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अनिश्चितता में इजाफे से बढ़ रही है आशंका

अजय शाह /  June 14, 2017

ऐसा लगता है कि वर्ष 2017-19 तक का समय जीएसटी के प्रभाव से निपटने में चला जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे वर्ष 2016-17 नोटबंदी के हवाले हो गया। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
देश में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आकलन कमजोर है और सूक्ष्म अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों में तनाव नजर आ रहा है। आखिर हम गलती कहां कर रहे हैं? इस तस्वीर का एक पहलू बढ़ती अनिश्चितता भी है। कुछ क्षेत्रों में हम नीतिगत गलतियां कर चुके हैं। नीतियों के क्रियान्वयन के मामले में अक्सर कमजोरी देखने को मिली है। विभिन्न कंपनियां जिस पुराने तौरतरीके से अपनी समस्याओं को हल किया करती थीं अब वे उतने काम नहीं आते लेकिन नए तरीके तलाश नहीं किए जा सके हैं। यह बात उनकी क्षमता को प्रभावित कर रही है। अनिश्चितता और शक्तिहीनता का यह नया अहसास निजी निवेश पर बुरा असर डाल रहा है।
 
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के एक पूर्व प्रमुख ने कहा था, 'अगर आप मेरी रसोई में आएंगे, तो आप मेरा खाना नहीं खाएंगे।' बहरहाल, हाल के वर्षों में हमने बार-बार सीएसओ की रसोई में झांका है और हमें बार-बार यह याद दिलाया गया है कि आधिकारिक आंकड़ों के चारों स्तंभों-एनएस, एनएसएसओ, एएसआई और आईआईपी की अपनी सीमाएं हैं। जब सूक्ष्म अर्थव्यवस्था के आंकड़े सीएसओ से मेल नहीं खाते तब भी आमतौर पर उनको ही सही माना जाता है।
 
सवाल यह है कि सूक्ष्म आंकड़े क्या कहते हैं? हम जो सूचकांक तैयार करते हैं उनमें सभी गैर वित्तीय, गैर तेल क्षेत्र की सूचीबद्ध कंपनियां शामिल होती हैं। वर्ष 2002 से 2012 के दरमियान वार्षिक बिक्री वृद्धि 20 फीसदी से अधिक रही। लेकिन वर्ष 2012 से 2017 के बीच इसमें कमी आई और समायोजन के बाद यह दर 5 फीसदी रह गई। वार्षिक परिचालन लाभ में वर्ष 2002 से 2012 के बीच 20 फीसदी से अधिक की समायोजित वृद्धि देखने को मिली। परंतु वर्ष 2012 से 2017 के बीच यह भी घटकर 4 फीसदी रह गई। वास्तविक अर्थों में देखें तो गत पांच सालों में इन दोनों में गिरावट आई है। 
 
सीएमआईई कैपेक्स डाटाबेस तमाम निवेश परियोजनाओं पर नजर रखता है। इसके मुताबिक वर्ष 2012 से 2017 के बीच क्रियान्वयन के अधीन परियोजनाओं की समायोजित वृद्धि का मूल्य शून्य रहा। वास्तव में देखा जाए तो यह नकारात्मक है। भारत में आज अर्थव्यवस्था से जुड़ा सबसे अहम सवाल वृद्धि दरों में आ रही गिरावट से जुड़ा है। आखिर वर्ष 2002 से 2012 के दरमियान भारत का प्रदर्शन इतना अच्छा क्यों रहा और उसके बाद इसमें गिरावट क्यों आई?
 
मेरे विचार से इस कहानी का एक हिस्सा बढ़ते भय से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2002 से 2012 तक विभिन्न फर्मों के समक्ष जोखिम थे जिनको उन्होंने समझा और उनका प्रबंधन किया। उस समय सबको पता था कि कौन-कौन सी संभावनाएं सामने हैं। इसके अलावा अगर कुछ गलत होता है तो क्या करना है यह भी पता था। वर्ष 2012 के बाद से चीजें तेजी से बदलने लगीं। ऐसी घटनाएं घटने लगीं जिनके बारे में किसी ने पहले सोचा नहीं था। इतना ही नहीं पुरानी शैली की समस्याओं की बात करें तो उनके लिए भी पुराने तरीके कारगर नहीं रह गए। अब कंपनियों के सामने नए माहौल में कहीं अधिक अनिश्चितता है, वहीं इससे निपटने के उपाय कमजोर हैं। इसकी वजह से कंपनियों में आशंका बढ़ी है। 
 
भारत में हमें कानूनी कमजोरी का भी सामना करना पड़ता है। कंपनियों को दो तरह के गतिरोध का सामना करना पड़ता है। कई बार एक कंपनी के साथ बेहतर व्यवहार नहीं होता है जबकि कानूनन वह उसका अधिकार है। वहीं कई बार कंपनियां खुद भी नियम को अपने मुताबिक ढालना चाहती हैं। अब जरा 2002 से 2012 के बीच आर्थिक नीति पर नजर डालें। उस दौर में कंपनियों को समस्या निवारण की जानकारी थी। अब वह व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। इसे समझा भी जा रहा है। प्रवर्तन संस्थानों ने कुछ अहम घोटालों पर जोर दिया लेकिन प्रवर्तन संबंधी कदमों ने अधिकारियों को भयभीत किया है। अब अधिकारी केवल नियम कायदों पर चलना चाहते हैं। 
 
नीति निर्माण की नई व्यवस्था कुछ ऐसी है जहां तक फर्मों की पहुंच नहीं है। पुराने जमाने में फर्मों के पास यह अवसर था कि वे अपनी दिक्कतों को प्रकट कर सकें। लेकिन वह संचार व्यवस्था अब ध्वस्त हो चुकी है। पुरानी नीतिगत व्यवस्था तक बरकरार नहीं रह गई है। परंतु उसके स्थान पर कोई नई व्यवस्था नहीं आई है। नई व्यवस्था जैसी भी है वह क्षमता संपन्न नहीं है। कम क्षमता और कम संबद्घता की यह व्यवस्था खामियों को जन्म दे रही है। मसलन मॉरीशस संधि में बदलाव या नोटबंदी का कदम। ऐसे बरताव पर निजी क्षेत्र का कोई अधिकार नहीं है और यह भय पैदा कर रहा है।
 
जीएसटी का डिजाइन और उसका प्रशासन निजी क्षेत्र पर दूरगामी असर डालने वाला साबित होगा। बहरहाल, जीएसटी की ओर इस यात्रा में नीतियों और प्रशासन को लेकर जो फैसले किए गए उनमें अक्सर निजी क्षेत्र को शामिल नहीं किया गया। इसकी वजह से तमाम गलत निर्णय हुए हैं। यही वजह है कि एक शानदार सुधार और देश की सुधार प्रक्रिया में भरोसा पैदा करने वाली एक व्यवस्था को निजी क्षेत्र शंकास्पद ढंग से देख रहा है। जोखिम तो यह है कि वर्ष 2016-17 जहां नोटबंदी की भेंट चढ़ गया वहीं वर्ष 2017-19 जीएसटी की भेंट न चढ़ जाए। 
 
पुरानी व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता थी। इस समय देश में एक मजबूत सरकार है जिसके पास अनुमन्य ढांचा और सार्वजनिक अर्थशास्त्र को लेकर सुलझी हुई समझ है। भारतीय नीति व्यवस्था में हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए सरकारी विभागों का आकार सही करना, नियामकों, प्रवर्तन एजेंसियों और अदालतों की हालत दुरुस्त करना। यह आसान काम नहीं है। इसके लिए गहन बौद्घिक क्षमता की आवश्यकता है। उनके साथ ही जटिल ढांचागत बदलाव लाया जा सकता है और नीतिगत सुधारों को अंजाम दिया जा सकता है। अर्थशास्त्री जोखिम और अनिश्चितता में महत्त्वपूर्ण अंतर करते हैं। जोखिम का संबंध उन उभरती बुरी घटनाओं से है जिनके बारे में हम जानते हैं जबकि अनिश्चितता के बारे में कोई अंदाजा नहीं होता है कि वह कब क्या लेकर आएगी? भारतीय कारोबारी जगत में निजी क्षेत्र का पाला अनिश्चितता से पड़ता आया है। ऐसे में नीतिगत हस्तक्षेप के पुराने तरीके काम नहीं आते। ऐसे में विपरीत प्रभाव वाले झटके और अधिक समस्या खड़ी करते हैं। 
 
इन झटकों से निपटने में समय और पैसा दोनों खर्च होता है। अप्रत्याशित झटके और नीतिगत चूक से निपटने में ही फर्मों का पूरा समय लगता है। इस बीच बढ़ी हुई अनिश्चितता और कमजोर संबद्घता ने निजी स्तर पर शक्तिहीनता का भाव पैदा किया है। यह भी एक कारक है जिसकी मदद से वर्ष 2012 से 2017 के बीच की शून्य समायोजित वृद्घि को समझा जा सकता है। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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