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नीतिगत बदलाव का असर

संपादकीय /  June 14, 2017

लंबे समय से पिछड़ा हुआ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग आखिरकार बेहतरी की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है। बीते चार महीनों में इस क्षेत्र में करीब 70 करोड़ डॉलर का नया निवेश हुआ है। इस निवेश ने करीब 20 कंपनियों के बंद होने से मची अफरातफरी को थामा है। फिलहाल निकट भविष्य में कृषि-प्रसंस्करण उद्योग के लिए हालात बेहतर नजर आ रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो यह संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र के लिए भी शुभ संकेत लेकर आएगा। क्योंकि उस स्थिति में फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान कम होगा। एक अनुमान के मुताबिक यह नुकसान सालाना करीब 92,000 करोड़ रुपये का है और इससे कृषि आय में बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा चूंकि यह श्रमसाध्य गतिविधि है इसलिए यह पूरक रोजगार भी मुहैया करा सकती है। इसकी मदद से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाखों छोटे और सीमांत किसानों को रोजगार मिल सकता है जो अपनी छोटी जोत के चलते ठीक तरह से गुजारा नहीं कर पाते। 

 
इस क्षेत्र में तेजी के लिए हाल के दिनों में की गई कुछ बेहतर नीतिगत पहल जिम्मेदार हैं। इनमें से सबसे अहम पहल रही है ई-कॉमर्स समेत खाद्य उत्पादों के लिए बहुब्रांड खुदरा में पूर्ण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी। हालांकि इसमें यह शर्त जुड़ी हुई है कि इनका उत्पादन और प्रसंस्करण दोनों ही भारत में होना चाहिए। इस श्रेणी के अन्य सुधारों में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और शीत गृहों को प्राथमिकता आधारित ऋण के दायरे में लाना और इन्हें रियायती ऋण उपलब्ध कराने के लिए नाबार्ड के अधीन 2,000 करोड़ रुपये का विशेष फंड तैयार करना शामिल है। प्रस्तावित नई खाद्य नीति का मसौदा पहले ही सार्वजनिक किया जा चुका है। उसमें भी कुछ अहम उपायों की बात कही गई है जो कारोबारी सुगमता सुनिश्चित करने से जुड़े हैं। 
 
उदाहरण के लिए खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए लीज पर दी गई जमीन की सीलिंग को खत्म किए जाने की योजना है ताकि जमीन तक अबाध पहुंच सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त कृषि प्रसंस्करण को कृषि गतिविधि घोषित किए जाने की योजना है ताकि जमीन के इस्तेमाल का स्वरूप बदला जा सके और श्रम कानूनों की अड़चन से बचा जा सके। इतना ही नहीं सरकार ने कुछ अन्य वादे किए थे, मसलन एकल खिड़की मंजूरी, स्वनियमन और पूरे राज्य को कृषि उत्पादों के लिए एक क्षेत्र घोषित करना। इनका भी निवेशकों पर सकारात्मक असर हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर कर दर को पूर्व निर्धारित 18 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी करने का प्रस्ताव भी ऐसा ही एक कारक है। कुछ मामलों में इसमें और कमी की जानी चाहिए थी जिससे कृषि जिंसों के लिए बहुत जरूरी मूल्यवर्धन को बढ़ावा मिलता।  
 
कहना नहीं होगा कि अभी काफी कुछ किया जाना है। खाद्य उत्पादकों और प्रसंस्करण करने वालों के बीच संवाद बढ़ाना आवश्यक है। मौजूदा नीति बड़े खाद्य पार्कों और बड़े खाद्य आधारित औद्योगिक क्लस्टर्स की ओर झुकी हुई है। इस नीति में सुधार आवश्यक है। चूंकि इस क्षेत्र में छोटी जोत के खेतों का दबदबा है और उत्पादों खासतौर पर सब्जियों और फलों की प्रकृति भी मौसमी है इसलिए इनको लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने में सूक्ष्म, लघु और मझोली प्रसंस्करण इकाइयों की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती है। खेत के स्तर पर प्राथमिक प्रसंस्करण को उचित प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए और गांवों या गांवों के समूह में कुटीर प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना बेहतर लाभ दे सकती है। ऐसी इकाइयां किसानों और फैक्टरियों के बीच अहम कड़ी हो सकती हैं। यह आवश्यक है क्योंकि ज्यादा राज्यों ने खराब होने वाली उपज को नियमित मंडी से बाहर बेचने की छूट नहीं दे रखी है। इसके अलावा शीत गृहों की शृंखला में होने वाला विस्तार अहम है। ऐसी कुछ योजनाएं शुरू हैं लेकिन उनकी प्रगति तेज करने की आवश्यकता है। 
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,खाद्य प्रसंस्करण उद्योग,
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