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जीएसटी से कुम्हलाएगी कपड़े की 'सूरत'

राजेश भयानी / मुंबई 06 15, 2017

कपड़े पर जीएसटी की सलवट

सूरत में होता है सालाना 50,000 करोड़ रुपये का कपड़ा कारोबार
कपड़े पर लगेगा 5 फीसदी जीएसटी, अभी है करमुक्त
कृत्रिम कपड़ा बनाने वालों को मिलेगा आंशिक इनपुट क्रेडिट
आयातित कपड़ा होगा 11 फीसदी सस्ता

शेलोन इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक धीरज शाह वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर इन दिनों चिंता में हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें कृत्रिम धागे पर ज्यादा जीएसटी देना पड़ेगा जबकि जो कपड़ा वह बनाते हैं उस पर जीएसटी दर 5 फीसदी है। शाह की कंपनी की गुजरात के सूरत में कृत्रिम कपड़ा बनाने की कंपोजिट मिलें हैं और उसका सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रुपये है। सूरत में  कपड़ा उद्योग का सालाना कारोबार 50,000 करोड़ रुपये है।

शाह की दोहरी समस्या है। उन्हें अपने खरीदार से 5 फीसदी जीएसटी मिलेगा जबकि उन्हें कच्चे माल यानी धागे पर 18 फीसदी जीएसटी चुकाना पड़ेगा। साथ ही उनके कपड़े को सस्ते आयातित कपड़े से भी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा जो जीएसटी लागू होने के बाद 11 फीसदी सस्ता हो जाएगा। सूरत में रोजाना 4 करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन होता है। इसमें कंपोजिट मिलों की हिस्सेदारी 20 फीसदी है। ये मिलें खुद ही कपड़े पर मूल्य संवर्धन का काम भी करती हैं। धागे पर जीएसटी की ऊंची दर और अतिरिक्त कार्यशील पूंजी लागत के कारण उनके लिए कपड़े की लागत करीब 3 फीसदी बढ़ जाएगी। 

सूरत में 80 फीसदी कपड़ा पावरलूम और शटल लेस लूम द्वारा बनाया जाता है। जीएसटी के लागू होने के बाद कंपोजिट मिलों की तुलना में उन पर ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उनकी कई तरह की समस्याएं हैं। आदित्य समूह के सूरत में 150 पावर लूम हैं। समूह के आशीष गुजराती ने कहा, 'जीएसटी लागू होने के बाद हमें 18 फीसदी कर धागे पर और इतना ही कताई पर देना होगा। इसके बरअक्स कपड़े पर जीएसटी की दर केवल 5 फीसदी है और हमें इनपुट क्रेडिट का पूरा फायदा नहीं मिलेगा। इससे लागत 10 फीसदी बढ़ जाएगी।'

गुजराती ने कहा कि असंगठित क्षेत्र के पावर लूम धीरे-धीरे गायब हो जाएंगे। यही वजह है कि कंपोजिट मिलों की तुलना में पावर लूम पर ज्यादा मार पड़ेगी। दोनों को सस्ते आयात से प्रतिस्पर्धा करना होगा। द सिंथेटिक ऐंड रेयन टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन श्रीनारायण अग्रवाल ने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद चीन से कपड़े के आयात से भारतीय कपड़ा कंपनियों को बहुत नुकसान होगा। सूरत, भिवंडी और लुधियाना की कपड़ा इकाइयां पहले ही दबाव में हैं और चीन से सस्ते आयात से उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी।

उन्होंने कहा कि अभी कपड़े के आयात पर कुल 26 फीसदी कर लगता है जिसमें 10 फीसदी आयात शुल्क, 12.5 फीसदी काउंटरवेलिंग ड्यूटी और 4 फीसदी विशेष अतिरिक्त शुल्क शामिल है। जीएसटी लागू होने के बाद कपड़े के आयात पर 15 फीसदी कर ही लगेगा। इसे आयातित कपड़ा 11 फीसदी सस्ता हो जाएगा। इससे सूती कपड़े बनाने वालों पर कोई असर नहीं होगा क्योंकि धागे और कपड़े पर जीएसटी की दर एक समान 5 फीसदी है। 

अभी देश में अधिकांशत: चीन से ही कपड़े का आयात होता है लेकिन अब बांग्लादेश, श्रीलंका और वियतनाम भी भारत को निर्यात कर सकते हैं। देश में अभी सालाना 4,500 करोड़ रुपये के कपड़े का आयात होता है जिसके कई गुना बढऩे की उम्मीद है। अग्रवाल का सुझाव है कि केवल वास्तविक कंपनियों को कपड़े के आयात की अनुमति दी जानी चाहिए और आयात शुल्क बढ़ाकर 23 फीसदी किया जाना चाहिए।

सूरत का कपड़ा उद्योग करीब 10 लाख लोगों को रोजगार देता है। यहां 150 थोक बाजार और 50,000 थोक व्यापारी हैं। शहर में पावर लूम मालिकों सहित कुल 20,000 कपड़ा निर्माता हैं। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक देश में पावर लूम उद्योग बिखरा हुआ है और प्रमुखत: सूरत, भिवंडी, इचलकरंजी, मालेगांव, तिरुपुर और कोयंबटूर में करीब 27 लाख पावर लूम में लाखों लोगों को रोजगार मिला है। देश के एक चौथाई यानी करीब 650,000 पावरलूम सूरत में हैं। एक और मुद्दा सूत और कृत्रिम धागे के मिश्रण से बनने वाले धागे को बेचने की होगी। अग्रवाल को आशंका है कि सूती कपड़े पर 5 फीसदी जीएसटी को देखते हुए मिश्रित कपड़े को सूती कपड़े के नाम पर बेचा जा सकता है। मिश्रित कपड़े पर सूत की ज्यादा मात्रा दिखाकर जीएसटी चुकाने से बचने की कोशिश हो सकती है। अग्रवाल ने मिश्रित कपड़े पर 12 फीसदी जीएसटी की वकालत की।
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