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रेनमिनबी का बढ़ता अंतरराष्ट्रीय प्रभाव

श्याम सरन /  June 16, 2017

हालिया गतिरोध के बावजूद चीन की मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण का काम निरंतर पटरी पर नजर आ रहा है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम सरन 

 
वर्ष 2016 के दौरान चीन की मुद्रा रेनमिनबी (युआन) का अंतरराष्ट्रीयकरण रुकता नजर आया क्योंकि उस वक्त पूंजी देश से बाहर जा रही थी, शेयर बाजारों में अस्थिरता का माहौल था और चीन की अर्थव्यवस्था में निरंतर मंदी का दौर चल रहा था। उदाहरण के लिए वर्ष 2015 के दौरान चीन के विदेश व्यापार का 30 फीसदी से अधिक उसकी मुद्रा में होता था। वर्ष 2016 में यह घटकर 20 फीसदी रह गया। वर्ष 2015 में रेनमिनबी दुनिया की छठी सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली मुद्रा बन गई थी लेकिन फिलहाल यह आठवें स्थान पर है। 
 
हॉन्गकॉन्ग में भी रेनमिनबी के जमा में कमी आई है। यह भी उसके अंततराष्ट्रीय प्रोफाइल का संकेतक है। फिलहाल इसके 33 खरब युआन होने का अनुमान है जबकि 2015 में यह 46 खरब युआन थी। चीन के अधिकारियों ने अनौपचारिक तौर पर पूंजी के बहिर्गमन पर प्रतिबंध लगा दिया। वहीं बड़े निगमों के विदेशी अधिग्रहण पर कठोर दृष्टिï रखी जाने लगी। शेयर बाजारों का नियमन सख्त किया गया। 
 
इन सब बातों के चलते विश्लेषक यह मानने लगे कि चीन जहां पूंजी पर नियंत्रण कम करेगा, वहीं वह इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाएगा और इसका तात्पर्य यह होगा कि रेनमिनबी सही मायनों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनकर उभरेगी लेकिन आरक्षित मुद्रा के रूप में उसका मुक्त व्यापार शायद ही हो। एक विश्लेषक ने यह भी कहा कि रेनमिनबी की वैश्विक हैसियत मजबूत होती जाएगी लेकिन उससे यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह दुनिया पर राज करे। 
 
रेनमिनबी के अंतरराष्ट्रीयकरण में ठहराव आया है और कुछ हद तक उसकी दिशा भी उलटी है लेकिन गहन विश्लेषण बताता है कि चीन को उसकी मुद्रा के सहारे विश्व शक्ति बनाने का प्रयास जारी है। उसे अमेरिकी डॉलर के प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया जा रहा है। कुछ बातें जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, इस प्रकार हैं: दुनिया के तमाम अहम बाजारों के अलावा 15 विदेशी केंद्रों में इसका कारोबार संभव है। लंदन रेनमिनबी के कारोबार और उसमें जारी बॉन्ड के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है। चीन ने अपने बड़े अंतरबैंक बॉन्ड बाजार में विदेशी प्रवेश की इजाजत दे दी है। इससे उसे इस बाजार में नकदी की स्थिति दुरुस्त करने में मदद मिलेगी। 
 
चीन सरकार के बॉन्डों की बाहरी होल्डिंग अब कुल वैश्विक धारिता का 3.9 फीसदी है। आने वाले सालों में यह और बढ़ेगी। पान्डा बॉन्ड का जारी होना एक और अहम घटनाक्रम है। इससे विदेशी संस्थाएं चीन के घरेलू बाजार में जारी बॉन्ड के जरिये फंड जुटा सकेंगी। 
चीन ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के साथ स्वैप की व्यवस्था मजबूत की है। अब ऐसे 35 समझौते हैं और कुल राशि 33 खरब युआन है। ये अहम हैं क्योंकि इनकी मदद से अमेरिकी डॉलर में लेनदेन को दरकिनार किया जा सकता है। यूक्रेन संकट के बाद जब रूस पश्चिम द्वारा थोपे गए प्रतिबंधों से मुकाबला कर रहा था तो इन्होंने इसकी मदद की। उस वक्त रूसी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग से कट गई थीं जहां डॉलर का दबदबा है। 
 
चीन ने लगातार प्रयास किया है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय जगत से अमेरिकी दबदबा समाप्त किया जाए। अमेरिकी क्रेडिट कार्ड व्यवस्था मसलन वीजा और मास्टरकार्ड की काट में चीन ने 2002 में यूनियनपे पेश किया था। बीते कुछ साल में यूनियनपे का लोगो दुनिया भर के एटीएम पर दिखने लगा है। जहां भी अमेरिकी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट कार्डों का भुगतान रोका (हाल में रूस) वहां चीन को मजबूती मिली। चीन ने अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था (सीआईपीएस) की भी स्थापना की जो उसका निजी भुगतान गेटवे है। यह दुनिया भर में वित्तीय लेनदेन पर नियंत्रण रखता है। चीन का सीआईपीएस अमेरिकी एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। रूस में इसका परीक्षण हो चुका है। चीन दुनिया के कुल जीडीपी के 16 फीसदी और वैश्विक वस्तु एवं सेवा व्यापार में 13 फीसदी का हिस्सेदार है। 
 
यहां उन विभिन्न मुक्त व्यापार वाले वित्तीय क्षेत्रों का जिक्र लाजिमी है जिनकी स्थापना वित्तीय उदारीकरण के लिए की गई लेकिन जो कई शर्तों के अधीन हैं। शांघाई एफटीजेड की स्थापना नकारात्मक नियंत्रण सूची के आधार पर की गई। वह एक सफल अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और बैंकिंग केंद्र के रूप में उभरा। इस अनुभव से बीते दो साल के दौरान ऐसे 11 केंद्र स्थापित करने में मदद मिली।
 
चीन की महत्त्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) पहल भी रेनमिनबी के अंतरराष्ट्रीयकरण से जुड़ी हुई है। इसके घोषित लक्ष्यों में से एक है प्रतिभागी देशों के बीच वित्तीय समन्वय। ओबीओआर चीन की मुद्रा के वाणिज्यिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम उपाय हो सकती है। इससे पहले वह चीन के वित्तीय संस्थानों में यह दर्जा पा चुकी है। ये वे संस्थान हैं जो इस पहल के अधीन अलग-अलग स्थानों पर बुनियादी परियोजनाओं को वित्तीय मदद मुहैया कराएंगे। एक वरिष्ठ चीनी बैंकर ने कहा कि चीन की ओर से अधिक से अधिक बुनियादी परियोजनाओं को मदद दी जाएगी। ऐसे में इस मार्ग पर स्थित कई देश रेनमिनबी को कारोबारी मुद्रा के रूप में स्वीकार करने की इच्छा जताएंगे। रेनमिनबी का अंतरराष्ट्रीयकरण चीन की ओरबीओआर पहल का एक अनिवार्य अंग है। इससे पूंजी की आवक, व्यापार और जनता के स्तर पर मेलजोल को बढ़ावा मिलेगा।
 
यह बात भी ध्यान देने लायक है कि एशियाई बुनियादी निवेश बैंक, ब्रिक्स विकास बैंक और शांघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) जैसे तीन संगठन जिनका सदस्य भारत भी है, वे भी ओबीओआर में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वित्तीय तालमेल एससीओ के घोषित लक्ष्यों में से एक है। भारत इन मंचों पर अपनी भूमिका को कैसे तैयार करे यह अत्यंत सावधानी और शोध का विषय है। क्या हमें पश्चिमी दबदबे वाली वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्था में चीन के उभार का समर्थन करना चाहिए या हमारे हित इसका विरोध करने में हैं? क्या भारत स्वयं ऐसी महत्त्वाकांक्षा रखता है कि वह वैश्विक वित्तीय बाजार में अहम घटक बने? अगर इन मुद्दों को अभी हल नहीं किया गया तो वैश्विक वित्तीय तंत्र में चीन का दबदबा बढ़ता चला जाएगा। यह अपने आप में चीन की बढ़ती भूराजनैतिक महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा है।
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं और फिलहाल सीपीआर के संचालक मंडल के सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: india, china, money,,
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