Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, July 24, 2017 04:04 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

बुनियादी ढांचा क्षेत्र को चाहिए एक डीएफआई

विनायक चटर्जी /  June 15, 2017

इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी देश के बुनियादी विकास क्षेत्र के लिए वित्तीय विकास संस्थान के तौर पर विकसित हो सकती है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
देश में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) के लंबी अवधि से सुसुप्तावस्था में होने और बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में निवेश के अत्यंत निचले स्तर पर होने के चलते सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में निजी क्षेत्र के सालाना निवेश को 7 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक लाया जाए। ग्रीनफील्ड परियोजनाएं वे होती हैं जो खाली जमीन पर होती हैं और जिनमें किसी तरह के पुनर्निर्माण या तोडफ़ोड़ की आवश्यकता नहीं होती। यह काम चुनौतीपूर्ण है क्योंकि देश के बैंकों की हालत पहले ही खस्ता है और आगे और बिगड़ सकती है। बेसल 3 मानक के चलते बैंकों को अधिक पूंजी की जरूरत होगी। बैंक पहले ही फंसे हुए कर्ज से जूझ रहे हैं और परिसंपत्ति जवाबदेही में भी असंतुलन हो गया है। पूंजी बाजार के वैकल्पिक उपाय मसलन इन्विट्स और रीट्स को अभी प्रभावी असर लायक बनने में समय लगेगा। इतना ही नहीं वे उपाय केवल उन परियोजनाओं के लिए प्रासंगिक हैं जो पहले से चल रही हैं। एक बढिय़ा बॉन्ड बाजार का उभरना अभी शेष है और ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी नजर नहीं आ रहा। छह दशक पहले भी देश ऐसी ही समस्या से दो-चार था। उस वक्त इस्पात और सीमेंट संयंत्रों के साथ अन्य बड़े औद्योगिक निवेश में दिक्कत आ रही थी। इसके चलते नया उद्यमी वर्ग भी उभर कर सामने नहीं आ पा रहा था। इसका हल डेवलपमेंट फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशंस (डीएफआई) यानी वित्तीय विकास संस्थान का समूह बनाने में नजर आया। आईएफसीआई, आईडीबीआई और आईसीआईसीआई आदि ऐसे ही संस्थान हैं। इनकी स्थापना क्षेत्रगत जानकारी के आधार पर दीर्घावधि ऋण देने के लिए की गई थी। वे अपेक्षाओं पर खरे भी उतरे। 
 
करीब 20 वर्ष पूर्व आईडीएफसी की स्थापना भी इसी लक्ष्य के साथ की गई थी। आज आईसीआईसीआई, आईडीबीआई और आईडीएफसी अब डीएफआई नहीं रह गए हैं। वे नियमित बैंक की तरह काम कर रहे हैं। आईएफसीआई अस्तित्व की चुनौती से जूझ रहा है। वर्ष 2006 में सरकार ने एक बार फिर प्रयास किया और पूरी तरह सरकारी इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी लिमिटेड (आईएफसीएल) की स्थापना की। आईएफसीएल के पास कई योजनाएं हैं। यह बुनियादी विकास क्षेत्र में पीपीपी को भी वित्तीय मदद मुहैया कराता है। सीधे ऋण के अलावा यह पुनर्वित्तीकरण भी करता है। इसकी अनुषंगी कंपनियां परियोजना विकास में मदद करती हैं, ऋण बाजार और अंतरराष्ट्रीय बाजार से फंड जुटाती हैं। हाल ही में उसे एक ऋण गारंटी संस्थान का प्रायोजक भी बनाया गया। खेद की बात यह है कि आईएफसीएल सही मायनों में देश के बुनियादी ढांचागत क्षेत्र के लिए ऋण की व्यवस्था में सक्षम नहीं। वित्त वर्ष 2015-16 में उसने 1.45 अरब डॉलर का ऋण इस क्षेत्र को दिया। समान अवधि में ब्राजील के डीएफआई बीएनडीईएस ने 18 अरब डॉलर का ऋण बांटा। वहीं चीन विकास बैंक ने 130 अरब डॉलर का कर्ज दिया।
 
सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय बुनियादी क्षेत्र निवेश कोष (एनआईआईएफ) की स्थापना की है ताकि बुनियादी परियोजनाओं को इक्विटी पूंजी मुहैया कराई जा सके। एनआईआईएफ को अभी भी शुरुआत करनी है। आईआईएफसीएल से इतर कई अन्य ऐसी संस्थाएं हैं जो विशिष्ट बुनियादी विकास क्षेत्रों को वित्तीय मदद मुहैया कराती हैं। इनमें पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन, रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन, सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, हुडको और इंडियन रेलवे फाइनैंस कॉर्पोरेशन शामिल हैं।
 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के एक वर्ग को बुनियादी क्षेत्र को वित्तीय मदद पहुंचाने वाली कंपनियों (आईएफसी) के रूप में व्यवहार करने को कहा है। फिलहाल ऐसी कुछ कंपनियां हैं। हाल ही में आरबीआई की ओर से जारी एक श्वेतपत्र में यह प्रस्ताव रखा गया कि बुनियादी क्षेत्र को ऋण मुहैया कराने के लिए संपूर्ण बैंक बनाएं जाएं जिनमें न्यूनतम 1,000 करोड़ रुपये की पूंजी हो।
 
हमारे पास ऐसे संस्थान पहले से भी हैं और प्रस्तावित भी हैं लेकिन उनका आकार ब्राजील और चीन के सामने कहीं नहीं टिकता। हम वहां कैसे पहुंचें? बुनियादी क्षेत्र के विशेषज्ञों के मुताबिक आईआईएफसीएल का विश्व स्तरीय डीएफएल के रूप में विकास करना समझदारी भरा कदम होगा। आईआईएफसीएल में दोहरा नियमन है। आरबीआई इसका नियमन बतौर एनबीएफसी-आईएफसी करती है। परंतु यह सीधे वित्त मंत्रालय की निगरानी में भी रहती है। वर्ष 2005 में लाई गई व्यवहार्य बुनियादी परियोजनाओं को ऋण देने की उसकी योजना उसे किसी परियोजना की लागत के 20 फीसदी तक सीमित करती है। 
 
ऐसे में छोटी परियोजना के लिए डेवलपर को कई ऋणदाताओं से संपर्क करना पड़ता है। इतना ही नहीं उसे पीपीपी को वरीयता देनी होती है। गैर पीपीपी परियोजनाओं को लेकर उस पर कई बंदिशें हैं। खेद है कि हाल के समय में पीपीपी परियोजनाएं भी अत्यंत सीमित रही हैं। इस बात ने आईआईएफसीएल को बाधित किया है।
ऐसे में आईआईएफसीएल अपनी क्षमताओं का पूरा लाभ उठा सके उसके लिए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:
 
दोहरे नियमन का समापन: आईआईएफसीएल का नियमन केवल आरबीआई को करना चाहिए। वित्त मंत्रालय के नियंत्रण की जगह एक सरकारी चार्टर होना चाहिए जो इसके लिए व्यापक नीतिगत निर्देश तैयार करे। 
 
निदेशक मंडल के लिए परिचालन स्वायत्तता: आईआईएफसीएल के बोर्ड को यह अधिकार होना चाहिए कि वह परिचालन के मुद्दों पर संशोधित चार्टर के अधीन निर्णय ले सके। इसका आरबीआई के नियामकीय दायरे में बना रहना ही ठीक है। 
 
बहुपक्षीय संस्थानों या सॉवरिन फंड की इक्विटी के जरिये आईआईएफसीएल की पूंजी में इजाफा: आईआईएफसीएल की वर्ष 2015-16 की सालाना रिपोर्ट बताती है कि उसके पास 7,265 करोड़ रुपये का मुद्रा भंडार और साझा पूंजी है। यह पर्याप्त नहीं है। भारत सरकार आईआईएफसीएल पर बहुसंख्यक हिस्सेदारी रख सकती है लेकिन उसे एडीबी, आईएफसी, सॉवरिन वेल्थ फंड और नए एशियाई फंड मसलन न्यू डेवलपमेंट बैंक और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) की मदद भी लेनी चाहिए। 
 
बेहतर कॉर्पोरेट प्रशासन: बहुपक्षीय एजेंसियों और वैश्विक कारोबारियों से से इक्विटी पूंजी जुटाने के लिए आईआईएफसीएल के कॉर्पोरेट गवर्नेंस को भी बेहतरीन होना चाहिए। उदाहरण के लिए चेयरमैन और प्रबंध निदेशक का पद अलग किया जा सकता है। प्रतिष्ठिïत लोगों को स्वतंत्र निदेशक बनाया जा सकता है। 
 
ये कोई मुश्किल बदलाव नहीं हैं। सरकार पहले ही एनआईआईएफ के लिए ऐसा कर रही है। उसने बाजार से सीईओ तलाश किया है और सह निवेशकों के रूप में सॉवरिन वेल्थ फंड को आमंत्रित किया है। दिल्ली के नीतिगत हलकों में यही चर्चा है कि आईएफसीएल और आईआईएफसीएल का विलय किया जा सकता है। वहीं आईआईएफसीएल, आईएफसीआई, पीएफसी, आरईसी और हुडको का विलय कर बुनियादी क्षेत्र में एक डीएफआई के निर्माण की चर्चा भी है। अंतिम परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन आईआईएफसीएल को डीएफआई में तब्दील करना एक बेहतर विकल्प होगा। निजी क्षेत्र भी इसका स्वागत करेगा। 
Keyword: infra, इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या रक्षा क्षेत्र में एफडीआई में देनी चाहिए और ढील?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.