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भारतीय कॉर्पोरेट जगत की चुप्पी से बयां होती तस्वीर

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  June 15, 2017

उत्साह जगाने में नाकाम विकास सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए लेकिन सरकार के लिए चिंतित होने की एक और वजह है। वह है भारतीय कॉर्पोरेट जगत की चुप्पी। भारत के मुखर लोकतंत्र का यह तबका निश्चित रूप से कम मुखर है। कॉर्पोरेट जगत सरकार के बारे में सार्वजनिक राय रखने में भी अधिक एहतियात बरतता है। यह समूह विरले ही आलोचना के सुर अपनाता है लेकिन सरकार की खुलकर तारीफ से शायद ही कभी खुद को रोक पाता है। बुद्धिजीवी इन तारीफों को सरकारी नीतियों पर बुरी तरह निर्भर रहने वाले इस समुदाय की चापलूसी बताते हुए अक्सर खारिज कर देते हैं जो सही भी है। हालांकि दूसरे नजरिये से देखें तो कंपनी जगत की प्रमुख हस्तियों का मुखर होना अर्थव्यवस्था में कारोबारी समुदाय की सहभागिता का एक पैमाना भी है। अगर वे पाखंड से भरी टिप्पणियां भी कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि उनके पास कुछ निवेश योजनाएं हैं जिसके चलते वे चिंतित हो रहे हैं। अगर लगातार चार तिमाहियों में भारत की धीमी प्रगति के बाद भी उनके पास कहने को कुछ नहीं है तो यह चिंता का विषय होना चाहिए। क्या भारतीय कारोबारी निवेश करने के लिए किसी और देश की तरफ देख रहे हैं? नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान के केंद्र में रहे नौकरी देने के वादे के लिए इसका क्या मतलब होगा?

 
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के दौर को याद कीजिए। कारोबारी जगत भ्रष्टाचार एवं घोटालों के आरोपों से घिरी संप्रग सरकार की भरपूर आलोचना कर रहा था। मोदी की अगुआई में बनने वाली सरकार की नीतियों केव्यवसाय-अनुकूल होने की उम्मीद में उद्योगपति उनकी तारीफों के पुल बांधने में एक-दूसरे को भी पीछे छोडऩे में लगे थे। संप्रग सरकार के अंतिम दिनों में 'नीतिगत पंगुता' शब्द काफी चलन में था। कारोबारी आसन्न चुनाव में हार की तरफ बढ़ रही सरकार की आलोचना में काफी मुखर थे। यहां तक कि मनमोहन सिंह की आर्थिक सलाहकार परिषद में शामिल रहे रतन टाटा को भी वर्ष 2013 में यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि देश 'नेतृत्व के संकट' से गुजर रहा है। यह सरकार के एक तरह से नदारद होने की स्थिति बयां करने का उनका शालीन तरीका था।
 
उस समय हर कोई एक नई स्लेट चाहता था जिस पर वह अपनी कारोबारी योजनाओं का खाका खींच सके। लोकसभा चुनाव में मोदी की विस्मयकारी जीत के बाद हमेशा मौकापरस्त रहा कॉर्पोरेट जगत पूरे जोश के साथ उनकी तारीफ में जुट गया। मोदी के शासन की शैली पंगुता के ठीक उलट थी। कोयला ब्लॉक और दूरसंचार स्पेक्ट्रम की नीलामी पर त्वरित फैसलों के साथ ही कारोबारी सुगमता के मामले में भारत की रैंकिंग सुधारने के लिए समिति बनाने जैसे फैसले इसकी बानगी हैं। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे हाई-वोल्टेज कार्यक्रमों में शामिल होने वाले और विदेश दौरों पर प्रधानमंत्री के साथ रहने वाले उद्योगपतियों ने हरेक शख्स को यह कहते हुए आश्वस्त किया कि बदलाव बस होने ही वाला है। मोदी ने कारोबारी जगत के संरचनात्मक अवरोधों को दूर करने का वादा करते हुए उन सभी लोगों को बहलाया और उन्हें स्वच्छ, भ्रष्टाचार-मुक्त माहौल देने की बात कही। कारोबारी समस्याओं को लेकर रायसीना हिल जाने वाले उद्योगपतियों को एक ग्रहणशील सरकार दिखी और वे उसके मुताबिक ढल भी गए। कारोबारियों से नई परियोजनाओं के लिए विलक्षण आंकड़ों का कागज पर वादा किया गया। 
 
हालांकि कुछ ही कारोबारी अपने बयानों के हिसाब से निवेश कर रहे हैं। एक अति-सक्रिय सरकार होने और दिन में चौबीस घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री के होते हुए भी निवेश सबसे निचले स्तर पर आ चुका है और वहीं पर अटका हुआ है। मोदी ने भारतीय कंपनियों के प्रमुखों को 2015 की एक बैठक में जोखिम उठाने की नसीहत दी थी। लेकिन कोई भी उनकी बात पर अमल करता नहीं दिखा। असल में सबसे बड़ा जोखिम तो खुद प्रधानमंत्री मोदी ने उठाया है। उन्होंने अचानक ही देश की 86 फीसदी मुद्रा को चलन से बाहर करने का ऐलान कर दिया। पॉल क्रुगमैन से लेकर मनमोहन सिंह तक तमाम प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने उसकी चौतरफा आलोचना की। निवेश के मॉरीशस मार्ग का इस्तेमाल नई कर संधि से सीमित हो जाने से कई शीर्ष उद्योगपति खुलकर प्रधानमंत्री मोदी के बचाव में आए। उन्हें उम्मीद थी कि काला धन खत्म होने और सभी लोगों के डिजिटल भुगतान अपना लेने के बाद सरकार की तरफ से निवेश बढ़ाने वाले कुछ अहम फैसलों का ऐलान किया जाएगा।
 
उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने कहा था कि यह 'एक ऐसा साहसिक कदम है जिसकी हरेक शख्स को कद्र करनी चाहिए।' बैंकर आदित्य पुरी ने कहा था कि इस फैसले से पारदर्शिता और धन की आवाजाही का पता लगाया जा सकेगा। दावोस में मुकेश अंबानी ने भी कहा था कि 'नोटबंदी से भारत के चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए तैयार होने की पुष्टि होती है, खासकर नरेंद्र मोदी जैसे सशक्त नेता की मौजूदगी में।' केवल राजीव बजाज ही साहस का परिचय देते हुए इस गुणगान से दूर रहे। उन्होंने नोटबंदी के विचार को ही गलत बताते हुए कहा था कि इसके क्रियान्वयन को दोष नहीं दिया जाना चाहिए। 
 
नोटबंदी के दौरान बजाज के दोपहिया वाहनों की बिक्री में तीव्र गिरावट आई थी। ऑटो उद्योग की अन्य कंपनियों पर भी इस फैसले का ऐसा ही असर पड़ा था। एक और विलक्षण चुनाव नतीजे को अगर परे रखें तो अब यह काफी हद तक साफ है कि बजाज का आकलन सही था। छोटे एवं मझोले स्तर के किसी भी किसान या दुग्ध उत्पादकों या छोटे कारखानों के मालिक से पूछिए। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अगले महीने लागू होने वाला है लेकिन कोई नहीं जानता है कि आपाधापी का नया दौर कारोबार पर क्या असर डालेगा? भारतीय कॉर्पोरेट जगत का कोई भी व्यक्ति इस चिंताजनक भविष्य के बारे में कुछ खास नहीं बोल रहा है। मोदी को इस वजह से भी चिंतित होना चाहिए।
Keyword: telecom, jobs, दूरसंचार,
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