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सरकारी रोक से चरमराने लगा चमड़ा उद्योग

रॉयटर्स /  06 15, 2017

पशु वध पर रोक का उद्योग पर असर

 पशुओं के वध पर पाबंदी लगने से चमड़ा उद्योग की हालत बिगडऩे लगी है। चमड़ा उद्योग से जुड़े मुस्लिम और दलित समुदायों में आजीविका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस उद्योग की विस्तार संभावनाएं भी हो सकती हैं धूमिल

आगरा की मुस्लिम बस्तियों में सदियों से जूते बनाने का काम चलता आ रहा है। लेकिन इन दिनों यहां के छोटे-छोटे कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की आजीविका खतरे में पड़ गई है। इन कारखानों के मालिक मजदूरों को काम से हटा रहे हैं और उनके परिवार भी खर्चों में कटौती करने के लिए मजबूर हो गए हैं। सरकार की तरफ से पशु वध पर रोक लगाने के बाद चमड़ा उद्योग से बड़े पैमाने पर जुटे मुस्लिम समुदाय में एक तरह की हलचल देखी जा रही है। 

देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में गत मार्च में नई सरकार बनने के तत्काल बाद प्रशासन ने बिना लाइसेंस वाले बूचड़नों को बंद करना शुरू कर दिया था। राज्य सरकार के इस कदम ने मांस उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित करने के साथ ही चमड़ा उद्योग पर भी विपरीत असर डाला। उत्तर प्रदेश के मांस कारोबारी अवैध बूचडख़ानों पर सख्ती से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले महीने वध के मकसद से पशुओं की बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया। इस पाबंदी के दायरे में गाय के साथ भैंस को भी शामिल किया गया है। गाय के वध पर तो देश के कई राज्यों में पहले से ही रोक लगी हुई थी लेकिन मांस और चमड़ा उद्योग में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले भैंस को भी मारना अब प्रतिबंधित हो गया है। 

इस पाबंदी का असर मुस्लिम समुदाय के अलावा चमड़ा कारोबार से जुड़े कुछ दलित समुदायों पर भी पड़ने लगा है। चमड़ा और मांस उद्योग में बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय सक्रिय है लेकिन हिंदुओं की कुछ निचली जातियां भी मवेशियों को मारने, खाल उतारने और चमड़ा कारखानों में जूते, चप्पल और बैग जैसे उत्पाद बनाने के काम में लगी हुई हैं। कुछ कारखाने तो दुनिया के मशहूर ब्रांड ज़ारा और क्लाक्र्स के लिए भी चर्म उत्पाद बनाते हैं। कुछ संगठन चमड़े के सामान बनाने वाले इन कारखानों से जुड़े लोगों पर मवेशियों को मारने के आरोप लगाते रहे हैं। इसे लेकर मवेशियों के कारोबारियों के साथ मारपीट के भी कई मामले सामने आए हैं। पिटाई के कुछ मामलों में पशु कारोबारियों की मौत हो जाने के बाद चमड़ा उद्योग भरोसे के संकट से जूझता रहा है। 

सामाजिक तनाव 

भारत में मांस एवं चमड़ा कारोबार मुख्य रूप से अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। इसकी वजह से अवैध बूचडख़ानों पर रोक और मारने के लिए पशुओं की बिक्री को प्रतिबंधित किए जाने के असर का अंदाजा लगा पाना काफी मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर है कि मवेशियों की खरीद-फरोख्त का धंधा काफी मंदा हो गया है और चमड़ा कारखानों को कच्चा माल भी नहीं मिल पा रहा है। 

परंपरागत तौर पर चमड़े का काम करने वाले मुस्लिम कुरैशी समुदाय के सदस्य अब्दुल फहीम कुरैशी का कहना है कि उत्तर प्रदेश में पिछले साल कुछ बाजारों में करीब 1,000 पशुओं की खरीद-बिक्री होती थी लेकिन अब उनकी संख्या घटकर 100 के आसपास आ गई है। चमड़ा उत्पादन में गिरावट आने का मतलब है कि देश के कुछ सबसे गरीब तबकों के पास रोजगार के अवसर और भी कम हो जाएंगे। वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनावों के पहले आर्थिक विकास तेज करने और रोजगार बढ़ाने के प्रधानमंत्री मोदी के वादों के पूरा न होने पर  आगे चलकर सामाजिक तनाव पैदा होने की भी आशंका है। 

हालांकि कुछ बड़े चमड़ा उत्पादक अवैध बूचडख़ानों पर रोक लगाने के उत्तर प्रदेश सरकार के कदम का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि केवल लाइसेंस वाले बूचडख़ानों को ही कारोबार करने की इजाजत देने से चमड़ा उद्योग की छवि सुधारने में भी मदद मिलेगी। बड़े निर्यातक अपने पास पर्याप्त मात्रा में चमड़ा मौजूद होने का दावा करते हुए कहते हैं कि वे आयात समेत कई स्रोतों से चमड़े का इंतजाम करते हैं। इसके बावजूद मांस एवं चमड़ा कारोबार में लाखों ऐसे लोग काम करते हैं और उनके पास चमड़े का इंतजाम करने के लिए बेहद सीमित संसाधन हैं। गौरतलब है कि भारत में मांस कारोबार और चमड़े उद्योग का कुल आकार 16 अरब डॉलर (1,000 अरब रुपये) से अधिक है। 

आगरा की तंग गलियों में मौजूद जूते बनाने के छोटे कारखानों में काम करने वाले लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। इन लोगों को लग रहा है कि उनका भैंस का कारोबार करना, जूते-चप्पल के लिए चमड़ा खरीदना या अपने पुरखों की तरह चमड़े के धंधे में लगे रहना अब उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। उन्हें कट्टïरपंथी समूहों के हमले का डर सता रहा है। एक चमड़ा कारखाने के उम्रदराज मालिक मोहम्मद मुकीम कहते हैं, 'लोग हमें कमजोर करना चाहते हैं। वे हमारी रोजी-रोटी भी छीन लेना चाहते हैं।' मुकीम के कारखाने में पहले 40 कारीगर काम करते थे, लेकिन आज उनकी संख्या दर्जन भर रह गई है और वे चमड़े के बजाय सिंथेटिक सामग्री का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।

असंभव लक्ष्य

मांस व्यवसाय की तरह भारत के चमड़ा कारोबार में भी पिछले दशक में तीव्र वृद्धि हुई थी। इसकी वजह से कामगारों को अच्छा वेतन मिलने लगा था जिसका एक हिस्सा वे अपने घरवालों के पास भी भेजा करते थे। आगरा के चमड़ा कारखाने रोजाना 10 लाख से भी अधिक जोड़ी जूते-चप्पल बनाते हैं जो घरेलू खरीदारों के अलावा यूरोपीय देशों में भी भेजे जाते हैं। इनके खरीदारों में ज़ारा और क्लाक्र्स जैसे बड़े ब्रांड भी शामिल हैं। एक अनुमान है कि ताजनगरी के नाम से दुनिया भर में मशहूर आगरा की कुल आबादी का 40 फीसदी हिस्सा चमड़ा उद्योग से ही जुड़ा हुआ है। भारत दुनिया भर में चमड़े के पांच बड़े उत्पादकों में शामिल है। मोदी सरकार चमड़ा उद्योग से प्राप्त राजस्व को वर्ष 2020 तक मौजूदा स्तर से दोगुना कर 27 अरब डॉलर तक ले जाना चाहती है। लेकिन पिछले महीने चमड़े के लिए गायों और भैंसों को मारने पर रोक लगाने के बाद सरकार के लिए इस लक्ष्य को हासिल कर पाना आसान नहीं होगा। 

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