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अनसुलझे सवालों के भंवर में फंसी केन-बेतवा परियोजना

नितिन सेठी /  06 13, 2017

परियोजना को जिस तरह टुकड़ों में पर्यावरणीय मंजूरी दी गई, उससे पैदा होते हैं कई सवाल

परियोजना की लागत

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की 4,000 हेक्टेयर जमीन जलमग्न हो जाएगी
1994-95 के मूल्य स्तर पर इसकी लागत 1,998 करोड़ रुपये थी
2015 में यह करीब 10,000 करोड़ रुपये पर पहुंच चुकी थी
पुनर्वास पर खर्च होंगे 5,072 करोड़ रुपये

पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने मध्य प्रदेश की केन-बेतवा संपर्क परियोजना को मंजूरी दे दी है। देश में नदियों को जोड़ने की महत्त्वाकांक्षी योजना के तहत सबसे पहले केन और बेतवा को ही जोड़ा जा रहा है। इस परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए अब केवल पर्यावरण मंत्री की मंजूरी ही बाकी रह गई है। उच्चतम न्यायालय की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति भी इस मामले को देख रही है लेकिन सरकार का मानना है कि उससे कोई समस्या नहीं होगी।

सरकार के मुताबिक इस समिति ने परियोजना के बारे में कोई बड़ी आपत्ति नहीं जताई है और उसने कुछ तकनीकी पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। मौजूदा पर्यावरण नियमों के मुताबिक किसी परियोजना के लिए अलग-अलग चरणों में अलग-अलग पर्यावरणीय मंजूरी ली जा सकती है। अभी केवल केन-बेतवा परियोजना के पहले चरण को ही मंजूरी दी गई है। डेवलपर भविष्य में अलग-अलग चरणों के लिए अलग-अलग पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करेंगे।

क्या औपचारिकता है पर्यावरण मंजूरी?

नदियों को जोडऩे की परियोजना को पहले चरण में तीन तरह की पर्यावरण मंजूरी की जरूरत होती है। एक पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के तहत, दूसरी वन्यजीव संरक्षण कानून, 1976 के तहत और तीसरी वन्य सरंक्षण कानून, 1980 के तहत। अन्य सभी परियोजनाओं की तरह केन-बेतवा परियोजना के लिए भी पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव मंजूरी अलग-अलग दी गई। सरकार को सौंपे गए दस्तावेजों के मुताबिक डेवलपरों ने तीन तरह की मंजूरियों के लिए जो आंकड़े पेश किए उनमें भी कई असमानताएं हैं।

मध्य प्रदेश सरकार ने भी इस परियोजना की सिफारिश करने में कोई देर नहीं की थी। इस परियोजना के कारण राज्य के पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की कई हेक्टेयर जमीन डूब जाएगी। बाघों के लिए मशहूर पन्ना में शिकार के कारण बाघ विलुप्त हो गए थे। लेकिन अब फिर से वहां बाघों को बसाया गया है। मध्य प्रदेश और केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर केन-बेतवा परियोजना का समर्थन किया है। इनमें पर्यावरण मंत्री भी शामिल हैं। विशेषज्ञों की मंजूरी से पहले ही नेताओं ने इस परियोजना का समर्थन कर डाला। इसलिए कई विश्लेषकों का कहना था कि कानूनी रूप से अनिवार्य मंजूरियां तो केवल औपचारिकता थीं। कई विशषेज्ञ समितियों ने परियोजना के विभिन्न प्रभावों पर चिंताएं जाहिर की थीं लेकिन वे इन चिंताओं के समाधान के लिए कुछ अतिरिक्त शर्तें लगाकर चुपचाप बैठ गईं। 

अलबत्ता मंत्रालय के अधिकारियों की दलील है कि परियोजना को मंजूरी देने में पूरी तरह प्रक्रिया का पालन किया गया है। उन्होंने कहा, 'विशेषज्ञों ने जो भी चिंताएं जाहिर की थी उन पर चर्चा हुई और उनका समाधान ढूंढने के बाद ही मूल्यांकन समिति (पर्यावरण मंजूरी के लिए) और सलाहकार समिति (वन मंजूरी के लिए) ने कई अतिरिक्त शर्तों के साथ परियोजना को मंजूरी दी।'

लेकिन वन और वन्यजीवों पर इस परियोजना के प्रभावों के मूल्यांकन से जुड़े रहे एक सेवानिवृत्त वरिष्ठï अधिकारी ने कहा, 'ये तो होना ही था। हमने तथ्य पेश किए लेकिन दूसरा कदम यह देखना था अगर यह परियोजना शुरू होती है तो क्या बचाया जा सकता था।' बांध की ऊंचाई घटाए बिना परियोजना को वन और पर्यावरण मंजूरी दी गई। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान को बचाने के लिए पर्यावरणविदों ने बांध की ऊंचाई घटाने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने डेवलपरों को बांध के कारण होने वाले नुकसान और जमीन के मुआवजे के लिए बाद में पैसे देने को कहा। जल विज्ञान और पारिस्थितिकी के कई गैर सरकारी विशेषज्ञों ने इस परियोजना को विभिन्न तरह की मंजूरियों पर कई बुनियादी, तकनीकी और कानूनी सवाल उठाए हैं। 

परियोजना की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। शुरुआत में 1994-95 के मूल्य स्तर पर इसकी लागत 1,998 करोड़ रुपये रखी गई थी। वर्ष 2015 में यह करीब 10,000 करोड़ रुपये पहुंच चुकी थी। अलबत्ता परियोजना के दस्तावेज में यह नहीं बताया गया था कि यह लागत मौजूदा मूल्य स्तर पर है या नहीं। मंजूरी के लिए सरकार को सौंपे गए एक अन्य दस्तावेज में परियोजना के प्रभावितों के पुनर्वास और पर्यावरण प्रबंधन की लागत 5,072 करोड़ रुपये बताई गई। मंजूरी देते समय परियोजना के लागत लाभ विश्लेषण के भाग के रूप में इस पर विचार नहीं किया गया।

इसके अलावा परियोजना को मंजूरी देने की प्रक्रिया के दौरान लगाई गई शर्तों के कारण कुछ अतिरिक्त लागत भी वहन करनी होगी। अलबत्ता परियोजना का आकलन करते समय इस तरह की लागतों को जोडऩे की जरूरत नहीं है। ऐसा नहीं है कि नदी जोड़ो परियोजना को ही बढ़ी हुई लागत की समस्या से जूझना पड़ेगा। कई सिंचाई परियोजनाओं को इस तरह की समस्या से जूझना पड़ा है और फिर भी उनका काम पूरा हुआ है। केन-बेतवा परियोजना में लागत की हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रस्ताव है जिसे केंद्र वहन करेगा। 

इस परियोजना के केंद्र में यह सोच है कि एक नदी के अधिक जल को दूसरी नदी में भेजा जाएगा। लेकिन इस परियोजना के बारे में आंकड़े सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है क्योंकि सरकार ने गंगा बेसिन के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया है। यह देखना होगा कि क्या बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की तरह यह परियोजना भी अंजाम तक पहुंचती है या नहीं। इसके लिए परियोजना के पूरे होने का इंतजार करना होगा।
Keyword: परियोजना, पर्यावरण, लागत, पन्ना, राष्ट्रीय उद्यान, जमीन, नदी, पुनर्वास, न्यायालय,
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