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नकदी का अंबार करेगा फंड के प्रदर्शन का बंटाधार

संजय कुमार सिंह /  06 18, 2017

कई फंड प्रबंधक बाजार की मौजूदा स्थिति को लेकर असमंजस में हैं। इधर सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) से उन्हें लगातार रकम भी मिल रही है। ऐसे में उनके पोर्टफोलियो में नकदी का अंबार लग गया है। हालांकि नकदी का होना तब अच्छा रहता है, जब बाजार में गिरावट आने लगती है क्योंकि उस वक्त फंड को संभालने में मदद मिलती है। लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में यह दांव उलटा भी पड़ सकता है।

 
कहा यह जा रहा है कि शेयरों की ऊंची कीमत को देखकर फंड प्रबंधक सतर्क हो गए हैं और उन्होंने हाथ खींच लिया है। पीपीएफएएस म्युचुअल फंड के मुख्य निवेश अधिकारी राजीव ठक्कर कहते है, 'इस समय बाजार में मजबूती का दौर है, खासकर मिड और स्मॉल कैप शेयरों और उपभोग से जुड़े कुछ खास वर्गों के शेयरों में तेजी है। शेयर के भाव में तेजी बुक वैल्यू के मुकाबले खासी अधिक रही है। कुछ निवेश प्रबंधक मान रहे हैं कि मौका अच्छा हो तो कोई भी कीमत ज्यादा नहीं है। हम समझ रहे हैं कि इस समय मौका कितना अच्छा है,लेकिन हम मूल्यांकन के अपने पैमानों पर ही कायम रहेंगे और सही मौके का इंतजार करेंगे।'
 
एसआईपी के जरिये रकम का प्रवाह भी एक कारण है। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक (मैनेजर रिसर्च) कौस्तुभ बेलापुरकर कहते हैं, 'नवंबर 2016 और अप्रैल 2017 के बीच डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंडों और बैलेंस्ड फंडों को करीब 76,000 करोड़ रुपये मिले हैं। ये रकम लगाने से पहले फंड प्रबंधक समझ-बूझ दिखा रहे हैं।' लंबे समय तक अधिक नकदी बनाए रखना भी फंड प्रबंधकों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। पहली बात तो यह है कि नकदी रहते हुए अगर बाजार ऊपर चढ़ा तो उनके फंड अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। दूसरी बात यह है कि अधिक रकम रहने से निवेशकों के परिसंपत्ति आवंटन में असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। सुरक्षात्मक रवैया रखने वाला निवेशक अपने पोर्टफोलियो में केवल 40 प्रतिशत रकम ही इक्विटी में रख सकता है। अगर उसका फंड प्रबंधक पोर्टफोलियो में 25 प्रतिशत नकदी रखता है तो इक्विटी में प्रभावी निवेश कम होकर 30 प्रतिशत रह जाएगा, जिससे उसके दीर्घ अवधि के प्रतिफल पर असर पड़ेगा।
 
कई इक्विटी निवेशक दीर्घ अवधि का लक्ष्य ध्यान में रखकर निवेश करते हैं और कभी-कभार अधिक मूल्यांकन से भी नहीं कतराते हैं। प्लान अहेड एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय अधिकारी विशान धवन कहते हैं, 'अपना निवेश प्रवाह औसत रखने के लिए निवेशक एसआईपी का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए वे नहीं चाहते कि फंड प्रबंधक नकदी से जुड़े बड़े फैसले करे।' जब फंड प्रबंधक अधिक मात्रा में नकदी रखते हैं तो उन्हें इसे सही समय पर निवेश भी करना चाहिए। धवन कहते हैं, '2008 में जब बाजार में नरमी आई थी तो कुछ फंड प्रबंधक गिरावट से पहले नकदी का अंबार लगाने में सफल रहे। लेकिन जब बाजार चढऩे लगा तो सही वक्त पर शेयरों में निवेश करने में वे बुरी तरह नाकाम रहे थे।' बाजार में गिरावट के समय निवेशक रकम निकालने लगते हैं, जिससे फंड प्रबंधक निकासी का दबाव झेलने के लिए नकदी बचा कर रखता है। जब बाजार में तेजी आती है तो उनके पोर्टफोलियो के एक बड़े हिस्से का निवेश नहीं हो पाता है, जिससे प्रदर्शन खराब रहता है।
 
इन घटनाओं के बाद ज्यादातर इक्विटी फंड प्रबंधक निवेश बनाए रखना चाहते हैं। फ्रैंकलिन टेम्पलटन इन्वेस्टमेंट्स-इंडिया में उपाध्यक्ष एवं पोर्टफोलियो मैनेजर (फ्रैंकलिन इक्विटी) रोशी जैन कहती हैं, 'हम अपने फंड निवेश बरकरार रखते हुए आगे बढ़ाते हैं। रोजमर्रा की नकदी आवश्यकताओं के लिए हम पोर्टफोलियो के 5 फीसदी के बराबर नकदी अपने पास रखते हैं। लेकिन शेयरों की कीमत ज्यादा हो तो सुरक्षित पोर्टफोलियो की रणनीति अपनाई जा सकती है और नकदी स्तर बढ़ाकर 10 प्रतिशत किया जा सकता है।'
 
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी के मुख्य निवेश अधिकारी (इक्विटीज) मृणाल सिंह कहते हैं, 'अगर नकदी का स्तर इकाई में है तो चिंता की बात नहीं है। नुकसान तब होता है, जब फंड प्रबंधक पूरे बाजार चक्र के दौरान अधिक मात्रा में नकदी रखता है।' यह देखना चाहिए कि अधिक नकदी कब तक रहती है। अगर यह एक या दो महीने के लिए है तो ठीक है, लेकिन अगली कुछ तिमाहियों तक ऐसे ही हालात रहे तो फंड से निकलने के बारे में अपने सलाहकार से संपर्क करें।
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