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स्टार्टअप के लिए धन जुटाने की दिक्कत दूर

रंजू सरकार /  06 18, 2017

स्टार्टअप के लिए धन जुटाने की स्थितियां धीरे-धीरे सुधरती जा रही हैं। उद्यमों के शुरुआती चरण में पूंजी लगाने वाली कंपनी (वीसी) इंडिया क्वोशंट में पार्टनर मधुकर सिन्हा कहते हैं कि अगर आप 2015 को अपवाद मानकर छोड़ दें तो धन जुटाने की मात्रा पहले के स्तर पर आ गई है। इसी धारणा को आंकड़े भी पुष्ट करते हैं। डाटा अनुसंधान कंपनी वेंचर इंटेलिजेंस के मुताबिक अप्रैल और मई 2017 के बीच स्टार्टअप ने 138 उद्यम पूंजी (वीसी) सौदों से 53.8 करोड़ डॉलर जुटाए, जो 2016 की इसी अवधि में उनके द्वारा 200 सौदों से जुटाए गए 56.5 करोड़ डॉलर से मामूली कम है। इस साल अप्रैल और मई में जुटाया गया धन वर्ष 2014 की इसी अवधि में जुटाए गए धन (53.6 करोड़ डॉलर) के लगभग समान और वर्ष 2013 (41.6 करोड़ डॉलर) और वर्ष 2012 (31.4 करोड़ डॉलर) में जुटाए गए धन से ज्यादा है। स्टार्टअप ने 2015 में 193 सौदों के जरिये 70.3 करोड़ डॉलर जुटाए थे। 

 
पिछले साल की तुलना में इस साल सीरीज-बी सौदे कम हुए, लेकिन ज्यादा पैसा जुटाया गया। सीरीज-बी और सी में किल्लत बनी हुई है, लेकिन बड़े सौदे (सीरीज-ई) फिर से होने लगे हैं। लाइमरोड की संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) शुचि मुखर्जी कहती हैं कि सीरीज-ए एवं बी और बहुत बड़े सौदों में हलचल है, लेकिन मध्यम स्तरों पर बाजार सुस्त है। वह कहती हैं, 'जो लोग पहले इन स्तरों पर निवेश कर रहे थे, वे अब चौकस हैं। निवेशकों में असल भरोसा लौटाने के लिए भारत को निकासी से संबंधित प्रावधान करने की जरूरत है।' फेयरसेंट के संस्थापक और सीईओ रजत गांधी कहते हैं कि निश्चित रूप से सूखे दौर खत्म हो चुका है और फिर से निवेश आने लगा है। मुख्य रूप से वर्तमान निवेशक फिर से अपनी कंपनियों में निवेश करने लगे हैं। वह कहते हैं, 'मैं यह कहूंगा कि वर्ष 2016 समाप्ति और 2017 की शुरुआत वीसी फंंडिंग के लिए 'सेतु' रहे हैं। मेरा मानना है कि आगे शेष 2017 सामान्य वर्ष होगा, लेकिन मूल्यांकन पर दबाव रहेगा।'
 
भारतीय बाजार से हेज फंड गायब हो गए हैं, मगर जानकारों का कहना है कि चीन और जापान के निवेशक काफी रुचि दिखा रहे हैं और भारत पर ज्यादा दांव लगा रहे हैं। 48ईस्ट के संस्थापक और सीईओ जोसेफ जेरियन का कहना है कि निश्चित रूप से किल्लत दूर हो रही है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा, 'इस साल विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न आकार के बहुत से सौदे हुए हैं। हमने यह भी देखा है कि पिछले निवेश के आधार पर काफी कंसोलिडेेशन और क्लीन-अप भी हो रहा है। निवेशक स्टार्टअप में निवेश को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं और वे केवल वृद्धि के बजाय कारोबारी मॉडल पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।'
 
ऐसा नहीं है कि सभी के लिए धन जुटाना आसान हो गया है। सेफ-ड्राइविंग ऐप क्रूज पहले चरण का धन जुटाने के लिए बाजार में है और वह तीन महीनों में 20 से अधिक निवेशकों से संपर्क साध चुकी है। क्रूज के संस्थापक पल्लव सिंह कहते हैं, 'धन जुटाने के मानदंड बहुत ऊंचे हैं। निवेशक निवेश की हिम्मत जुटाने से पहले कंपनी की तरफ ग्राहकों के आकर्षण और राजस्व को देख रहे हैं। यह मुश्किल है, लेकिन यह हमें कठिन हालातों से निपटने में सक्षम बनाता है।'
 
क्रेडिट विद्या के संस्थापक अभिषेक अग्रवाल कहते हैं कि आजकल उद्यमों में पूंजी लगाने वाले निवेशक लाभ और आकार के बारे में पहले की तुलना में ज्यादा सवाल पूछ रहे हैं। वह कहते हैं, 'प्रस्तुति और परिकल्पना के आधार पर धन जुटाने के दिन बीत चुके हैं।' उन्होंने कहा कि अगर किसी निवेशक को यह लगता है कि कारोबार का आमदनी का मॉडल अच्छा है तो उसे धन मिलने के पूरे आसार होते हैं। 
 
फ्लेक्सीलॉयन्स के संस्थापक और सीईओ दीपक जैन कहते हैं, 'मेरा मानना है कि  पिछला साल ज्यादातर वीसी के लिए अच्छा नहीं रहा, जिसमें ई-कॉमर्स क्षेत्र अच्छे नहीं बल्कि चिंताजनक कारणों की वजह से चर्चा में रहा। इसने निश्चित रूप से देश में 'उद्यमिता का उत्साह' ठंडा किया, जहां पहले लगभग हर किसी कारोबारी आइडिया को धन मुहैया कराया जा रहा था। हमारा मानना है कि मजबूत कारोबारी मॉडलों को वीसी कंपनियों का निवेश आगे भी मिलता रहेगा क्योंकि देश में फिनटेक, स्वास्थ्य, खुदरा जैसे क्षेत्रों में विस्तार की काफी संभावनाएं हैं।' हाउसिंग डॉट कॉम, प्रॉपटाइगर डॉट कॉम, मकान डॉट कॉम के समूह सीईओ ध्रुव अग्रवाल कहते हैं, '2015 में उन स्टार्टअप को भी धन नहीं मिला, जो यह हासिल करने की हकदार थीं। 2016 में दिक्कतें दूर होने लगीं। निवेशक सोच समझकर निवेश करने लगे और सबसे बेहतर कंपिनयां ही धन जुटा पाईं।' ïïïïïïवर्ष 2016 ज्यादातर कंपनियों के लिए बुनियाद पर लौटने का वर्ष था, जिसमें उन्होंने पैसा कमाने और लाभ हासिल करने पर ध्यान देना शुरू किया। 
 
अग्रवाल ने कहा, '2017 में हालात सामान्य हो रहे हैं क्योंकि कंपनियां अपने परिचालन को लेकर ज्यादा अनुशासित हो गई हैं। स्टार्टअप में यूनिट इकोनॉमिक्स पर ध्यान दिया जाने लगा है, इसलिए निवेशक पिछले सालों में अपने मन में समाए डर को बाहर निकालने लगे हैं।' एक स्टार्टअप के संस्थापक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'धन जुटाने का स्तर ठीक उसी स्तर पर है, जहां यह होना चाहिए। इंटरनेट बुलबुले का समय बीत चुका है, जिसमें लोग कंपनियों के नाम बड़े चेक लिख रहे थे और उनसे गैर-तर्कसंगत दर से बढऩे की उम्मीद पाल रहे थे।' उन्होंने कहा, 'अब निवेशकों और उद्यमियों की उम्मीदें वैसी ही हैं, जैसी वे होनी चाहिए। लोग कंपनियों में जरूरत से ज्यादा पैसा नहीं डाल रहे हैं और उद्यमी सही स्तर से ज्यादा मूल्यांकन की उम्मीद नहीं कर रहे हैं।' वर्टेक्स वेंचर्स के प्रबंध निदेशक और इंडिया हेड बेन माथियस ने कहा, 'आज भारत में बहुत सी नवप्रवर्तक कंपनियां हैं, जो सॉफ्टवेयर, फिनेटक, बीमा तकनीक, इंटरनेट आधारित तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), साइबर सुरक्षा और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं।'
Keyword: startup, company, policy, स्टार्टअप इंडिया क्वोशंट,
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