्तरदायी है। जबकि वैश्विक जीडीपी का 80 फीसदी और वैश्विक प्रदूषण का दो तिहाई उसके खाते में जाता है। स्पेन एक स्थायी आमंत्रित देश है। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफएसबी), ओईसीडी और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) आदि जी 20 की हर बैठक में शामिल होते हैं। जी 20 का कोई स्थायी सचिवालय नहीं है और उसकी अध्यक्षता भी हर साल मेजबान के साथ बदलती रहती है। हर बैठक में मेजबान देश एजेंडा तय करने में अहम भूमिका निभाता है। 
 
वर्ष 2000 के दशक में वित्तीय असंतुलन व्यापक तौर पर अमेरिका के भारी भरकम चालू खाते की वजह से था जिसकी भरपाई व्यापार अधिशेष वाले देश चीन की पूंजी की आवक से होता था। अमेरिकी आवास क्षेत्र में मूर्खतापूर्ण तरीके से ऋण के वितरण और वित्तीय क्षेत्र के लालच ने अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप तीनों को सितंबर 2008 में वित्तीय संकट में धकेल दिया। इसके तत्काल बाद ऐसी आशंका जताई जाने लगी कि मंदी का आगमन होगा। जी 7 और चीन ने वित्तीय प्रोत्साहन मुहैया कराना शुरू किया। इसकी राशि 40 खरब अमेरिकी डॉलर तक रही। इसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन के केंद्रीय बैंकों और यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) ने मॉर्गेज समर्थित प्रतिभूतियां पेश कीं और मानक ब्याज दरों को कम किया। यहां तक कि यह दर नकारात्मक भी हुई है। 
 
नवंबर 2008 में वॉशिंगटन डीसी में आयोजित पहली जी 20 शिखर बैठक में सरकारों के प्रमुखों ने भविष्य में वित्तीय संकट का अनुमान लगाने और उनसे बचने के उपायों को मंजूरी दी। इनमें वित्तीय संस्थानों का बेहतर नियमन करना शामिल था। अगले वर्ष यानी 2009 में  लंदन में आयोजित बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि बैंकों की जोखिम पूंजी की आवश्यकता को बढ़ाया जाए और वित्तीय संस्थानों में काम करने वालों के भारी भरकम क्षतिपूर्ति पैकेज और बोनस आदि को कम किया जाए। इसके पश्चात वर्ष 2010 में सोल में आयोजित शिखर बैठक में बेसल तीन पूंजी पर्याप्तता की आवश्यकता पर सहमति बनी। तुर्की में 2015 में आयोजित बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि व्यवस्थागत दृष्टिï से अहम वित्तीय संस्थानों को कैसे बंद किया जाए, वह भी बिना सरकार पर लागत थोपे।
 
हैम्बर्ग शिखर बैठक में संबोधित किए जाने वाले मुद्दों की सूची असंभव ढंग से लंबी है। जर्मन सरकार की जी 20 वेबसाइट के मुताबिक इस बैठक में भू राजनैतिक संघर्ष, आतंकवादी, आव्रजन और शरणार्थी समस्या, गरीबी और भूख, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, बीमारियां, कृषि, खाद्य सुरक्षा और पानी, वैश्विक संपर्क, स्थिरता लाने वाली वृहद आर्थिक नीतियां जिनमें विभिन्न देशों की व्यक्तिगत मजबूती पर जोर हो, अंतरराष्ट्रीय वित्त, कराधान, करवंचना और धनशोधन, रोजगार, व्यापार और निवेश तथा महिलाओं के सशक्तीकरण जैसे मुद्दे शामिल हैं। इतना ही नहीं जर्मनी चाहेगा कि हैम्बर्ग शिखर बैठक में सन 2030 के स्थायी विकास के एजेंडे के लक्ष्यों को हासिल किया जाए और पेरिस समझौते पर सहमति बने। 
 
मार्च 2017 में एफएसबी के प्रमुख मार्क कार्ने ने जी 20 के वित्त मंत्रियेां और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों को छद्म बैंकिंग, ओवर द काउंटर डेरिवेटिव्स और गलत आचरण के जोखिम से अवगत कराया था। चीन और इटली के बड़े वित्तीय संस्थानों की नकदी की स्थिति कुछ ज्यादा ही सहज थी और इसकी वजह से एक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट की शुरुआत हो सकती थी। ओटीसी डेरिवेटिव्स पर ज्यादातर स्टॉक एक्सचेंज में ही कारोबार होता है। जहां तक गलत व्यवहार के जोखिम की बात है, खराब कारोबारी और वित्तीय फर्म अक्सर गैरजवाबदेही का प्रदर्शन करती हैं क्योंकि क्षतिपूर्ति के स्तर में अभी भी काफी विसंगति है। यह लंबी अवधि के प्रदर्शन के बजाय सालाना मुनाफे पर निर्भर करता है। जी 20 देशों में करवंचना और धनशोधन कम करने के लिए सहयोग की बात करें तो इस मुद्दे पर संयुक्त वक्तव्य अवश्य जारी हुए हैं लेकिन जमीनी मोर्चे पर कोई खास प्रगति नहीं दिखती। करवंचना करने वाले मुल्क स्थानीय स्तर पर कानून बना लेते हैं जिनके तहत बाहरी देशों के कर अधिकारियों को सूचना देना गैर कानूनी कर दिया जाता है। लब्बोलुआब यह कि कर राहत देने वाले देशों ने बेनामी फंड लेना जारी रखा। 
 
जी 20 देशों के बीच कर प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए सहयोग की शुरुआत 2016 में चीन के हांगचाऊ शहर में आयोजित बैठक में हुई। बहरहाल, विभिन्न देश कर दरों को सुसंगत बनाने के इच्छुक नहीं नजर आ रहे हैं। यहां तक कि यूरोप में भी कम कर दर व्यवस्था में शामिल हैं। उदाहरण के लिए आयरलैंड-बरमूडा की शून्य कॉर्पोरेट कर दर वैश्विक फर्म मसलन गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल और फेसबुक के लिए इन क्षेत्रों में मुनाफा केंद्र स्थापित करने को आसान बनाते हैं। 
 
वर्ष 2017 के शुरुआती छह महीनों में जर्मनी ने जी 20 देशों के वित्त मंत्रियों, कृषि मंत्रियों, डिजिटल मामलों, श्रम, स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक की तथा वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों की बैठक अलग से आयोजित की गई। इन बैठकों के अलावा जी 20 की प्राथमिकताओं की लंबी सूची के चलते विभिन्न शासनाध्यक्षों की ओर से समयबद्घ कदम उठाने की प्रतिबद्घता जताने की संभावना कम ही है।
 
जून 2016 में यूके ने बहुमत से यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में मतदान किया। वहीं जनवरी 2017 में अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बन गए। ये अप्रत्याशित चुनाव परिणाम इसलिए भी आए क्योंकि अत्यंत कम ब्याज दरें पेंशनरों, कामगारों और कम आय वर्ग के लोगों को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। यह वह समूह है जो ब्याज से मिलने वाली आय पर निर्भर है। आने वाले कुछ साल तक अमेरिका का अलग-थलग पड़ा रहना तय है। जबकि यूरोपीय संघ और ब्रिटेन आगे कम से कम दो साल तक ब्रेक्सिट की जटिल प्रक्रिया में उलझे रहेंगे। 
 
वैश्विक वित्तीय क्षेत्र वर्ष 2008 से ही संकट से जूझ रहा है। इस बीच जी 20 देशों को आईएमएफ-विश्व बैंक के आयोजन से इतर वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों से बातचीत करनी चाहिए। जी 20 को वित्तीय क्षेत्र के अहम मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उदाहरण के लिए संकट के समय एसआईएफआई को सीमित करना, वित्तीय फर्मों के हर्जाने को कम करना, सर्वस्वीकार्य लेखा मानक अपनाना और कराधान नीतियों में सुधार। 
Keyword: G20, india, bank,,
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