बिजनेस स्टैंडर्ड - मियाद के बाद बढ़ा नहीं सकते अधिसूचना
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मियाद के बाद बढ़ा नहीं सकते अधिसूचना

एम जे एंटनी /  06 18, 2017

डंपिंग-रोधी शुल्क को लेकर किसी अधिसूचना की समयसीमा समाप्त होने के बाद इसे नई अधिसूचना के जरिये अपने-आप नहीं बढ़ाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भारत संघ बनाम कुम्हो पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड मामले में सरकार और भारतीय विनिर्माता संघ की अपील को खारिज करते यह फैसला सुनाया है। कोरिया और जर्मनी से मंगाए जाने वाले एक रबर उत्पाद पर 1996 से ही डंपिंग-रोधी शुल्क लगा था। सरकार इस शुल्क को हरेक पांच साल पर बढ़ाती आ रही थी। इसके लिए जारी आखिरी अधिसूचना की मियाद 1 जनवरी, 2014 को खत्म हो गई थी। 23 जनवरी, 2014 को सरकार ने उस अधिसूचना की मियाद एक साल के लिए बढ़ा दी। आयातकों ने इस कदम को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी जिसने पुरानी अधिसूचना की सीमा खत्म होने के बाद नए सिरे से अधिसूचना जारी करने को कानूनी तौर पर गलत माना। सरकार और भारतीय विनिर्माताओं ने इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की जिसने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि डंपिंग-रोधी शुल्क को स्वचालित तरीके से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। उसने यह भी कहा कि सरकारी अधिसूचना अस्थायी कानून की तरह था लिहाजा समाप्ति के बाद उसे संशोधित नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक विश्व व्यापार संगठन संधि के प्रावधानों का पालन करने के लिए भारत बाध्य है।

 
'तकनीकी उल्लंघन को व्यापक हित में नजरअंदाज करें अदालतें'
 
उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगर एक उद्योग कुछ तकनीकी उल्लंघन करता भी है तो न्यायपालिका को देश के व्यापक आर्थिक हित को ध्यान में रखते हुए उसे थोड़ी रियायत देनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, 'अदालतों को तकनीकी उल्लंघन की सूरत में भी उस तरह का फैसला देने से परहेज करना चाहिए जिससे रोजगार, ढांचागत विकास या अर्थव्यवस्था या सरकार को मिलने वाले राजस्व पर प्रतिकूल असर पड़ता हो।' सर्वोच्च न्यायालय ने शिवशक्ति शुगर लिमिटेड बनाम श्री रेणुका शुगर्स लिमिटेड मामले में अपना फैसला सुनाते हुए यह विचार व्यक्त किया है। उसने कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करने के साथ ही शिवशक्ति शुगर के खिलाफ दायर कई याचिकाओं के बावजूद उसे कामकाज जारी रखने की इजाजत दे दी। गन्ना नियंत्रण कानून के उस प्रावधान को लेकर भी विवाद था जिसके मुताबिक पहले से मौजूद एक चीनी मिल के 15 किलोमीटर के दायरे में नई मिल नहीं शुरू की जानी चाहिए। हालांकि शिवशक्ति मिल की शुरुआत पहले से सक्रिय चीनी मिल के करीब ही हुई थी लेकिन उसने सभी विभागों से इसके लिए मंजूरी ले ली थी। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि उस इलाके में गन्ने की अतिरिक्त पैदावार हो रही है जबकि अधिकांश मिलें पहले से ही अपनी क्षमता से अधिक काम कर रही हैं। न्यायालय ने अपनी असाधारण विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उस मिल को अपना कामकाज जारी रखने की इजाजत दे दी। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, 'मिल को बंद करने से कोई भी मकसद पूरा नहीं होने वाला है। आम जनता के हित में यही होगा कि मिल चलती रहे।'
 
प्रॉपटी खरीदार नहीं कर सकता मुआवजे का दावा
 
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा है कि अगर मेट्रो रेल परियोजना में काम से किसी जमीन या इमारत को कोई नुकसान पहुंचता है तो उसका तात्कालिक मालिक ही मुआवजे के लिए दावा कर सकता है। उस मालिक से प्रॉपर्टी खरीदने वाले व्यक्ति का मुआवजा मांगने का कोई हक नहीं बनता है। चितरंजन एवेन्यू इलाके में मेट्रो निर्माण के दौरान वहां की एक बहुमंजिली इमारत को नुकसान पहुंचा था। उस इमारत के मालिक ने नुकसान की भरपाई के लिए मेट्रो रेल प्राधिकरण से मुआवजे की मांग की थी लेकिन उस पर कोई फैसला नहीं हो पाया था। बाद में उस इमारत को खरीदने वाली फर्म चाहती थी कि मुआवजे के लिए उसे दावेदार बनाया जाए। संबंधित प्राधिकारी ने उस फर्म को इसकी इजाजत दे दी लेकिन मेट्रो प्राधिकरण ने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील कर दी। न्यायालय ने अपने फैसले में प्राधिकारी के निर्णय को पलटते हुए कहा है कि मुआवजे के लिए दावे का अधिकार किसी और को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।
 
ओएनजीसी को मध्यस्थता अपील में मिली जीत 
 
बंबई उच्च न्यायालय ने ओएनजीसी और इंटरओशन शिपिंग इंडिया के बीच जारी विवाद में मध्यस्थता अधिकरण के फैसले को पलट दिया है। ओएनजीसी ने अपने जहाजों के रखरखाव का ठेका इस जहाजरानी कंपनी को दिया था लेकिन भुगतान को लेकर दोनों में विवाद हो गया और मामला मध्यस्थता अधिकरण में चला गया। अधिकरण ने बहुमत से जहाजरानी कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया था जिसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की गई। ओएनजीसी ने अपनी दलील में कहा कि पूर्व-निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन न होने का अधिकरण का आकलन सही नहीं है। न्यायालय ने भी उसके दावे से सहमति जताते हुए कहा कि जहाजरानी कंपनी ने न केवल तय प्रक्रिया का उल्लंघन किया बल्कि उसका कदम नैसर्गिक न्याय और साक्ष्य के सिद्धांतों के भी खिलाफ है। कंपनी ने ओएनजीसी की सहमति के बगैर प्रक्रिया के नियमों को भी बदल दिया था।
 
मौत पर 78 लाख का मुआवजा देने का निर्देश  
 
बंबई उच्च न्यायालय ने न्यू इंडिया एश्योरेंस लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए उसे एक व्यक्ति की मौत के मुआवजे के तौर पर 78 लाख रुपये देने को कहा है। पातालगंगा परियोजना में मैनेजर के रूप में तैनात एक व्यक्ति की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उनकी विधवा ने मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल में मुआवजे के लिए गुहार लगाई। बीमा कंपनी ने यह कहते हुए मुआवजे का विरोध किया कि मोबाइल फोन पर बात करने की वजह से मैनेजर की कार एक वैन से टकराई थी। लेकिन ट्रिब्यूनल ने उसके दावे पर यकीन न करते हुए पीडि़त महिला को 71 लाख रुपये का मुआवजा देने को कहा। बीमा कंपनी ने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जिसने मुआवजे की रकम को बढ़ाकर 78 लाख रुपये कर दिया।
 
'महाराष्ट्र की श्रम अदालतों में ढांचागत सुविधाएं मिलें'
 
बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र में श्रम एवं औद्योगिक अदालतों की ढांचागत सुविधाएं मुहैया कराने का आदेश दिया है। श्रम कानून पेशेवर संघ की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि सरकार को श्रम एवं औद्योगिक अदालतों में बुनियादी ढांचा मुहैया कराने का समुचित बंदोबस्त करना चाहिए। न्यायालय ने श्रम अदालत के कक्षों में पर्याप्त जगह होने, बैठने की व्यवस्था होने और पानी, बिजली एवं शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने का राज्य सरकार को आदेश दिया है। इसके साथ ही श्रम अदालतों में न्यायाधीशों के सभी खाली पदों को भरने और उन्हें रहने के लिए आवास देने को भी कहा गया है। इन अदालतों को अगले पांच वर्षों में सरकारी इमारतों में स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए और उस समय तक जिन इमारतों में ये अदालतें चल रही हैं, उनके मालिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने को कहा जाए। न्यायालय ने राज्य की निचली अदालतों की समग्र स्थिति सुधारने के लिए हाल ही में 210 पृष्ठों का एक आदेश जारी किया था। उसने कहा कि श्रम एवं औद्योगिक अदालतों पर भी वह आदेश लागू होगा। 
Keyword: supreme court, high court, डंपिंग-रोधी शुल्क,
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