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मध्यस्थता उपाय से क्यों नहीं बढ़ रही रफ्तार!

मेघा मनचंदा /  June 18, 2017

सड़क क्षेत्र में अटकीं परियोजनाओं की बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार द्वारा कदम उठाए जाने का करीब एक साल पूरा हो चुका है। लेकिन 31 मार्च 2015 के अनुसार, भारतीय राष्टï्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के पास 2,20,000 करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाएं मध्यस्थता के लिए लंबित पड़ी हैं। सरकार ने निर्माण क्षेत्र में अटकीं परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए कई उपायों को मंजूरी दी है। इसी क्रम में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है जिसके तहत सरकारी एजेंसियों को उन मामलों में 75 फीसदी मध्यस्थता रकम को मार्जिन मुक्त बैंक गारंटी के तौर पर एक एस्क्रो खाते में डालने की अनुमति दी गई है जहां फैसलों को चुनौती दी गई है। हालांकि कानून के जानकारों का कहना है कि सरकार की इस पहल का अपेक्षित परिणाम आना अभी बाकी है। एनएचएआई के अनुसार, 19 मामलों में सड़क डेवलपरों द्वारा महज 26,300 करोड़ रुपये मूल्य के 65 दावे जमा कराए गए। 26 मई तक मार्जिन मुक्त बैंक गारंटी के तहत 9,800 करोड़ रुपये जारी किए गए अथवा निपटाए गए।

 
इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि मध्यस्थता दावों को निपटाने की रफ्तार सुस्त है क्योंकि सड़क डेवलपर एस्क्रो खाता खुलवाने और बैंक गारंटी जमा कराने में असमर्थ हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यस्थता मामलों के तहत अटकी 75 फीसदी रकम को जारी करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम का डेवलपरों के नकदी प्रवाह पर मामूली प्रभाव दिखा क्योंकि पर्याप्त मार्जिन के बिना बैंक गारंटी के जरिये निवेश को लेकर बैंक काफी सतर्क रुख अपना रहे हैं। इस योजना को पिछले साल अगस्त में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा मंजूरी दी गई थी और पिछले साल दिसंबर से एनएचएआई ने दावों को स्वीकार करना शुरू कर दिया था।
 
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, कई कारणों से परियोजना डेवलपरों को मध्यस्थता की राह आसान नहीं लग रही है। अद्वै लीगल के मैनेजिंग पार्टनर रमेश वैद्यनाथन ने कहा, 'बोली प्रक्रिया के दौरान परियोजना की परिभाषा में अस्पष्टïता, परियोजना स्थल की स्थिति एवं आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रोपोजल) में बताई गई तैयारियों के बारे में गलत जानकारी, रियायत अनुबंध में अस्पष्टïता और डेवलपरों/ठेकेदारों की असमर्थता के बावजूद उन पर बेवजह थोपी गई कुछ जोखिमों के कारण उनकी समस्याएं बढ़ती गईं।'
 
कुछ विशेषज्ञों ने बताया कि नियुक्त किए गए मध्यस्थ की गुणवत्ता भी एक अन्य समस्या है। अधिकतर मामलों में अपील का चलन बढ़ गया है और वे सतर्कता विभाग द्वारा की जाने वाली जांच से काफी हद तक बेखौफ दिख रहे हैं। हाल तक दावों की नेकनीयती की पहचान करने और दोनों पक्षों के बीच समझौते के जरिये कोई उचित हल निकालने के लिए कोई उचित ढ़ांचा उपलब्ध नहीं था। विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क परियोजनाओं के विवादों को निपटाने के लिए हाल में एक ढांचा तैयार किया गया है और उसकी कुशलता को परखना अभी बाकी है।
 
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एनएचएआई को मध्यस्थता की पहल नहीं करनी चाहिए। एक अन्य कानूनी विशेष ने कहा, 'मध्यस्थता की पहल शुरू करने की कोई जरूरत नहीं थी। परियोजना में देरी होने पर किसी कंपनी को मुआवजा देने की क्या जरूरत है?' एनएचएआई के एक अधिकारी ने बताया कि मध्यस्थता प्रक्रिया बैंक गारंटी जमा कराने के बाद ही शुरू करने का प्रावधान है। ऐसे में कुछ कंपनियां बिल्कुल तसल्ली से बैंक गारंटी जमा करा रही हैं जिससे मध्यस्थता प्रक्रिया में और देरी हो रही है।
 
योजना के अनुसार, एस्क्रो खाते का इस्तेमाल बैंक ऋण के पुनर्भुगतान करने अथवा जारी परियोजनाओं की प्रतिबद्धता पूरी करने में किया जा सकता है। इसे बैंकों द्वारा दिए गए ऋण की वसूली के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा था और इससे निर्माण कंपनियों को अपनी परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने में भी मदद मिलने की उम्मीद की जा रही थी। साथ ही यह भी माना जा रहा था कि इससे प्रतिस्पर्धी माहौल में नए अनुबंध के लिए बोली लगाने के लिए निर्माण कंपनियों की क्षमता भी बढ़ेगी। इस योजना के तहत एक विशिष्टï मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) का भी उल्लेख किया गया है जिसे मध्यस्थता के समय एनएचएआई को ध्यान में रखना होगा। मध्यस्थता एनएचएआई की उन सभी परियोजनों पर लागू होगी जिसके लिए निर्माण कंपनी और प्राधिकरण ने कोई समझौता किया हो। यह उन मामलों पर भी लागू होगी जिसके तहत मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में अपना फैसला सुनाया हो और एनएचएआई ने उसे चुनौती दी हो।
Keyword: road, construction, company,,
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